फ़ैशन
10 बजे
का वक़्त था, में पडौस में एक साईकिल मिस्त्री
के यहाँ बैठा अपनी साइकिल के ठीक होने का इंतज़ार रहा था । एक बच्चा यही कोई 10-11 साल की उम्र का साइकित की दुकान पर आया । उसके पास एक इस साइकित
की हालत बड़ी ख़स्ता थी । साइकित का पीछे का मडगार्ड टूटा हुआ था । दोनों टायर घिस चुके
थे । घन्टी थी नहीं केवल अवशेष स्वरूप उसकी क्लिप हैंडत पर लगी रह गई थी । और तो और
साइकित का एक पैडल भी नहीं था । मैं सोच में पड़ गया कि बिना एक पेंडल के ये लड़का
साइकित कैसे चलाता होगा ? मगर
फिर ख़ुद की बेवकूफी पर मुस्कुराते हुए खुद से कहने लगा अरे यार ! साइकिल मरम्मत करवाने
के लिए ही तो ये दूकान पर आया है । अचानक उसकी तेज़ आवाज़ ने मेरी सोच के सिलसिले को
तोड़ दिया । अंकल उसने मेरी साइकिल के पंचर में व्यस्त मिस्त्री को आवाज़ देते हुए
कहा । "अंकल आपके पास साइकिल के पहियों में लगाने
वाली चमकदार मछलियाँ है क्या ? वो
रेडियम वाली वो जो चक्के की ताड़ियों में लगाते हैं” उसने स्पष्ट करते हुए कहा । मिस्त्री
ने नज़र उठाये बिना असहमति में गर्दन हिलाते हुए कहा “नहीं ख़त्म हो गई है ।“ दो तीन
दिन बाद ते तेना ।" लड़के का चेहरा उतर गया । वो कुछ सोचकर इधर उधर देख रहा था
। मुझसे रहा न गया और मैं ने उससे मुखातिब होते हुए कहा बेटा मछलियों से ज्यादा ज़रूरी
तो तुम्हारी साइकिल का पेंडल है । पहले इसको तो ठीक करवाओ । उसने उचटती हुई आवाज में
जवाब दिया “नहीं अंकत ! आपको पता नहीं । ये मछलियों का फैशन है । मुझे तो यही
लगवानी हैं ।“
मैं ने फिर पूछा “मगर बगैर पेड़त के साइकित
कैसे चता पाओगे ? " उसने
जवाब दिया है अंकल चला लेता हूँ अब आदत हो
गई है ।“ और ये कहकर वो एक पेंडल से ही साइकिल पर सवार होकर तेज़ी से निकल गया । मैं
सोच रहा था कि हमें क्या हो गया है ? हालात से समझौता कर लेना अच्छी बात है लेकिन हम
ग़ैर ज़रूरी चीजों के पीछे क्यूँ भाग रहे
हैं ? क्या ये बेवक़ूफी नहीं है ? अब आवश्यकता से कहीं अधिक फैशन का दिखावा महत्वपूर्ण
हो गया है । ये बाज़ार की शक्तियाँ हमें किस और ले जा रही हैं ।
अकमल नईम सिद्दीक़ी
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