गजल
फकत मीलाद की
महफ़िल सजा ली है
हिदायत से
तेरा दामन तो खाली है
दुआ मजलूम की
होगी न रद्द हरगिज
शिकम में उसके
सब रोजी हलाली है
हमें
तारीकियों का डर नहीं अब के
ये टोली जुगनुओं की हमने पाली है
मुकद्दर तो
मुक़द्दर है फकत उसका
कि माँ और बाप
की जिसने दुआ ली है
ग़में फ़ुरकत ने
जब भी कर दिया तनहा
तुम्हारी याद
की महफ़िल सजा ली है
लगा कर दिल
हसीनों से ये जाना है
वफाओं का
तसव्वुर ही ख्याली है
हुआ मालूम हमको, जब पड़े जूते
मुहब्बत का
वजीफा भी जलाली है
ख़ुदारा ये चमन
कितना है बारौनक्
यहाँ पर ईद, बैसाखी, दिवाली है
हुआ वीरान
उर्दू का चमन कब से
न ग़ालिब है, न सय्यद है, न हाली है
महज़ जजबात की
बुनियाद पर हमने
चमन में आग
अपने ही लगा ली है
मुआलिज भी
मरीजे इश्क था अकमल
कि जिस से
इश्क की हमने दवा ली है
अकमल
26/12/2017
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