रविवार, 1 अक्टूबर 2017

दशहरा और मुहर्रम

दशहरा और मुहर्रम

अश्विन की ये दशमी है
रावण को जलाना है
सच झूठ की उस जंग को
फिर याद दिलाना है

कुदरत का करिश्मा है
है आज मुहर्रम भी
कर्बल का महीना है
और सोग मनाना है

तारीख़ वही दस है
कर्बल हो कि हो दशमी
सर काट के लाना है
या सर को कटाना है

मकसद तो वही इक है
बस ज़ुल्म मिटाना है
ज़ालिम का पकड़ कर हाथ
दनिया को दिखाना है

इन ढोल तमाशों और
रावण के पुतलों से
क्या हम को है हासिल
बस मौज मनाना है

न जश्न का है मौक़ा
न सोग से कुछ हासिल
मक़सद को न जो समझा
बस वक्त गंवाना है

वो राम थे या हसनेन
सन्देश यही था बस
की ज़ुल्म कहीं भी हो
वो ज़ुल्म मिटाना है

इन्साफ हमेशा ही
हर दौर में जीता है
और ज़ुल्म को हर जंग में
बस मुंह की खाना है


01/10/17

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شاعر

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