रविवार, 2 सितंबर 2018

हम्द (अगस्त 2018) फ़ऊलुन


हम्द (अगस्त 2018) फ़ऊलुन
(1)
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
जो ख़ालिक़ है मालिक है राज़िक़ है सबका
जो ज़ाहिर है बातिन है नूरुल्हुदा है
(2)
बुलंद आसमां को बनाया है जिसने
सितारों से इसको सजाया है जिसने
ये शम्सो क़मर हैं जो सब गामज़न हैं
ख़ला में फ़िर इनको घुमाया है जिसने
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(3)
ज़मीं को बिछौना बनाया है जिसने
फ़िर उसमें से ग़ल्ला उगाया है जिसने
कहीं रेत है और कहीं पर समन्दर
कि ख़ुश्की तरी को बनाया है उसने
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(4)
जो बारिश से मुर्दा ज़मीं ज़िन्दा कर दे
जो ख़ाली हो बादल तो पानी से भर दे
जो ठ्ण्डी हवाओं से ख़ुशख़बरी भेजे
मुअत्तर ज़मीं आसमां सारे कर दे
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(5)
कि आदम को मिट्टी से जिसने बनाया
फ़िर इक बूंद से सिलसिला ये चलाया
कोई बाप है और कोई मां बहन है
ये रिश्ते बनाये तआल्लुक़ बनाया
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है

(6)
किया है उसी ने दरिन्दों को पैदा
हजर को शजर को परिन्दों को पैदा
हरेक शै को पैदा किया है उसी ने
दरख़्तों, चरिन्दों, फ़रिन्दों(अनार) को पैदा
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(7)
है पोशिश में जिसने समर को छुपाया
है ग़ल्ले के संग संग ये भूसा उगाया
गुलों को तअत्तुर उसी की अता है
है कोयल को नग़मा उसी ने सिखाया
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(8)
सभी के लिये है फ़ना इस जहां में
बक़ा बस उसी को है ज़ेबा जहां में
न वालिद है कोई न है कोई बेटा
वो मालिक है रब है जहां में सभी का
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(9)
हवा में परिन्दों को जो थामता है
जो कश्ती को दरियाओं में थामता है
पहाड़ों को जिसने ज़मीं पर जमाया
जो बादल को दोशे सबा थामता है
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(10)
वही दोनो मश्रिक़ का मग़रिब का मालिक
वही बहरे काहिल का अहमर क मालिक
जो मिलकर कभी मिल न पाते हैं बाहम
वही ऐसे दोनों समन्दर का मालिक
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(11)
वही तीन अंधेरों में हमको बनाता
वही पैदा करता है हमको जिलाता
वही ज़िन्दा रखता है हमको जहां में
वो जब चाहता फिर, है वापस बुलाता
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(12)
ये मीज़ान क़ायम उसी ने किया है
ये हक़ और इन्साफ़ उसकी ज़िया है
कि ऐराज़ जिसने भी इससे किया है
अज़ाबे इलाही से दोचार हुआ है
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(13)
हरेक शै के उसने बनाये हैं जोड़े
वही आसमां से है बादल निचोड़े
है सहरा को बंजर बनाया उसी ने
बनाया है मैंदा को हरियाली ओढ़े
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है



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شاعر

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