कुरआन
ये कुरआन बस इक इबारत नहीं है
जो की इस पे
मेहनत, अकारत नहीं है
है कुरआं से
गाफिल अगर तू समझ ले
निगाहें तो
हैं पर बसारत नहीं है
है कुरआन हादी, है कुरआन रहबर
जो हो इस पे
मेहनत अकारत नहीं है
मुद्लल्ल, मुफ़स्सल है बरहक़ मुकम्मल
कोई इसके जैसी
इबारत नहीं है
जो कहते हैं
इस को न पढना समझ कर
ये इब्लीस की ही शरारत नहीं है ?
किया खर्च
जिसने भी, वक्त इसमें
अपना
तो फिर इसके
जैसी तिजारत नहीं है
किसी एक आयत
की तकजीब कर दे
किसी की भी
इतनी जसारत नहीं है
मुशाबा सी
इसके लिखे एक सूरत
ये जिन्न ओ
बशर में महारत नहीं है
डुबो लूँ जो
मैं, क़ल्ब को इसके
अन्दर
तो फिर इससे
बढकर तहारत नहीं है
है महरूम इससे
वही क़ल्ब अकमल
की इमां की
जिसमें हरारत नहीं है
अकमल
29/12/2017
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें