ग़ज़ल (1/5/19)
तुम्हारी आँखों के सारे मंज़र
हैं चाँद, सहरा, नदी, समंदर
विसाल महशर, फिर हिज्र महशर
गुज़र गए हम पे दो दो महशर
तेरे ख़्यालों की खुशबुएं हैं
गुलाब, ख़स, मुश्क और अंबर
है दिल की बहरूपिया कोई है
कभी है मजनू कभी क़लंदर
ख़लिश, उदासी, मलाल और ग़म
हैं दामने इश्क़ तेरे अन्दर
मुझे है तुमसे बहुत मुहब्बत
दिखा के वो कहा रहा था खंजर
न कोई बाक़ी रहा जहां में
दिलेर, सरकश, क़वी, धुरंदर
मताए दुनिया तो बेवफा है
की हाथ ख़ाली गया सिकंदर
बना लो कैसी भी मोटर अकमल
हमीं निकालेंगे उसका पंचर
अकमल
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