शनिवार, 8 सितंबर 2018


गुरू (5 Sep 2018)

सभी ये पूछते हैं आजकल मुझसे गुरू क्या है
बताता हूं चलो तुमको गुरू क्या है, गुरू क्या है

गुरू वो है जो तेरी ज़िन्दगी को इक दिशा दे दे
गुरू वो है जो तुझको जागने वाली निशा दे दे
गुरू वो है जो छुड़वा दे बुरी सब आदतें तेरी
गुरू वो है जो भक्ति का तेरे दिल को नशा दे दे

गुरू ही तो विजय और हार का अंतर बताता है
गुरू ही तो सफ़लता का यहां जंतर बताता है
गुरू का साथ हो तो हारने की बात नामुमकिन
गुरू वो है जो केवल जीत का मंतर बताता है

गुरू का जो करे आदर वही सन्मार्ग पाता है
गुरू ही तो तिमिर से खींच कर ज्योति में लाता है
गुरू का काम है अपमार्जन मन का तेरे करना
गुरू करके सफ़ाई मन की कुटिया को छवाता है

गुरू का नाम आते ही निगाहो दिल मचल जाये
गुरू का स्मरण करते ही विपदा आप टल जाये
गुरू की शक्तियां कितनी हैं तुमको क्या पता अकमल
गुरू का नाम जपने से ही मन का पाप जल जाये

परमहंस के बिना स्वामी विवेकानंद कहां होते
द्रोणाचार्य के बिन भला अर्जुन कहां होते
कहां होते भला ख़ुसरू बिना बख़्तियार काकी के
गुरू होते नहीं गर तो भला शिष्य कहां होते

गुरू वो है जो भवसागर में तुझको तार देता है
गुरू वो है जो जीवन का सभी को सार देता है
गुरू की हर नज़र रहती है शिष्य की भलाई पर
गुरू वो है जो तेरी जीत पर सब हार देता है

गुरू कुम्हार की भांति हमें आकार देता है
कभी वो चोट करता है कभी आधार देता है
गुरू वो है जो करता है हमारी आत्मा पावन
गुरू वो है जो मन मस्तिष्क को आहार देता है

गुरू मिलते हैं मुश्किल से गुरू का मान तुम करना
गुरू का जो भी हो आदेश उस पर ध्यान तुम करना
सफलता उसको मिलती है जिसे सच्चा गुरू हासिल
गुरू मिल जाये क़िस्मत से निछावर जान तुम करना

ज़माने में कुछ ऐसे भी गुरू घंटाल होते हैं
सम्भलना तुम कि ये जी के बड़े जंजाल होते हैं
तुम्हें उल्लू बनाकर लूट लेंगे माल सारा ये
तुम्हें कुछ दे नहीं सकते ये ख़ुद कंगाल होते हैं
अकमल


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شاعر

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