रविवार, 2 सितंबर 2018

छतों का ज़माना (२६ अगस्त से २८ अगस्त २०१८)


छतों का ज़माना (२६ अगस्त से २८ अगस्त २०१८)

छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
छतों पर जिंदगानी थी छतों पर आशियाना था

छतों पर गर्मियों में हाँ बड़ी ठंडी हवाएं थीं
छतें फिर शाम होते ही छतें क्या ख़्वाबगाहें थीं
कभी सर्दी के मौसम में बदन जब सर्द हो जाते
तो सूरज की अंगीठी की छतों पर ही शुआयें थीं
छतों पर जिंदगानी का हरेक मौसम सुहाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों पर शाम होते ही वो इक मेला सा लगता था
किसी के हाथ में मांझा कोई चरखी पकड़ता था
किसी की जब पतंग कटती तो वो मायूस हो जाता
पतंग जो काट देता फिर वो फातेह सा अकड़ता था
हरेक छोटा बड़ा जैसे पतंगों का दीवाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

पतंगों के लिये जानें भी लग जातीं थीं दांव पर
पतंग कट कर जो लहराती कभी बहती हवाओं पर
हुजूमे नौजवां में फिर बपा इक गुल सा हो जाता
पतंग की लूट मचती थी फलकपैमा सदाओं पर
वो दो पैसे का कागज था कि कारूँ का खज़ाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों से ही तो होते थे वो कारोबार उल्फत के
छतों पर ही मचलते थे परिंदे सब मुहब्बत के
छतों से ही शुरू होते थे क़िस्से लैला मजनूं के
छतों से ही तो खिलते थे नज़र में गुल अकीदत के
छतों पर ही धड़कते हर जवाँ दिल का ठिकाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था    
  
छतों पर पेंच लड़ते थे निगाहों के निगाहों से
हसीनाएं टहलती थीं बड़ी नाजुक अदाओं से
नजर का एक पल मिलना क़यामत ख़ेज़ होता था
बड़ी लज्ज़त थी अकमल उन निगाहों की शरारत में
हरेक माशूक ओ आशिक की निगाहों में फ़साना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों से ही तो मिलते थे सभी पैग़ाम ईदों के
निगाहो दिल लगे रहते थे छत पर सब नदीदों के
हो करवाचौथ या हो ईद सभी का छत से नाता है
छतों से चांद तकते थे सभी मिलकर उम्मीदों के
दरख्शां चांद का चेहरा बड़ा पैग़म्बराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
  
छ्तें इनआम देती थीं छ्तें इल्ज़ाम देती थीं
छ्तें बदनाम करती थीं छ्तें ही नाम देती थीं
छ्तें बेकार कर देतीं छ्तें ही काम देती थीं
छ्तें आग़ाज़ करती थीं छ्तें अन्जाम देती थीं
छ्तों से ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कितना पुराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था 
 
दिवाली में वो दीपक फ़िर छ्तों पर ही जला करते
छ्तों पर रंगबिरंगे परचमों के पर हिला करते
सगाई और शादी में अलग ही शान होती थी
वो रंग ओ रोशनी के क़ुमक़ुमे जैसे चला करते
हर इक लब पर ख़ुशी का इक अलग सा ही तराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छ्तों पर सूखते कपड़े सभी हालात कहते थे
वो गोया तो नहीं थे पर सदा कुछ बात कहते थे
बिलन्गों पर टंगे कपड़ों के पीछे से कभी हम तुम
निगाहों की ज़बां से दिल के सब जज्बात कहते थे
छ्तों पर धूप में बस आशिक़ों का आना जाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
नई नस्लों को हासिल ही नहीं छत के नज़ारे अब
मयस्सर ही नहीं उनको फ़लक के चांद तारे अब
फ़क़त बस मसनुई से क़ुमक़ुमों की रोशनी में ही
गुज़रते हैं सभी अय्याम इक जैसे हमारे अब
गया वो दौर जब छत से ये रिश्ता वालिहाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था



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شاعر

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