शनिवार, 10 सितंबर 2022

सच्ची खुशी

सच्ची खुशी 

पिछली एक सदी में जो क्रांतिकारी परिर्वतन हुआ है उसके पीछे प्रमुख कारण है विज्ञान और प्रोद्योगिकी का तीव्र विकास । परन्तु इसके साथ ही इस विकास से अनुचित लाभ कमाने के लिये पूंजीपतियों ने इसके साथ उपभोक्तावाद को जोड़ दिया है। विज्ञान द्वारा रचित उपकरण आज हमारी दिनचर्या का एक आवष्यक अंग हो नहीं गये हैं बल्कि बना दिये गये हैं और यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रखी गई है । और इसके चलते उपभोक्तावाद ने हमारी सोच तक बदल डाली है । इंसान सदैव से ही जिस चीज को खोजता रहा है वो है मन की ख़ुशी । वैज्ञानिक तरक्की और उपभोक्तावाद ने एक एैसी संस्कृति को जन्म दिया है जिसमें अधिकाधिक लोग सफलता, संतोष और ख़ुशी के अर्थ ऐशो आराम की चीजों के अधिकाधिक उपयोग में तलाशते हैं ।
 आज हम टी.वी., वी.सी.डी., वाशिंग मशीन, मिक्सी, गीजर, वैक्यूम क्लीनर कम्प्यूटर, लैपटाप, इन्टरनेट, मोबाइल, कार जैसी भौतिक वस्तुओं में खुशी ढ़ूंढ़ रहे हैं और एक के बाद एक इनका अम्बार अपने घरों में लगाते जा रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद कभी तो हमें स्थायी खुशी प्राप्त होगी इसीलिये ये सभी इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद या अन्य इसी तरह के मशीनी आराम प्रदान करने वाले उत्पाद हमारी आवश्यकता और मजबूरी बनते जा रहे हैं । कुछ समय तक तो ये उत्पाद खुशी देते है लकिन थोड़े समय बाद यह खुशी ग़ायब हो जाती है और फिर हम चल पड़ते हैं पुनः खुशी की तलाश में और खरीद लाते है एक और प्रोडक्ट जो न केवल हमारी गाढ़ी कमाई खा जाता है अपितु उन गरीबों का हक़ भी मार जाता है जो आपको उन्हें अदा करना चाहिये था । और साथ ही ले जाता है आपकी थोड़ी सी आत्मनिर्भरता और बदले में देता है मशीन की गुलामी जिसके बिना थोड़े समय बाद आप स्वंय को पंगु समझने लगते हैं । 
उपभोक्तावादी शक्तियों ने बड़ी चतुराई से हमारी सोच परिवर्तित की है । उन्होने अपने उत्पादों को हमारी खुशी, हमारे विकास, हमारे सभ्य होने और हमारे माडर्न होने से सम्बद्ध कर दिया है । अर्थात यदि आपके पास जानीमानी कम्पनियों के उत्पाद नहीं हैं तो आपको लगने लगेगा कि आप न तो विकसित हैं, न सभ्य हैं आप बैकवर्ड हैं, पिछड़े हुये व्यक्ति हैं आप ज़माने से पीछे हो गये हैं आपके भीतर एक हीन भावना का विकास होने लगेगा और आपसे आपकी स्वभविक खुशी दूर होती चली जायेगी इसीलिये आज पूरी दुनिया के लोग इन तमाम उत्पादेां और मशीनों से अपने घरों को आरास्ता करना चाहते हैं ताकि वो मार्डन और आधुनिक बने रहें सभ्य और समझदार कहलायें और उनको मन की खुशी प्राप्त होती रहे फिर चाहे इस खुशी को खरीदने के लिये उन्हे भ्रष्टाचार को ही क्यों ना अपनाना पड़े । 
वर्ड वाच इन्स्टीट्यूट की एक रिपोर्ट ”ट्रान्सफोर्मिंग कलचर्स फ्रॉम कन्ज़्यूमरिज़्म टू सस्टेनेबिलिटि” के अनुसार वर्ष 2008 में दुनिया भर में 6.8 करोड़ वाहन, 8.5 करोड़ रेफ्रिजरेटर, 29.7 करोड़ कम्प्यूटर और 1.2 अरब मोबाइल खरीदे गये । 1960 में दुनिया में उपभोग पर खर्च 49 खरब डॉलर था जो 2006 तक आते आते 300 खरब डॉलर हो गया है । अर्थात उपयोग पर ख़र्च छः गुना बढ़ा है जबकि इस दौरान जनसंख्या केवल 2.2 गुना बढ़ी है। स्पष्ट है कि इंसान की उपभोग की भूख अंजाम की परवाह किये बिना बढ़ती जा रही है । 
जिस रफ्तार से ये उत्पाद और इनका उपभोग बढ़ रहा है उसी तेज़ी से धरती की प्राकृतिक सम्पदा खनिज, धातुओं और जीवाष्म ईंधन का दोहन भी बढ़ रहा है । उपभोक्तावादी यह जीवन शैली पृथ्वी के विनाश का कारण बनती जा रही है और पृथ्वी के विनाश से जुड़ा है समस्त मानव जाति का विनाश । और हम खुद अपनी धरती को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। उच्च उपभोग वाली जीवन शैली जिसका मूल मंत्र है खाओ पिओ और मौज करो, जहां प्रत्यक्ष रूप से बडी खुशी देने वाली प्रतीत होती है परन्तु जब यह खुशी हम से इसकी कीमत वसूलती है तो अहसास होता है कि यह खुशी तो बड़ी महंगी है। जहां थोडे समय के लिये यह शैली हमारे जीवन को बड़ा आसान बनाती है वहीं तनाव, कर्ज, बीमारियां और मृत्यु का बढ़ना इसके घातक दुष्प्रभाव भी है। दुनियां में प्रतिवर्ष मरने वाले लोगों में से आधे से अधिक लोग हृदय रोग या गुर्दे से सम्बंधी रोगों से मरते हैं तथा डायबिटीज़ और सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गवांते हैं। स्पष्ट है कि स्मोकिंग, शराबनोशी, ड्रग्स की लत , पोष्टिक भोजन की अपेक्षा फास्टफूड, शारीरिक श्रम की कमी, विलासिता की वस्तुओं का उपयोग, अनैतिक मनोरंजन आदि सभी मोटापा, तनाव, माईग्रेन, डायबिटीज़, हार्ट अटैक जैसी शारीरिक और ईर्ष्या, जलन, द्वेष, राग जैसी विकृत मानसिक बीमारियों को जन्म देते है। और तथाकथित बहुप्रचारित क्षणिक खुशी अन्ततः इसकी बहुत बड़ी क़ीमतमत वसूल कर मनुष्य का जीवन बर्बाद कर देती है और मन का चैन, सूकूंन और संतोष जैसी स्थितियों का हरण कर लेती है । 
अब भी समय है हमें जागना होगा, हमें पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण से बचना होगा, हम क्यों नहीं समझते कि जिस जीवन शैली को हम अपना रहे हैं उसी जीवन शैली ने पाश्चात्य देशों की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और राजनैतिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर दिया है । वे अपने इस तथाकथित खुशी प्रदान करने वाले विकास के दुष्परिणामों से घबराकर वास्तविक खुशी और शांति की तलाष में भटक रहे है । हमें इस समस्या से निपटने के लिये उसी की तरफ लौटना होगा जो हमारा सच्चा पालहार है समस्त ब्रहमाण्ड का रचियता है उसी की शरण में हमें अपनी समस्याओं का हल मिल सकेगा। 
कुरआन कहता है बेशक दिलों का चैन और सुकून और खुशी अल्लाह की याद में है । इसी तरह फुज़ूल खर्ची करने वालों को शैतान का भाई कहा गया है । उपरोक्त दोनो तथ्यों को ध्यान में रखकर समझे तो स्पष्ट हो जायेगा कि जिस सच्ची खुशी की तलाश में हम भटक रहे हैं वो वास्तव में सादगी, साधारण जिन्दगी और अपने रब की स्तुति में है । चैन और सुकून कभी भी भौतिक वस्तुओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि खुशी, चैन और सुकून भौतिक वस्तु या स्थिति नहीं है । हां ! हम खुशी को खरीदने के लिये जिन भौतिक वस्तुओं पर बेतहाशा खर्च कर रहे हैं उन्होने हमें शैतान का भाई अवश्य बना दिया है। शैतान के भाई का अर्थ है हम भी शैतान हो गये हैं और सुख, शान्ति कभी भी शैतान के नसीब में कैसे हो सकती है ? 
इसीलिये इस्लाम कहता है कि वो आदमी कभी ग़रीबी और तंगदस्ती में मुब्तला नहीं हो सकता जो क़नाअत से बसर करता है तथा अपने कमाये माल पर ना तो कुण्डली मार कर बैठ जाता है, न ही आंख मूंदकर बेतहाषा खर्च करता है । साथ ही अपने माल में से हाजतमंद लोगों का हिस्सा भी रखता है । इसके दो फायदे हैं ना तो आदमी खुद मुफ़लिस रहता है और ना समाज के अन्य व्यक्ति तंगदस्त। यही मंत्र है एक सम्पन्न और सुखी समाज के निर्माण का । 
गीता भी इस विषय में ये कहती है कि इन्द्रियों को राग और द्वैष से मुक्त कर, खुद के वष में करके जब मनुष्य विषयों को संयम से ग्रहण करता है तो वह प्रसन्नता और शान्ति को प्राप्त करता है । स्पष्ट है कि कुरआन और गीता का मूल मंत्र खुशी के संदर्भ में एक ही है और वह है संयत जीवन । 

        
                                                                                                                    अकमल नईम सिद्दीक़ी
                                                                                                                         9413844624

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شاعر

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