अब तो मर्दों में भी ये आदत है
गीबतों में अजब लताफ़त है
सांस लेना भी हम्द है उसकी
दिल धड़कना भी इक इबादत है
धूप बर्दाश्त कर रहा हूँ तुझे
क्योंकि तू ज़ीस्त की अलामत है
काश तुम भी समझ गए होते
ज़िन्दगी मौत की क़यादत है
बढ़ती जाती है मौत की शिद्दत
हुस्न में भी बहुत तमाज़त है
आप गिरगिट नहीं हैं इंसा हैं
रंग बदलना तो उनकी आदत है
कब तलक झूठ से बचूँ अकमल
झूठ इस दौर की सदाक़त है
अकमल
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