थैंक यू ! अंकल
रावण
दहन में अभी काफी वक्त बाक़ी था । दशहरा मैदान में दाख़िल होने के लिए एक बहुत लम्बी
लाईन थी । दशहरा मैदान का गेट वैसे तो बहुत बड़ा था मगर एहतियात के लिए बल्लियां
लगाकर इतना छोटा कर दिया गया था की एक वक़्त में एक ही व्यक्ति अंदर जा सकता था ।
इसके साथ ही गेट पर एक चौकीदार भी तैनात था जो लाईन में लगे लोगों में से जिस का
नंबर आ जाता था उससे टिकट लेता था और टिकट को थोड़ा सा फाड़कर वापिस लौटा देता और उस
टिकटधारी आदमी को अंदर जाने की इजाज़त दे देता ।
विजय
सिंह भी अपनी १० साल की बच्ची के साथ लाईन में लगे हुए थे । वो हर साल अपनी लाडली
बेटी को रावण दहन दिखाने के लिए लाया करते थे । आज भी वो इसीलिए आये थे मगर आज एक
बात अलग थी । हमेशा वो अपनी बिटिया के साथ मैदान के बाहर से ही भीड़ में खड़े होकर
रावण दहन देखा करते थे परन्तु आज वो मैदान के अन्दर जाकर क़रीब से इस नज़ारे को अपनी
बेटी को दिखाना चाहते थे । ऐसा बिलकुल नहीं था कि उनको इस बार रावण में या रावण
दहन में कोई ख़ास दिलचस्पी पैदा हो गई थी । बल्कि ऐसा इसलिए था कि पिछली बार उनकी
बेटी ने बड़ी मासूमियत के साथ उनसे ये आग्रह किया था कि पापा अगली बार मुझे मैदान
के अंदर से रावण को जलते हुए देखना है क्योंकि बाहर से मुझे मज़ा नहीं आता है । और यहां
से पूरा रावण भी नजर नहीं आता है । अंदर से बैठ कर देखने का मज़ा अलग ही होता है ।
विजय
सिंह ने बिटिया के आग्रह को सुनकर तुरंत वादा कर लिया कि अगली बार वो उसे मैदान के
अंदर से, कुर्सी पर बैठाकर और नज़दीक से रावण दहन दिखाएंगे । यही वजह थी की वो अपनी
बिटिया के साथ आज दो घंटे से इस लम्बी लाईन में खडे थे । ये लाईन दरअसल उन लोगों के
लिए थी जिनके पास "एंट्री पास" था । विजय सिंह इस शहर में नये थे और बहुत
ज़्यादा लोगों को नहीं जानते थे इसलिए वो
एंट्री पास का इंतेज़ाम नहीं कर सकते थे लिहाज़ा वो बिना एंट्री पास के ही भगवान का
नाम लेकर बिटिया के साथ लाइन में लग गये थे ।
दो
घंटे की मशक्क़त के बाद उसका नंबर आया । जैसे ही वो गेट पर पहुंचे टिकट चैक करने
वाले व्यक्ति ने कहा टिकट निकालो टिकट ।
विजयसिंह ने बड़ी सादगी से कहा
"सर हमारे पास टिकट नहीं है ।"
टिकट चैक करने वाले ने बड़ी बेरुख़ी से
कहा "तो आगे से हट जाइए, पीछे वालों को आने दीजिये "
विजयसिंह ने मासूमियत से कहा
"सर हमारी बात तो सुनिए....सर ..........
मगर उनकी बात मुकम्मल होने से पहले
ही टिकट चैक करने वाले ने झुंझला कर उनका बाज़ू पकड़ कर उन्हें लाईन से निकालकर साइड
में कर दिया ।
बिटिया ने सहम कर पापा का हाथ पकड़
लिया ।
विजयसिंह ने बेटी के चेहरे पर डर और
निराशा के भाव देखे तो मन भर आया । मगर थे बहुत हिम्मती । टिकट चैकर के करीब जाकर
खड़े हो गए और मौक़ा देखकर उससे कहने लगे "भाई मैं कोई बच्चा नहीं हूँ और मुझे
रावण और उसके दहन में भी कोई दिलचस्पी नहीं है । मेरी बात समझो, मैं तो सिर्फ इस
बिटिया के लिए यहाँ आया हूँ । ये रावण दहन क़रीब से देखना चाहती है ।"
टिकट चैक करने वाले व्यक्ति ने एक
सरसरी नज़र विजयसिंह पर डाली और फिर भीड़ के साथ उलझ गया ।
"टिकट दिखाइये, टिकट" और
टिकट लेकर फाड़ने और लोगों को अन्दर भेजने में व्यस्त हो गया ।
विजयसिंह बिटिया के साथ वहीं खड़े रहे
और लोगों को अन्दर जाता हुआ देखने लगे ।
थोड़ी देर बाद टिकट चैकर के करीब
पहुंचे और उसके कन्धों पर हाथ रखकर धीरे से कहने लगे "अरे यार ! तुम्हारा
क्या जाएगा, हमें भी जाने दो यार"
"ये देखो ये हमारी बिटिया है ये
अन्दर जाना चाहती है, करीब से देखना चाहती है । देखने दो तुम्हारा क्या नुकसान हो जाएगा
।"
टिकट चैकर ने चिरपरिचित अंदाज़ में एक
व्यक्ति का टिकट फाड़ते हुए जवाब दिया "देखो सर ! बिना टिकट एंट्री नहीं है,
टिकट ले आओ, मैं नहीं रोकूंगा लेकिन बग़ैर टिकट अन्दर नहीं जाने दूंगा ।" और
फिर अपने काम में व्यस्त हो गया ।
विजयसिंह के चेहरे पर मायूसी के भाव
झलकने लगे थे । बिटिया ने भीड़ की वजह से पिता का हाथ मज़बूती से थाम रखा था । उसकी
कुछ समझ में नहीं आ रहा था । उसने हिम्मत
करके पापा से पूछ ही लिया "क्या हुआ पापा हम अन्दर कब जायेंगे ?"
"अभी चलेंगे बेटा" पापा ने
धीरे से जवाब दिया ।
विजयसिंह ने एक बार फिर कोशिश की और
टिकट चैकर से रिक्वेस्ट की कि उसे अन्दर जाने दे मगर उसका एक ही जवाब था
"बग़ैर टिकट कोई अन्दर नहीं जाएगा । न ही मैं जाने दूँगा, ये मेरी ड्यूटी, आप
टिकट ले आइये ।"
बिटिया ने देखा सब लोग अन्दर जा रहे
हैं लेकिन मेरे पापा को अंकल अन्दर जाने नहीं दे रहे हैं । बहुत देर तक वहां खड़े
रहने के कारण उसकी टांगों में दर्द भी शुरू हो गया था । अचानक उसने टिकट चैकर का
हाथ पकड़ा और बड़ी मासूमियत से पूछा अंकल "आप सब को अन्दर जाने दे रहे हो मगर
मेरे पापा को आपने रोक रखा है । अंकल मेरे पापा ने मुझसे वादा किया था कि इस बार
वो मुझे अन्दर बैठाकर जलता हुआ रावण दिखाएँगे । अंकल अब हमें भी जाने दो न वरना
रावण जलना शुरू हो जाएगा और हम देख नहीं पायेंगे, प्लीज अंकल ।"
टिकट चैक करने वाले ने मासूम सी
बिटिया की तरफ देखा और कहने लगा "बेटा आपके पास टिकट नहीं है"
"तो क्या हुआ अंकल, आप मेरे पापा को नहीं जानते, वो आपको
बाद में टिकट लाकर दे देंगे ।"
"अभी तो हमें जाने दीजिये न
प्लीज़" बिटिया ने बड़ी मासूमियत से कहा ।
टिकट चैकर ने मुस्कुराते हुए कहा
"लेकिन बेटा बग़ैर टिकट तो कोई अन्दर नहीं जा सकता"
ये कहकर वो फिर अपने काम में व्यस्त
हो गया ।
रावण दहन शुरू होने वाला था । बिटिया
के चहरे पर मायूसी थी । वो लाचारी के साथ टिकट चैकर को देखा रही थी और खामोश खडी
थी ।
थोड़ी देर के बाद टिकट चैकर की नज़र
फिर विजयसिंह और उसकी बिटिया पर पड़ी जो अभी तक वहीं खड़े थे और उम्मीद भरी नज़रों से
उसी की जानिब देखा रहे थे ।
टिकट चैकर ने बिटिया को इशारे से अपने
क़रीब बुलाया । और फिर उसने अपनी जेब से दो टिकट निकालकर चुपके से उसकी मुटठी में
थमा दिए और विजयसिंह से बोला "लाईन में आईये, लाईन में आईये "
विजयसिंह वहीं से लाईन में लगे और
टिकट चैकर ने टिकट फाड़ कर उन्हें अन्दर प्रवेश दे दिया ।
बिटिया ने मुस्कुराते हुये अंकल की
तरफ हाथ से बाय बाय का इशारा किया और तुतलाती ज़बान में कहा "थैंक्यू अंकल"
टिकट चैकर ने भी मुस्कुराते हुए जवाब
दिया "यू आर वेलकम बेटा "
तीनों का चेहरा अजीब सी खुशी के अहसास से चमक रहा था ।
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