शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

बेगम

बेगम (१४/९/२०१८)
सुनते हो, मुहब्बत से बुलाती है जी बेगम
फिर आँख घुमा करके डराती है जी बेगम
मैं कांपने लगता हूँ उसे देख के डर से
मेकअप के बिना चेहरा दिखाती है जी बेगम
बन ठन के अगर कभी देख ले वो मुझ को कभी तो
फ़िर झूठ हमारे से बुलाती  है जी बेगम  
हाथों की नज़ाकत का बहाना भी ग़ज़ब है
कपड़े वो सभी हम से धुलाती है जी बेगम
लौकी है करेले हैं मुक़द्दर में हमारे
मंहगाई के डर से यही लाती है जी बेगम
बच्चों को तो चोरी के है नुक़्सान बताये
वालेट से मेरे पैसे चुराती है जी बेगम
रोने में कहां सानी शहर भर में है उसका
मय्यत पे बड़े चाव से जाती है जी बेगम
सुनती है इधर इससे कहती है उधर उससे
यूं आग मुहल्ले में लगाती है जी बेगम
बन्दूक़ से ना तोप से डर मुझ को लगे है
बेलन से मगर मुझ को डराती है जी बेगम
महंगाई से रहती है परेशान सदा वो
महंगा हो अगर जोड़ा तो लाती है जी बेगम
दुनिया में फ़क़त उसके ही मां बाप हैं अच्छे
पीहर के सदा क़िस्से सुनाती है जी बेगम
बातों में कहां उससे कोई जीत सका है
ख़ामोश हमें रहना सिखाती है जी बेगम
अकमल तो है स्कूल में उर्दू का ही टीचर
लोगों को तो कुछ और बताती है जी बेगम
ग़म दे के भी अकमल जो सदा रहती है बेग़म
उस शै को ही दुनिया तो बताती है जी बेगम





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