रविवार, 2 सितंबर 2018

अबुल कलाम को श्रद्धाँजलि (03 अगस्त 2018)


अबुल कलाम को श्रद्धाँजलि (03 अगस्त 2018)
(मफ़ऊल फ़ाईलातुन मफ़ऊल फ़ाईलात)
करता है मुल्क जिनको दिल से बहुत सलाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

ग़ुरबत में वो पले थे मिट्टी के थे वो लाल
शिकवा किया कभी ना कुछ भी रहा हो हाल
थे इल्म के दिवाने, दूजा न कुछ ख़्याल
जन्मे थे जैसे देश में करने को कुछ कमाल
तुम भी सुनो कि हैं वो इस देश के इमाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

वो सांवली सी सूरत आंखों में जो समाये
वो सादगी बला की दिल में उतर ही जाये
नज़रों में वो चमक थी जो दिल को भी लुभाये
ऐसी कशिश कि जिससे कोई भी बच न पाये
बालों का जिनके था इक सबसे जुदा निज़ाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

सूरज की मिस्ल तुम भी चाहो अगर चमकना
सूरज की तरहा तुम को यां फ़िर पड़ेगा जलना
सच्चाई की रविश है कांटों भरी सदा से
तुम सब्र ओ हौसले से इस राह पर निकलना
जिस दर्दमंद दिल की बातें हैं ये तमाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

भारत के वो रतन थे भारत के थे वो लाल
दुनिया भी दे रही है जिनकी सुनो मिसाल
मिज़ाईलें बनाकर ताकत वो बख़्शी हमको
हैरतज़दा हैं सब ही ये देखकर कमाल
दुनिया में जिसने देश का उंचा किया था नाम (मकाम)
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

कुरआन से मुहब्बत गीता से उन्सियत थी
उनकी नज़र में अकमल इंसा की अहमियत थी
इस धर्म ओ ज़ात से वो बाला रहे हमेशा
दुनिया से मुन्फ़रिद ही बिल्कुल वो शख़्सियत थी
महबूब हैं वो सबके फ़िर ख़ास हो या आम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

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شاعر

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