बुधवार, 1 मई 2019

ना:त


ना:त
बने याक़ूत हर ज़र्रा मुक़द्दस खाक हो जाए 
जहां क़दमों को वो रख दें, ज़मी वो पाक हो जाए 
इशारा वो अगर कर दें, मुबारक अपनी उंगली से 
दरख्शां चाँद का भी फिर गिरेबां चाक हो जाए 
वही हादी, वही रहबर, हैं ज़ामिन कामयाबी के 
पकड़ लो उन के दामन को अगर इदराक हो जाए 
जो अपना ले रविश उनकी सिराते मुस्तक़ीमी की 
ये मुमकिन हो नहीं सकता, कभी ग़मनाक हो जाए 
जो डरता है मुहम्मद से, जो उसके रब से डरता है 
फिर उसकी दोनों आलम में यक़ीनन धाक हो जाए 
ख़ुदारा मुझको तू उनकी वो काकुल ही बना देता 
जो आरिज़ चूम लेती है अगर बेबाक हो जाए 
वो किसरा हो या कैसर हो, वो नीलम हो या गोहर हो 
अगर निस्बत नहीं उनसे ख़सो खाशाक हो जाए 
मुक़द्द्स आयतें सारी ख़ुदा ने जो उतारी हैं 
दुआ रब से है अकमल की यही इम्लाक हो जाए

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شاعر

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