मुख्तलिफ रंग
जंगल में लगी आग तफ़रीक. नहीं करती
आते हैं सभी.जद में ख्वाह चीड हो या संदल
गमे फ़िराक से उबरने की न थी उम्मीद मुझे
गुजरते वक्त ने मरहम सा मगर काम किया
ये सहर है या कोई जादू है
ये क्या है ये जबान ए उर्दू है
जब हुआ फ़साद तो, भेद ये खुला तभी
भेड़िये भी थे कई आदमी की खाल में
तुम ने जो आग लगाई है, उसके लिए
वो तुम्हारा भी घर जला देगी
जिस की बुनियाद ही बुराई हो
तुम को अच्छा वो क्या सिला देगी
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