बुधवार, 5 अप्रैल 2017

ख़लाओं से गुज़रना चाहता हूँ

ख़लाओं से गुज़रना चाहता हूँ 

ख़लाओं से गुज़रना चाहता हूँ 
सितारों को पकड़ना चाहता हूँ 
मुहब्बत तुझ से करके ए परी रु 
क़मर की सैर करना चाहता हूँ 
ख़ुदाया मुझ को भी कश्ती अता कर 
मैं दरिया पार करना चाहता हूँ 
जुदाई से मुहब्बत जाग उठे 
मैं तुझ फिर बिछड़ना करना चाहता हूँ 
मुहब्बत हो उखुव्वत हो वतन में 
कुछ ऐसा काम करना चाहता हूँ 
फ़जाओं में जहर जो घोलते हैं 
मैं उन के फन कुचलना चाहता हूँ 
अजब अहसास था वो भी ख़ुदारा 
मैं उस से फिर बिछड़ना चाह्ता हूँ 
वतन के वास्ते जीना मेरा मक़सद 
वतन पर ही में मरना चाहता हूँ 
बहुत बेरंग है ये जिन्दगी अकमल 
मैं बच्चों सा मचलना चाहता हूँ
अकमल

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شاعر

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