शनिवार, 15 जून 2019

बाप

बाप
चाहता वो भी है दिलो जाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

काम लेता है बस निगाहों से
दूर रखता है सब गुनाहों से
ख़ूब रखता है वो ख़बर सबकी
दूर करता नहीं पनाहों से
वो नहीं है तो घर हैं, वीरां से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

लब को जुंबिश से रोक देता है
बस वो नज़रों से चूम लेता है
ना वो ऐलान प्यार का करता
ना ज़बां से ही कुछ वो कहता है
चाहता है अगरचे वो जां से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

अपने ख़ूं का बना के वो दाना
रोज़ लाता हलाल है खाना
रोज़ करता जिहादे अकबर है
रोज़ लड़ता है जंग दीवाना
क्या कशाकश है कुफ्र ओ ईमाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

खूब करता है फिकरे मुस्तक़बिल
चाहता है कि हम बनें क़ाबिल
ख़ुद उठाता है सौ तरह के ग़म
ताकि हमको हो हर ख़ुशी हासिल
हम ही समझे नहीं थे नादाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

साथ है ज़िन्दगी की राहों में
हम उसी की हैं बस पनाहों में
प्यार उसका नहीं दिखावे का
हाँ वो लेता नहीं है बाहों में
हम को निस्बत उसी के दामां से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

ईद का दिन करीब आता है
सबके कपड़े खरीद लाता है
ख़ुद पुराना पहन के इक कुर्ता
देखकर हमाको मुस्कुराता है 
हमको पाले बड़े ही अरमां से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

ला के देता है वो खिलोने भी
कुछ है महंगे तो औने पाने भी 
एक आंसू भी देख ना पाए
हमको देता नहीं है रोने भी
खुश वो रखे किसी भी दरमाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

ज़िद जो करते थे हम खिलोने की
साथ में फिर अदा वो रोने की
कौन सी ज़िद है जो अधूरी है
ज़िद मुकम्मल सभी उनहोंने की
सोचकर आज हम हैं नाज़ां से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

माँ के कदमों तले कि जन्नत है  
बाप की ज़ात बाब ऐ जन्नत है
उसकी मर्ज़ी में है रज़ा रब की
बाप है तो ख़ुदा की रहमत है
सब की खुशियों के बस वो ख्वाहाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से

या ख़ुदा उन पे तू रहम फरमा
ख़ास अपना तू ये करम फरमा
ख़ुल्द में इक मक़ाम आला तर
हक़ में उनके ख़ुदा रक़म फरमा
उनके आमाल सब हों ताबाँ से
बाप का प्यार कम नहीं माँ से



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شاعر

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