शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

سکوں بندگی میں سکوں ہے وضو میں
سکوں سجدے میں ہے سکوں ہے رکوع میں
کبھی پیٹھ پر وار کرتا نہیں ہے
سلیقہ بہت ہے ہمارے عدو میں
محبت کا پہلا وہ خط لکھ رہا ہے
پرندہ بھی اڑنے کی ہے جستجو میں
اگر ہم زباں تم کو مل جائے کوئی
عجب لطف آتا ہے پھر گفتگو میں
کھنچا لامحالا چلا جا رہا ہوں
یہ کیسی کشش ہے نئی رنگ و بو میں
جدائی کا اکمل الگ ہی مزہ ہے
میں بس جی رہا ہوں تیری آرزو میں 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

बेगम

बेगम (१४/९/२०१८)
सुनते हो, मुहब्बत से बुलाती है जी बेगम
फिर आँख घुमा करके डराती है जी बेगम
मैं कांपने लगता हूँ उसे देख के डर से
मेकअप के बिना चेहरा दिखाती है जी बेगम
बन ठन के अगर कभी देख ले वो मुझ को कभी तो
फ़िर झूठ हमारे से बुलाती  है जी बेगम  
हाथों की नज़ाकत का बहाना भी ग़ज़ब है
कपड़े वो सभी हम से धुलाती है जी बेगम
लौकी है करेले हैं मुक़द्दर में हमारे
मंहगाई के डर से यही लाती है जी बेगम
बच्चों को तो चोरी के है नुक़्सान बताये
वालेट से मेरे पैसे चुराती है जी बेगम
रोने में कहां सानी शहर भर में है उसका
मय्यत पे बड़े चाव से जाती है जी बेगम
सुनती है इधर इससे कहती है उधर उससे
यूं आग मुहल्ले में लगाती है जी बेगम
बन्दूक़ से ना तोप से डर मुझ को लगे है
बेलन से मगर मुझ को डराती है जी बेगम
महंगाई से रहती है परेशान सदा वो
महंगा हो अगर जोड़ा तो लाती है जी बेगम
दुनिया में फ़क़त उसके ही मां बाप हैं अच्छे
पीहर के सदा क़िस्से सुनाती है जी बेगम
बातों में कहां उससे कोई जीत सका है
ख़ामोश हमें रहना सिखाती है जी बेगम
अकमल तो है स्कूल में उर्दू का ही टीचर
लोगों को तो कुछ और बताती है जी बेगम
ग़म दे के भी अकमल जो सदा रहती है बेग़म
उस शै को ही दुनिया तो बताती है जी बेगम






حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے
1
حرف ہے زندگی حرف ہی جان ہے
حرف سے ہی تو انسان انسان ہے
پیڑ دریا پہاڑ اور جنگل ہریک
حرف سے نابلد اور انجان ہے
حرف سے ہی تو انسںاں کی پہچان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے
2
حرف آواز ہے دل کے جزبات کی
دل کے احساس کی اور خیالات کی
حرف سے ہے گناہ حرف سے نیکیاں
حرف ہی جان ہے سب عبادات کی
حرف رب کا ہی تو ایک فرمان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے3

حرف ہے اک دعا حرف ہے بددعا
حرف ہے اک ندا حرف ہے اک صدا
حرف ہے ابتدا حرف ہے انتہا
حرف انداز ہے حرف ہے اک ادا
حرف خواہش بھی ہے حرف ارمان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے
4
وید بھی حرف ہے حرف قرآن ہے
حرف شلوکوں میں ہے حرف ایمان ہے
حرف میں ہے فصاحت بلاغت بہت
حرف میں ہے فہم حرف نادان ہے
حرف مذہب ہے اور حرف شیطان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے
5
حرف سے نفرتیں حرف سے پیار ہے
حرف سے جیت ہے حرف سے ہار ہے
حرف نا ہو اگر زندگی میں تو پھر
زیست مرگھٹ کی مانند سنسان ہے
حرف سے زندگی کتنی آسان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے

6
حرف سے گل زباں حرف سے خار ہے
چیر دے قلب کو حرف تلوار ہے
حرف ہے چٹپٹا حرف ہے اٹپٹا
حرف شیریں بہت حرف میں کھار ہے
حرف سے ہی تو چہرے پہ مسکان ہے
حرف ذیشان ہے حرف ذیشان ہے

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

سنتے ہو' محبت سے بلاتی ہے جی بیگم
پھر آنکھ گھما کرکے ڈراتی یے جی بیگم
میں کانپنے لگتا ہوں اسے دیکھ کے ڈر سے
میکپ کے بنا چہرا دکھاتی ہے جی بیگم
بن ٹھن کے اگر دیکھ لے وہ مجھ کو کبھی تو
پھر جھوٹ ہمارے سے ہی بلواتی ہے بیگم
ہاتھوں کی نزاکت کا بہانہ بھی غضب ہے
کپڑے وہ سبھی ہم سے دھلاتی ہے جی بیگم
لوکی ہے کریلے ہیں مقدر میں ہمارے
مہنگائی کے ڈر سے یہی لاتی ہے جی بیگم
بچوں کو تو چوری کے ہے نقصان بتائے
والیٹ سے میرے پیسے چراتی ہے جی بیگم
رونے میں کہاں ثانی شہر بھر میں ہے اس کا
میت پہ بڑے چائو سے جاتی ہے جی بیگم
سنتی ہے ادھر اِس سے کہتی ہے ادھر اُس سے
یوں آگ محلے میں لگاتی ہے جی بیگم
بندوق سے ناتوپ سے ڈر مجھ کو لگے ہے
بیلن سے مگر مجھ کو ڈراتی ہے جی بیگم
مہنگائی سے رہتی ہے پریشان سدا وہ
مہنگا ہو اگر جوڑا تو لاتی ہے جی بیگم
دنیا میں فقط اس کے ہی ماں باپ ہیں اچھے
پیہر کے سدا قصے سناتی ہے جی بیگم
باتوں میں کہاں اس سے کوئی جیت سکا ہے
خاموش ہمہیں رہنا سکھاتی ہے جی بیگم
اکمل تو ہے اسکول میں اردو کا ہی ٹیچر
لوگوں کو تو کچھ اور بتاتی ہے جی بیگم
غم دے کے بھی اکمل جو سدا رہتی ہے بے غم
اس شے کو ہی دنیا تو بتاتی ہے جی بیگم

शनिवार, 8 सितंबर 2018


गुरू (5 Sep 2018)

सभी ये पूछते हैं आजकल मुझसे गुरू क्या है
बताता हूं चलो तुमको गुरू क्या है, गुरू क्या है

गुरू वो है जो तेरी ज़िन्दगी को इक दिशा दे दे
गुरू वो है जो तुझको जागने वाली निशा दे दे
गुरू वो है जो छुड़वा दे बुरी सब आदतें तेरी
गुरू वो है जो भक्ति का तेरे दिल को नशा दे दे

गुरू ही तो विजय और हार का अंतर बताता है
गुरू ही तो सफ़लता का यहां जंतर बताता है
गुरू का साथ हो तो हारने की बात नामुमकिन
गुरू वो है जो केवल जीत का मंतर बताता है

गुरू का जो करे आदर वही सन्मार्ग पाता है
गुरू ही तो तिमिर से खींच कर ज्योति में लाता है
गुरू का काम है अपमार्जन मन का तेरे करना
गुरू करके सफ़ाई मन की कुटिया को छवाता है

गुरू का नाम आते ही निगाहो दिल मचल जाये
गुरू का स्मरण करते ही विपदा आप टल जाये
गुरू की शक्तियां कितनी हैं तुमको क्या पता अकमल
गुरू का नाम जपने से ही मन का पाप जल जाये

परमहंस के बिना स्वामी विवेकानंद कहां होते
द्रोणाचार्य के बिन भला अर्जुन कहां होते
कहां होते भला ख़ुसरू बिना बख़्तियार काकी के
गुरू होते नहीं गर तो भला शिष्य कहां होते

गुरू वो है जो भवसागर में तुझको तार देता है
गुरू वो है जो जीवन का सभी को सार देता है
गुरू की हर नज़र रहती है शिष्य की भलाई पर
गुरू वो है जो तेरी जीत पर सब हार देता है

गुरू कुम्हार की भांति हमें आकार देता है
कभी वो चोट करता है कभी आधार देता है
गुरू वो है जो करता है हमारी आत्मा पावन
गुरू वो है जो मन मस्तिष्क को आहार देता है

गुरू मिलते हैं मुश्किल से गुरू का मान तुम करना
गुरू का जो भी हो आदेश उस पर ध्यान तुम करना
सफलता उसको मिलती है जिसे सच्चा गुरू हासिल
गुरू मिल जाये क़िस्मत से निछावर जान तुम करना

ज़माने में कुछ ऐसे भी गुरू घंटाल होते हैं
सम्भलना तुम कि ये जी के बड़े जंजाल होते हैं
तुम्हें उल्लू बनाकर लूट लेंगे माल सारा ये
तुम्हें कुछ दे नहीं सकते ये ख़ुद कंगाल होते हैं
अकमल


रविवार, 2 सितंबर 2018

हम्द (अगस्त 2018) फ़ऊलुन


हम्द (अगस्त 2018) फ़ऊलुन
(1)
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
जो ख़ालिक़ है मालिक है राज़िक़ है सबका
जो ज़ाहिर है बातिन है नूरुल्हुदा है
(2)
बुलंद आसमां को बनाया है जिसने
सितारों से इसको सजाया है जिसने
ये शम्सो क़मर हैं जो सब गामज़न हैं
ख़ला में फ़िर इनको घुमाया है जिसने
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(3)
ज़मीं को बिछौना बनाया है जिसने
फ़िर उसमें से ग़ल्ला उगाया है जिसने
कहीं रेत है और कहीं पर समन्दर
कि ख़ुश्की तरी को बनाया है उसने
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(4)
जो बारिश से मुर्दा ज़मीं ज़िन्दा कर दे
जो ख़ाली हो बादल तो पानी से भर दे
जो ठ्ण्डी हवाओं से ख़ुशख़बरी भेजे
मुअत्तर ज़मीं आसमां सारे कर दे
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(5)
कि आदम को मिट्टी से जिसने बनाया
फ़िर इक बूंद से सिलसिला ये चलाया
कोई बाप है और कोई मां बहन है
ये रिश्ते बनाये तआल्लुक़ बनाया
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है

(6)
किया है उसी ने दरिन्दों को पैदा
हजर को शजर को परिन्दों को पैदा
हरेक शै को पैदा किया है उसी ने
दरख़्तों, चरिन्दों, फ़रिन्दों(अनार) को पैदा
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(7)
है पोशिश में जिसने समर को छुपाया
है ग़ल्ले के संग संग ये भूसा उगाया
गुलों को तअत्तुर उसी की अता है
है कोयल को नग़मा उसी ने सिखाया
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(8)
सभी के लिये है फ़ना इस जहां में
बक़ा बस उसी को है ज़ेबा जहां में
न वालिद है कोई न है कोई बेटा
वो मालिक है रब है जहां में सभी का
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(9)
हवा में परिन्दों को जो थामता है
जो कश्ती को दरियाओं में थामता है
पहाड़ों को जिसने ज़मीं पर जमाया
जो बादल को दोशे सबा थामता है
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(10)
वही दोनो मश्रिक़ का मग़रिब का मालिक
वही बहरे काहिल का अहमर क मालिक
जो मिलकर कभी मिल न पाते हैं बाहम
वही ऐसे दोनों समन्दर का मालिक
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(11)
वही तीन अंधेरों में हमको बनाता
वही पैदा करता है हमको जिलाता
वही ज़िन्दा रखता है हमको जहां में
वो जब चाहता फिर, है वापस बुलाता
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(12)
ये मीज़ान क़ायम उसी ने किया है
ये हक़ और इन्साफ़ उसकी ज़िया है
कि ऐराज़ जिसने भी इससे किया है
अज़ाबे इलाही से दोचार हुआ है
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है
(13)
हरेक शै के उसने बनाये हैं जोड़े
वही आसमां से है बादल निचोड़े
है सहरा को बंजर बनाया उसी ने
बनाया है मैंदा को हरियाली ओढ़े
वही है वही है वही तो ख़ुदा है
जो वाहिद है यकता है सबसे जुदा है



अकमल


अकमल 07/01/2018
बाक़ी सब कुछ मुहमल मुहमल
इक तेरी ही ज़ात है अकमल
इश्क,मुहब्बत,चाहत, उल्फत
फंस जाओगे ये है दलदल
तेरा जाना और ये आंखें
हर सु जैसे जलथल जलथल
तन को ढकना है बस मकसद
सूती कपडा हो या मख़मल
सुन कर तेरे जलवे जानां
दिल में हुई है हलचल हलचल
निस्बत जिसकी तुमसे होगी
हो जाएगा अफजल अफजल
तेरा चर्चा तेरी बातें
धड़कन धड़कन पलपल पलपल
जब से उसने सीखी उर्दू
वो लगता है अकमल अकमल



विदाई गीत


धनराज नागल (लैब असिस्टेंट रिटायरमेंट विदाई गीत 31 जुलाई 2018 गांधी स्कूल)
विदाई

कह रहीं हैं दुख में डूबी ये फ़िज़ायें अलविदा
कह रही हैं आज पुरनम ये हवायें अलविदा

ये दरो दीवार कमरे हाल और ये रास्ते
कह रहे हैं किस तरह तुमको भुलायें अलविदा

देख लो तुमसे मुहब्बत करते हैं सब किस कदर
साथ ले जाओ हमारी तुम दुआयें अलविदा

ज़िन्दगी में ग़म न आयें अब तुम्हारी फ़िर कभी
और तकलीफ़ें न तुमको आज़मायें अल्विदा

याद रखेंगे तुम्हें हम याद रखना तुम हमें
ये तो मुमकिन ही नहीं है भूल जायें अलविदा

ज़िन्दगी गुलज़ार हो अब और बस हो शादमां
कर रहे हैं रब से हम ये इल्तिजायें अलविदा

आज आना आके जाना ज़िन्दगी का है चलन
काम ऐसे हम करें कि याद आयें अलविदा

है बड़ा मुश्किल जहां में दिल को समझाना मगर
फ़िर भी समझायेंगे इसको आप जायें अलविदा

है जुदाई भी बड़ी तकलीफ़कुन अकमल मगर
आज इसको भी चलो हम आज़मायें अलविदा




अबुल कलाम को श्रद्धाँजलि (03 अगस्त 2018)


अबुल कलाम को श्रद्धाँजलि (03 अगस्त 2018)
(मफ़ऊल फ़ाईलातुन मफ़ऊल फ़ाईलात)
करता है मुल्क जिनको दिल से बहुत सलाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

ग़ुरबत में वो पले थे मिट्टी के थे वो लाल
शिकवा किया कभी ना कुछ भी रहा हो हाल
थे इल्म के दिवाने, दूजा न कुछ ख़्याल
जन्मे थे जैसे देश में करने को कुछ कमाल
तुम भी सुनो कि हैं वो इस देश के इमाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

वो सांवली सी सूरत आंखों में जो समाये
वो सादगी बला की दिल में उतर ही जाये
नज़रों में वो चमक थी जो दिल को भी लुभाये
ऐसी कशिश कि जिससे कोई भी बच न पाये
बालों का जिनके था इक सबसे जुदा निज़ाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

सूरज की मिस्ल तुम भी चाहो अगर चमकना
सूरज की तरहा तुम को यां फ़िर पड़ेगा जलना
सच्चाई की रविश है कांटों भरी सदा से
तुम सब्र ओ हौसले से इस राह पर निकलना
जिस दर्दमंद दिल की बातें हैं ये तमाम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

भारत के वो रतन थे भारत के थे वो लाल
दुनिया भी दे रही है जिनकी सुनो मिसाल
मिज़ाईलें बनाकर ताकत वो बख़्शी हमको
हैरतज़दा हैं सब ही ये देखकर कमाल
दुनिया में जिसने देश का उंचा किया था नाम (मकाम)
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

कुरआन से मुहब्बत गीता से उन्सियत थी
उनकी नज़र में अकमल इंसा की अहमियत थी
इस धर्म ओ ज़ात से वो बाला रहे हमेशा
दुनिया से मुन्फ़रिद ही बिल्कुल वो शख़्सियत थी
महबूब हैं वो सबके फ़िर ख़ास हो या आम
वो हैं अबुल कलाम वो हैं अबुल कलाम

छतों का ज़माना (२६ अगस्त से २८ अगस्त २०१८)


छतों का ज़माना (२६ अगस्त से २८ अगस्त २०१८)

छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
छतों पर जिंदगानी थी छतों पर आशियाना था

छतों पर गर्मियों में हाँ बड़ी ठंडी हवाएं थीं
छतें फिर शाम होते ही छतें क्या ख़्वाबगाहें थीं
कभी सर्दी के मौसम में बदन जब सर्द हो जाते
तो सूरज की अंगीठी की छतों पर ही शुआयें थीं
छतों पर जिंदगानी का हरेक मौसम सुहाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों पर शाम होते ही वो इक मेला सा लगता था
किसी के हाथ में मांझा कोई चरखी पकड़ता था
किसी की जब पतंग कटती तो वो मायूस हो जाता
पतंग जो काट देता फिर वो फातेह सा अकड़ता था
हरेक छोटा बड़ा जैसे पतंगों का दीवाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

पतंगों के लिये जानें भी लग जातीं थीं दांव पर
पतंग कट कर जो लहराती कभी बहती हवाओं पर
हुजूमे नौजवां में फिर बपा इक गुल सा हो जाता
पतंग की लूट मचती थी फलकपैमा सदाओं पर
वो दो पैसे का कागज था कि कारूँ का खज़ाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों से ही तो होते थे वो कारोबार उल्फत के
छतों पर ही मचलते थे परिंदे सब मुहब्बत के
छतों से ही शुरू होते थे क़िस्से लैला मजनूं के
छतों से ही तो खिलते थे नज़र में गुल अकीदत के
छतों पर ही धड़कते हर जवाँ दिल का ठिकाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था    
  
छतों पर पेंच लड़ते थे निगाहों के निगाहों से
हसीनाएं टहलती थीं बड़ी नाजुक अदाओं से
नजर का एक पल मिलना क़यामत ख़ेज़ होता था
बड़ी लज्ज़त थी अकमल उन निगाहों की शरारत में
हरेक माशूक ओ आशिक की निगाहों में फ़साना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छतों से ही तो मिलते थे सभी पैग़ाम ईदों के
निगाहो दिल लगे रहते थे छत पर सब नदीदों के
हो करवाचौथ या हो ईद सभी का छत से नाता है
छतों से चांद तकते थे सभी मिलकर उम्मीदों के
दरख्शां चांद का चेहरा बड़ा पैग़म्बराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
  
छ्तें इनआम देती थीं छ्तें इल्ज़ाम देती थीं
छ्तें बदनाम करती थीं छ्तें ही नाम देती थीं
छ्तें बेकार कर देतीं छ्तें ही काम देती थीं
छ्तें आग़ाज़ करती थीं छ्तें अन्जाम देती थीं
छ्तों से ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कितना पुराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था 
 
दिवाली में वो दीपक फ़िर छ्तों पर ही जला करते
छ्तों पर रंगबिरंगे परचमों के पर हिला करते
सगाई और शादी में अलग ही शान होती थी
वो रंग ओ रोशनी के क़ुमक़ुमे जैसे चला करते
हर इक लब पर ख़ुशी का इक अलग सा ही तराना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था

छ्तों पर सूखते कपड़े सभी हालात कहते थे
वो गोया तो नहीं थे पर सदा कुछ बात कहते थे
बिलन्गों पर टंगे कपड़ों के पीछे से कभी हम तुम
निगाहों की ज़बां से दिल के सब जज्बात कहते थे
छ्तों पर धूप में बस आशिक़ों का आना जाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था
नई नस्लों को हासिल ही नहीं छत के नज़ारे अब
मयस्सर ही नहीं उनको फ़लक के चांद तारे अब
फ़क़त बस मसनुई से क़ुमक़ुमों की रोशनी में ही
गुज़रते हैं सभी अय्याम इक जैसे हमारे अब
गया वो दौर जब छत से ये रिश्ता वालिहाना था
छतों का वो ज़माना भी बड़ा दिलकश ज़माना था



شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...