शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

कुरआन

ये कुरआन बस इक इबारत नहीं है
जो की इस पे मेहनत, अकारत नहीं है



है कुरआं से गाफिल अगर तू समझ ले
निगाहें तो हैं पर बसारत नहीं है



है कुरआन हादी, है कुरआन रहबर
जो हो इस पे मेहनत अकारत नहीं है



मुद्लल्ल, मुफ़स्सल है बरहक़ मुकम्मल
कोई इसके जैसी इबारत नहीं है



जो कहते हैं इस को न पढना समझ कर
ये इब्लीस की ही शरारत नहीं है ?

किया खर्च जिसने भी, वक्त इसमें अपना
तो फिर इसके जैसी तिजारत नहीं है



किसी एक आयत की तकजीब कर दे
किसी की भी इतनी जसारत नहीं है



मुशाबा सी इसके लिखे एक सूरत
ये जिन्न ओ बशर में महारत नहीं है



डुबो लूँ जो मैं, क़ल्ब को इसके अन्दर
तो फिर इससे बढकर तहारत नहीं है



है महरूम इससे वही क़ल्ब अकमल
की इमां की जिसमें हरारत नहीं है



अकमल

29/12/2017   
गजल
फकत मीलाद की महफ़िल सजा ली है
हिदायत से तेरा दामन तो खाली है



दुआ मजलूम की होगी न रद्द हरगिज
शिकम में उसके सब रोजी हलाली है



हमें तारीकियों का डर नहीं अब के
ये टोली जुगनुओं की हमने पाली है



मुकद्दर तो मुक़द्दर है फकत उसका
कि माँ और बाप की जिसने दुआ ली है



ग़में फ़ुरकत ने जब भी कर दिया तनहा
तुम्हारी याद की महफ़िल सजा ली है



लगा कर दिल हसीनों से ये जाना है
वफाओं का तसव्वुर ही ख्याली है



हुआ मालूम हमको, जब पड़े जूते
मुहब्बत का वजीफा भी जलाली है



ख़ुदारा ये चमन कितना है बारौनक्
यहाँ पर ईद, बैसाखी, दिवाली है



हुआ वीरान उर्दू का चमन कब से
न ग़ालिब है, न सय्यद है, न हाली है



महज़ जजबात की बुनियाद पर हमने
चमन में आग अपने ही लगा ली है



मुआलिज भी मरीजे इश्क था अकमल
कि जिस से इश्क की हमने दवा ली है



अकमल

26/12/2017 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

حمد
مستفعلن مفاعلن
ہر شے تیری حسین ہے ہر شے ہے باکمال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

بخشی ہیں تونے رات کو تاریکیاں
شدید
اور دن کو تو نے کر دیا روشن و پر جمال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

مردہ زمین تیری ہی قدرت سے جی اٹھے
تیری ہی قدرتوں سے ہیں یہ سارے ماہ سال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

یکتا ہے تو صفات میں تیرا نہیں شریک
لاثانی تیری ذات ہےتیری کہاں مثال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

سب حکم کائنات میں نافذ ہیں بس تیرے
حکموں سے اجتناب ہو کس کی ہے پھر مجال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال


تیرے ہی در پہ سر جھکےمعبود ہے تو ہی
مختار کل ہے جب تو ہی کس سے کروں سوال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

دنیا کی زندگی ہمیں گمراہ نہ کرے
کل آخرت میں ہوگا ہمیں کتنا پھر ملال
تو رب لا شریک ہے تو رب زوالجلال

دیوبند 15.10.17

حمد باری تعلی

          حمد

تو ہے رب اور تو ہے خدا
تو نے ہم کو پیدا کیا
رزق یہ تو نے ہم کو دیا
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

رات کو یوں تاریک کیا
دن کو مزین تو نے کیا
تو ہی ہے بس الفتاح
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

تو ہے علیم اور تو ہے خبیر
تو ہے سمیع اور تو ہے بصیر
تجھ سے نہیں کچھ پوشیدہ
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

تو ہے مصور اور خالق
سارے جہانوں کا مالک
تجھ سے سوا ہے کون یہاں
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

تو ہی رحیم اور تو ہی کریم
تو ہی عزیز اور تو ہی حلیم
ایک تو ہی تو ہے رحماں
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

تو ہے جامع اور نافع
تو ہے ہادی اور رافع
تجھ میں ہی سب کچھ پنہاں
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

اول تو ہے تو آخر
تو ہی معین اور تو ناصر
تو ہی واحد ایک خدا
لاالٰہ الللہ لاالٰہ الللہ

دیوبند  17.10.17


मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

स्वदेशी दीपावली

स्वदेशी दीपावली

राष्ट्रहित का गला घोंट कर
छेद  न करना थाली में   
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में

देश के धन को देश में रखना
नहीं बहाना नाली में
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में

बने जो अपनी मिट्टी से वो
दिए बिके बाजारों में
सभी के घर में खुशियां आयें
ऐसे तीज त्यौहारों में
ना अपने भारतवासी अब
जियेंगे यूं बदहाली में
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में

ऊंच नीच का भेद मिटाकर
समता भाव जगाना है
हमको अपने तन मन धन से
देश को आगे बढ़ाना है
देश को अपने ले जायेंगे
हम दौरे खुशहाली में
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में

चीन के दीपक घटिया हैं और
देश के हित में घातक हैं
पर्यावरण को नष्ट करेंगे
ये विनाश के धोतक हैं
जहर घोलने से बचना है
हमको इस हरियाली में
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में

स्वदेशी दीपक में अपने  
देश की सौंधी मिट्टी है
राम लक्ष्मण और सीता के
कदमों वाली मिट्टी है
कम कीमत और चमक दमक है
पर श्रध्दा से खाली हैं
मिट्टी वाले दिए जलाना
अब की बार दीवाली में


सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

करण्ट वाली (स्त्री) इस्तरी

करण्ट वाली (स्त्री) इस्तरी

सुबह का वक्त है
ताऊ अख़बार पढ रहा था
और पास में ही
आग पर चाय का भगोना चढ रहा है
इतने में पडोस का छोरा आया
और ताऊ से बोला , सुन ताया  !
मुझे तेरी इस्तरी चाहिये
ये सुनकर ताऊ ने छोरे से कहा
ले जा म्हारी स्त्री वा बैठी, वहां
लडके ने ताई की तरफ़ देखा और
शरमा कर बोला
अरे ताऊ या वाली नहीं
मुझे तो वो चाहिये जो गरम होवे है  !
ताऊ ने बिना नज़रे उठाये फ़िर कहा
“हां हां ! ले जा आ बहुत गरम होवे है “
छोरा फ़िर धरम संकट में फंसा
थोडा सा मुस्काया फ़िर हंसा
और फ़िर सर खुजाते हुये बोला
“ताऊ मुझे तो कपडे वाली इस्तरी चाहिये”
ताऊ की नज़रे अब भी अख़बार से न हटीं
जिस में लिखा था ट्रेन से आज दो बकरियां कटीं
ताऊ ने फ़िर ताई की तरफ़ इशारा किया  
और गम्भीर मुद्रा में ही कहा
“हां हां कपडे वाली ही है !”
“तुझे क्या ये बिना कपडों के नज़र आती है ?
“जा ले जा अगर ये साथ जाती जाती है”
छोरे ने फ़िर कहा, सर को खुजाते हुये
थोडा ज़ोर से और कुछ खिसियाते हुये
अरे ताऊ करण्ट वाली, करण्ट वाली !
करण्ट वाली इस्तरी
ताऊ ने अख़बार से नज़रों को हटाया
छोरे को इशारे से पास बुलाया
और मुस्कुराते हुये यूं फ़रमाया
“हां बेटा यही है, करण्ट वाली इस्तरी
तू एक बार ले जा के देख !
इस का करण्ट बहुत ही तगडा है
इसी बात का तो सब झगडा है


02/10/17

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

दशहरा और मुहर्रम

दशहरा और मुहर्रम

अश्विन की ये दशमी है
रावण को जलाना है
सच झूठ की उस जंग को
फिर याद दिलाना है

कुदरत का करिश्मा है
है आज मुहर्रम भी
कर्बल का महीना है
और सोग मनाना है

तारीख़ वही दस है
कर्बल हो कि हो दशमी
सर काट के लाना है
या सर को कटाना है

मकसद तो वही इक है
बस ज़ुल्म मिटाना है
ज़ालिम का पकड़ कर हाथ
दनिया को दिखाना है

इन ढोल तमाशों और
रावण के पुतलों से
क्या हम को है हासिल
बस मौज मनाना है

न जश्न का है मौक़ा
न सोग से कुछ हासिल
मक़सद को न जो समझा
बस वक्त गंवाना है

वो राम थे या हसनेन
सन्देश यही था बस
की ज़ुल्म कहीं भी हो
वो ज़ुल्म मिटाना है

इन्साफ हमेशा ही
हर दौर में जीता है
और ज़ुल्म को हर जंग में
बस मुंह की खाना है


01/10/17

बुधवार, 27 सितंबर 2017

बाबा

बाबा
बचपन में माँ कहती थी
शैतानी गर तू करेगा
तो
बाबा आ जाएगा
और तुझको पकड़ वो लेगा
पर आज जो मैं ने देखा
तो कुछ न समझ में आया
जो खुद ही गया है पकड़ा

वो हमको क्या पकड़ेगा 

धर्म

धर्म
धर्म का ये भेष है
जैसे कोई लाश हो
आत्मा निकल चुकी

जिस्म जिस्म शेष है 

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بے عنوان

فون کی گھنٹی پھر بجنے لگی۔ اس نے سرہانے رکھا اپنا موبائل اٹھایا ، نام دیکھا، اس کے بڑے بیٹے کا فون تھا۔ ادھر سے پریشان لہجے میں آواز آئی۔
’’ہیلو پاپا ، آپ کیسے ہیں  ؟  اب طبیعت کیسی ہے  ؟  ڈاکٹر نے کیا بتایا  ؟  دوا تو کھا رہے ہیں نا برابر  ؟  اور ہاں آپ بالکل پریشان مت ہونا ۔ بس اچھے سے اپنا علاج کرانا۔ میں اور پیسے ڈال رہا ہوں آپ کے اکائونٹ میں۔ اچھا اب رکھتا ہوں۔
وہ کل صبح ٹہلنے جاتے وقت ایک بائک سوار سے ٹکرا گیا تھا ۔ ٹانگ میں ہیئر لائن فریکچر ہو گیا تھا۔ بائک سوار بڑا خوش اخلاق تھا وہ ہی اسے اسپتال میں ایڈمٹ کروا کرگیا تھا۔اسپتال میں ایڈمٹ ہوئے اسے تیسرا دن ہے مگر ایک پل بھی ایسا نہیں گزرا کہ یہ فون خاموش رہا ہو۔ وہ سوچ رہا تھا کہ میں کتنا خوش قسمت ہوں ۔کتنے لوگ ہیں جو میری پرواہ کرتے ہیں۔ خاندان کا کوئی ایسا شخص نہیں ہوگا جس نے مجھے فون نہیں کیا ہوگا۔ سبھی مستقل میرے حال چال پوچھ رہے ہیں۔ اور میرے چاروں بیٹے ۔ انہوں نے بھی تو کتنی بار فون کیا۔ چاروں نے نے کتنے سارے پیسے میرے اکائونٹ میں ٹرانسفر کر دئے تاکہ میں اپنا علاج اچھے سے کرا سکوں۔ 
تبھی اس کے خیالوں کا سلسلہ توڑتے ہوئےنرس کی آواز گونجی  ’’بابا وہ آپ کو دوا کا پرچہ دیا تھا ۔ آپ نے ابھی تک دوائیں نہیں منگوائیں ہیں۔ آپ کی جانچ رپورٹ بھی ابھی تک نہیں آئی ہے   ؟
نرس نے سوالیہ نظروں سے اس کی جانب دیکھا ۔ بابا کی خاموشی نے نرس کو پریشان کر دیا ۔ اس نے الجھتے ہوئے لہجے میں کہا ۔ ’’بابا آپ کے ساتھ کون ہے  ؟  اسے بلائیے اور یہ دوائیں اور رپورٹ منگوائیے۔ جلدی، ڈاکٹر صاحب رائونڈ پر آتے ہونگے۔‘‘یہ کہہ کر وہ جواب کا انتظار کئے بنا اگلے مریض کے بیڈ کی جانب بڑھ گئی۔
چند منٹ پرانا احساس اچانک غائب ہو گیا۔ اس کی خاموش نظریں اپنے قریب کے بیڈ پر لیٹے بوڑھے مریض کو تک رہی تھیں۔ بوڑھے کے سرہانے اس کی بوڑھی بیوی بیٹھی اس کا سر اپنی انگلیوں سے سہلا رہی تھی۔ بوڑھے مریض نے اپنی آنکھیں بند کر رکھی تھیں اور اس کے چہرے پر سکون و اطمینان کی چمک جھلک رہی تھی۔اس نے اپنی نظروں کو گھمایا اور چھت کو تکنے لگا۔ اس کی خاموش نظریں چھت کو تک رہی تھیں مگر ان میں نہ جانے کیوں آنسو چھلک آئے تھے۔ اسے سمجھ میں نہیں آرہاتھا کہ اتنے سارے لوگوں کو اس کی پرواہ ہے پھر بھی وہ اسپتال میں اکیلا کیوں ہے  ؟
 

حساس


رات کے تقریباً  سوا نوَ  بجے تھے۔ رجنی اور اس کے دونوں بچے لابی میں بیٹھے ایک مشہور ڈیلی سوپ دیکھ رے تھے۔ٹی وی کی آواز کافی تیز تھی۔ 
سیرئیل میں ایک بہو اپنی ساس کو محض اس جرم کی پاداش میں کھری کھوٹی سنا رہی تھی کہ بھوک کی شدت کی وجہ سے ساس نے، اس سے پوچھے بنا کچن میں جاکر کوکر سے سالن نکال لیا تھا ۔ 
ساس کی آنکھیں پرنم اور زبان خاموش تھی۔ 
بہو نے چلاتے ہوئے آخری کلمات کہے  ’’اب یہ رونے دھونے کی نوٹنکی بند کیجئے ۔ ان کے آنے کا وقت ہو رہا ہے ۔ خبردار جو ان کے سامنے کوئی الٹی سیدھی حرکت کی تو مجھ سے برا کوئی نہ ہوگا۔ ایک تو دن بھر دفتر میں سر پھوڑتے ہیں گھر میں آکرپھر تمہاری نوٹنکی دیکھیں گے۔‘‘
سیرئیل دیکھ رہی رجنی کی آنکھیں آنسوئوں سے تر ہو چکی تھیں۔ یہ دیکھ کر اس کی چھوٹی بیٹی ناراض ہوتے ہوئے بولی  ’’ ماں جب تمہارا دل اتنا حساس ہے تو پھر تم یہ سیرئیل کیوں دیکھتی ہو‘‘
رجنی اپنے آنسوئوں کو پلّو سے پونچھنے لگی اور کچھ نہ بولی۔
گھر کے آنگن میں ، پلنگ پر ، رجنی کی ساس شدت کی بھوک سے بے چین ہو رہی تھی اور اس انتظار میں تھی کہ کب سیرئیل ختم ہوگا اور کب اسے کھانا نصیب ہوگا۔

شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...