रामबाण चूरन
भाइयों, बहनों, दोस्तों सहेलियों,
नौजवानों, बुजुर्गों, माँओं और बेटियों सभी को हमारा सादर प्रणाम, राम राम, सत
श्री अकाल और आदाब ! लो जी आ गया बरेली वाले वैध शास्त्री प्रसाद जी का नया उपहार,
आप सभी के लिए .............एक ऐसा प्रोडक्ट जो पिछले सत्तर सैलून से आप सभी का
मनपसंद बना हुआ है । जी हाँ ! आयुर्वेदिक
जड़ी बूटियों से बना अत्यंत लाभकारी और चमत्कारी रामवाण चूरन ।
भाइयों ये है सत्तर वर्षों से आज़माया
हुआ, वैद्य शास्त्री प्रसाद का शानदार फार्मूला जिसका नाम ज़रूर रामबाण चूरन है
लेकिन आप इसे केवल चूरन समझने की भूल हरगिज़ न करना ! ये कहते हुए उस चूरन वाले व्यक्ति
ने अपने कंधे पर लटकाए हुए झोले में से दो डिब्बे रामबाण चूरन के निकाले और अपने
दोनों हाथों में लेकर उन्हें हवा में ऊपर की और लहराया ताकि सवारियों से खचाखच भरे
डिब्बे में मौजूद हर नजदीक और दूर बैठा व्यक्ति इन डिब्बों को देख सके । भीड़ में
किसी तरह की कोई हलचल नहीं हुई क्योंकि मुसाफिरो के लिए ये बहुत ही साधारण और रोज
घटित होने वाली घटना थी ।
चूरन फ़रोश चूरन के डिब्बों को वापिस
लोगों के सामने किया और बोलने लगा “हाँ तो साहिबान, कद्रदान, मेज़बान ! आपको चाहे
कब्ज़ हो या दस्त आते हों , गैस
बनती हो या एसिडिटी से परेशान हों , बदहज़मी
हो अजीर्ण हो , अपच हो हो या खाया पिया
शरीर को न लगता हो, तो लीजिये आ गया है इन सब बीमारियों का एक शर्तिया इलाज, एक
रामबाण इलाज जी हाँ ! रामबाण चूरन । सत्तर वर्षों से जाना पहचाना नाम । बरेली वाले
वैद्य शास्त्री प्रसाद का रामबाण चूरन । एक डिब्बे की क़ीमत है सिर्फ डेढ़ सौ रुपये..........
डेढ़ सौ रुपये........... डेढ़ सौ रुपये........ ये कहते हुए उसने डिब्बे को लोगों
के सामने घुमाया । मंगर कम्पार्टमेंट में अब भी कोई हलचल न हुई । मुसाफ़िर बदस्तूर
उसे नज़र अंदाज करते रहे ।
चूरन फ़रोश ने अपने हाथ में लिए हुए
दोनों डिब्बों को वापिस अपने झोले में डाल दिया और एक दूसरा डिब्बा निकाला । उसने
इस डिब्बे का ढक्कन खोल दिया और उसमें से एक चम्मच निकालकर दिखाते हुए फिर से कहने
लगा देखिये भाइयों और बहनों ये सौ ग्राम का रामबाण चूरन का डिब्बा है जब आप इसे
खोलते हैं तो इसमें आपको मिलता है ये स्टील का बेहतरीन और खूबसूरत चम्मच । आपके
लिए बिलकुल मुफ्त में दिया जाता है । आधा चम्मच चूरन रोज़ाना रात को नीवाये पानी से
लीजिये और सुबह आराम से निपटिये । जी मिचलाना,
सर दर्द, पेट
दर्द, अफ़ारा, बादी, घुटनों का दर्द रीह का दर्द, बाय का दर्द, जी हाँ ! हर दर्द का
केवल एक ही इलाज............रामबाण चूरन...........रामबाण चूरन । जिस भाई को टेस्ट
करना है वो कर सकता है । ..................... पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास
करें । सत्तर बरसों पुराना जांचा परखा नुसख़ा........... लीजिये........ चखिए.........
टेस्ट कीजिये........... ये कहते हुए उसने बारी बारी से चम्मच में चूरन लेकर मुसाफिरों
की तरफ़ बढ़ाया । तीन चार बुजुगों ने अपनी अपनी हथेती झट से आगे बढ़ा दी कम्पार्टमेंट
में थोड़ी थोड़ी से हलचल शुरू हो चुकी थी ।बुजुर्गों की देखा देखी कुछ मनचले नौजवानों
ने भी अपनी हथेतियाँ आगे कर दी । चूरन
फरोश ने तेज़ी से सभी हथेलियों पर थोड़ा थोड़ा सा चूरन सजाना शुरू कर दिया । लोग फुंकारते
हुए नागों की तरह चटाचट अपनी लपलपाती और लार टपकाती ज़बान से मुफ़्त का चूरन चाटने
में मसरूफ हो गए । पूरे कम्पार्टमेंट में चूरन की अजीब सी खट्टी खट्टी खुशबु तैरने
लगी । बच्चे, नौजवान, बुज़ुर्ग, औरतें सभी मुफ्त के चूरन से अपनी ज़बान को आनन्दित
करने में मगन थे कि चूरन फरोश ने अपना अगला दांव चला । उसने मुफ़्त का चूरन चाट रहे
लोगों से चूरन पर तब्सिरा करना शुरू कर दिया ।
“हाँ भाई साहब, चूरन का टेस्ट कैसा है
?” उसने चूरन चाट रहे एक मुसाफिर से मुख़ातिब
होते हुए पूछा । “टेस्ट तो बहुत अच्छा है भैया” मुसाफिर ने गर्दन हिलाते हुए कहा ।
“हाँ जी भाई साहब ! कैसा लगा टेस्ट ?”
चूरन फरोश ने एक मोटे से पेट वाले व्यक्ति से पूछा जो अपनी हथेली का चूरन पूरा चाट
चुका था और हथेलियों को अपनी पेंट से रगड़ का साफ़ कर रहा था ।
“चूरन बढ़िया है भाई............ बढ़िया
है ...........” मुसाफिर ने चूरन फरोश की जानिब देखे बिना जवाब दिया ।
“भाई साहब ! ये जो आपका पेट फूल रहा है
न, ये कब्ज़ और अफारे की वजह से है । एक डिब्बा खा लो वैध जी की चूरन का फिर देखो
क्या कमाल होता है ।
“हूँ ...हूँ” कहते हुए और
गर्दन को इधर उधर हिलाते हुए उस मुसाफिर ने चूरन फ़रोश को नज़र अंदाज़ करने के लिए
खिड़की से बाहर की ओर देखना शुरू कर दिया ।
चूरन फरोश की कोशिशें जारी थी और मुसाफिरों का
इम्तिहान । मुसाफिर किसी तरह चूरन फरोश के
किसी दांव में नहीं आ रहे थे, उनके
लिए ये रोज़ का तजुर्बा था मगर चूरन फरोश भी पिछले कई सालों से, रोज़ाना तीस चालीस डिब्बे
ऐसे ही मुसाफिरों को बेच ही देता था । ऐसा
महसूस होता था मानों चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है ।
अब चूरन फ़रोश ने एक आफ़र पेश किया “दोस्तों
और भाइयों ! क्या आपको मालूम है आज का दिन आपके और हमारे लिए बहुत विशेष है......
विशेष इसलिए क्योंकि आज ही के दिन.......... जी हाँ ठीक आज ही के दिन.........
हमारे वैध जी का इस धरती पर अवतरण हुआ था...... इसलिए आज के दिन आप सभी के लिए एक
स्कीम है, जी हाँ ! एक शानदार आफ़र......
ये बेहतरीन रामवाण चूरन जो यूं तो अनमोल है लेकिन जिसकी कीमत मात्र डेढ़ सौ रुपये निर्धारित
है..... आज के दिन और केवत आज के दिन आप को डेढ़ सौ में नहीं मिलेगी......... स्कीम
के तहत आपको डेढ़ सौ रूपये में चूरन के दो डिब्बे दिए जायेंगे । यानि एक के साथ एक
बिलकुत मुफ्त । दोहरा फायदा डबल प्रॉफिट” ये कहते हुए चूरन फरोश ने वापिस चूरन के दो
डिब्बे अपने झोले से निकाले और लोगों के सामने पेश करते हुए कहने लगा “जी हाँ ! एक
के साथ एक मुफ़्त.... सिर्फ आज के दिन....जल्दी कीजिए...जल्दी । भीड़ में कोई ख़ास
हलचल नहीं हुई । किसी ने भी चूरन ख़रीदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । मगर चूरन फरोश के चेहरे पर कोई शिकन न था ।
“भाइयों और बहनों ! मुझे माफ करना । मैंने
आपको गलत ऑफर बता दिया । हाँ भाइयो और बहनों ऑफर ये नहीं है । ऑफर है एक रामबाण चूरन के साथ दो रामबाण चूरन के
डिब्बे मुफ्त...... यानी एक डिबे की कीमत डेढ़ सौ नहीं...... सौ भी नहीं..... सिर्फ
पचास रुपये .... जी हाँ ! सिर्फ पचास रुपये” चूरन फरोश ने एक और फंदा फेंका ।
तभी भीड़ में से एक बुजुर्ग ने मरी हुई
सी आवाज में पूछा “ओ ! भय्या हमे तो सिर्फ़ एक डिब्बा चाहिए । एक डिब्बा दे दो और ये पचास
रूपये ले लो” बुज़ुर्ग ने पचास का नोट चूरन फ़रोश की तरफ बढ़ाते हुए कहा ।
चूरन फरोश ने पचास का नोट लेकर एक डिब्बा
बुजुर्ग के हाथों में थमा दिया और फिर शुरू हो गया । “हाँ तो साहिबान, कद्रदान, मेज़बान आपको चाहे कब्ज़
हो या दस्त आते हो, गैस
बनती हो या एसिडिटी से परेशान हो, बदहज़मी हो अजीर्ण हो, अपच हो भूख ना लगती हो, या
खाया पिया शरीर को न लगता हो तो लीजिये आ गया है इन सब बीमारियों का एक शर्तिया
इलाज । एक रामबाण इलाज.... जी हाँ रामबाण
चूरन सत्तर वर्षों से जाना पहचाना नाम, बरेली का रामबाण चूरन । एक डिब्बे की
कीमत है सिर्फ डेढ़ सौ रुपये........... जी नही डेढ़ सौ रुपये में तीन है......वैध जी
के जन्म दिन पर खुशियाँ मनाइए..... डेढ़ सौ रुपये में तीन डिब्बे लीजिये । वैध जी
की लम्बी उम्र की दुआ कीजिए । “ कम्पार्टमेंट में बैठे लोगों के कानों पर जूँ भी
नहीं रेंगी ।
चूरन फरोश अपने पहले ग्राहक की तरफ
मुतवज्जे हुआ और उसने चूरन ख़रीदने वाले बुज़ुर्ग से कहा कि वो चूरन का डिब्बा खोलें
और चूरन को चख क्र इसके बारेमें कुछ बताएं । बुज़ुर्ग ने चूरन का डिब्बा खोलकर थोड़ा
सा चूरन चखा और अपनी गर्दन को ऊपर नीचे हिलाते हुए चूरन की गुणवत्ता को सर्टिफिकेट
प्रदान किया । तभी अचानक चूरन फरोश ने बुज़ुर्ग का दिया हुआ पचास का नोट हवा में
लहराया और पब्लिक से मुख़ातिब हो कर कहने लगा “भाइयों और बहनों आज का दिन धमाल ही
धमाल का दिन है ...........ये कमाल का दिन है .........आज वैध जी का जन्म दिन ही
नहीं है बल्कि आज वैध जी की कंपनी “चुन्नी ला एन्ड संस” का भी जैम दिन है इसलिए इस
दुगुनी खुशी के अवसर पर बाबा जी के लिए ये चूरन बिलकुल मुफ्त .......” ये कहते हुए
उसने चूरन का डिब्बा ख़रीदने वाले बुज़ुर्ग को उनका पचास का नोट लौटा दिया । बुज़ुर्ग
ने हैरत और ताज्जुब के तास्सुरात के साथ, तेज़ी से पचास का नोट ले लिया और
कम्पार्टमेंट में बैठे लोगों की जानिब फातिहाना मुस्कान से देखने लगे ।
तभी भीड़ में से एक और मरियल सी आव़ाज
आई “भाई मुझे भी एक डिब्बा देना” ये कहते हुए एक बुज़ुर्ग औरत ने चूरन फरोश की तरफ
पचास का नोट बढाया । चूरन फरोश ने नोट हाथ में लेकर बुज़ुर्ग औरत को चूरन का डिब्बा
पकड़ाया और उससे कहने लगा “माताजी चूरन का डिब्बा खोलिए” । बूढी औरत ने डिब्बा खोला
तो चूरन फरोश बोला “देखिये इसमें स्टील का चम्मच है ?” बुढ़िया ने अपने सीधे हाथ की
उँगलियों को डिब्बे में दाल कर टटोला तो उसके हाथ में स्टील का छोटा सा चमचमाता
हुआ चम्मच आ गया । उसने चम्मच को डिब्बे से निकाल का चूरन फरोश को दिखाया । चूरन
फरोश ने फिर कहा “अब आप चूरन को टेस्ट कीजिए “ बुधिया ने चम्मच से थोड़ा सा चूरन
निकाल कर टेस्ट किया और कहा “बढ़िया है “
चूरन फरोश ने सब के सामने बात की तसदीक़
करवाने के उद्देश्य से, बुढ़िया से फिर वही सवाल ज़रा उंची आवाज़ में दोहराया “माता
जी चूरन कैसा है ?”
“अच्छा है बेटा ! बहुत अच्छा है,”
बुढ़िया ने भी थोड़ा जोर से कहा ।
चूरन फरोश ने पचास का नोट वापिस हवा
में लहराया और कहने लगा “भाइयों और बहनों कम्पनी की सालगिरह सेलिब्रेट कीजिए” और
येकहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ बुढ़िया का पचास का नोट बुढ़िया
को लौटा दिया । बुढ़िया ने भी हैरत और खुशी के मिले जुले तास्सुरात के साथ पचास का
नोट तेज़ी से हाथ में पकड़ लिया ।
अचानक कम्पार्टमेंट में हलचल बढ़ गई । लोगों
ने एक पल के लिए एक दूसरे का मुंह देखा और फिर एक शोर सा कम्पोर्टमेंट में गूंजने
लगा । मुझे भी देना......... मुझे भी देना...... हवा में पचास पचास के नोट लहराने लगे । चूरन फरोश एक हाथ से नोट पकड़ने लगा और दूसरे हाथ
से लोगों को डिब्बे पकड़ाने लगा और साथ साथ कहता जाता था “डिब्बे को खोलिए, चैक
कीजिए इसमें चम्मच है या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है ?” इस दौरान उसने ऐसे तीन चार और लोगों के पचास
पचास रूपये लौटाए जिन्होंने उसे चूरन के डिब्बे से चम्मच निकाल कर दिखाया और चूरन
को टेस्ट करके उसकी तारीफ़ की ।
ट्रेन की रफ्तार कम होती जा रही थी और चूरन
फरोश की रफ़्तार में इज़ाफ़ा होता जा रहा था । अब वो तेज़ी से पैसे ले रहा था और
डिब्बे दे रहा था । साथ ही अपनी बात दोहराता जता था “डिब्बे को खोलिए, चैक कीजिए
इसमें चम्मच है या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है ?” मगर अब वो किसी के पैसे लौटा नहीं रहा था ।
कम्पार्टमेंट में मौजूद तक़रीबन सभी सत्तर अस्सी लोगों ने चूरन ख़रीदा था । चूरन
फ़रोश धीरे धीरे भीड़ के साथ सरकते हुए गेट के बिलकुल करीब हो चुका था । पूरे
कम्पार्टमेंट में लोग चूरन के डिब्बे लिए बैठे थे । बहुत से लोग अपना डिब्बा खोल
रहे थे, बहुत से लोग चूरन के डिब्बे में स्टील का चम्मच तलाश कर रहे थे, कुछ चूरन
चखने की स्टेज में थे और जो इन सब से निवृत हो चुके थे वो चूरन फ़रोश से अपने पचास
रूपये वापिस पाने के मुन्तज़िर थे ठीक वैसे ही जैसे अब तक चूरन फरोश सात आठ ख़रीदारों
को लौटा चुका था । ट्रेन की रफ़्तार कम हो चुकी थी । शायद कोई छोटा स्टेशन आने वाला
था । चूरन फरोश बराबर कहे जा रहा था “डिब्बे को खोलिए, चैक कीजिए इसमें चम्मच है
या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है ?”
बड़ी आहिस्ता, आहिस्ता ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म
पर रुकी और अचानक बड़ी फुर्ती के साथ चूरन फरोश ट्रेन से उतरा और कहीं गायब हो गया ।इससे
पहले कि लोग कुछ समझ पाते ट्रेन ने पुन: चलना शुरू कर दिया था
पूरा कम्पार्टमेंट चूरंनमय था ।
कम्पार्टमेंट में चूरन की खट्टी मीठी खुश्बू के साथ, चूरन के असर से पेट में पैदा होने वाली बदबूदार हवा की बू भी
शामिल हो गई थी जिसकी वजह से कम्पार्टमेंट की आबो हवा में दिल्ली शहर के प्रदूषण
जैसा महसूस होने लगा था । पूरे कम्पार्टमेंट में सन्नाटा छाया हुआ था । ट्रेन ने
गति पकड़ ली थी ।
सहसा पिछले कम्पार्टमेंट से एक मंजन फ़रोश
की आवाज़ बुलंद होती हुई सुनाई दी “साहिबान, मेज़बान, क़द्रदान..........ये है जादुई और
चमत्कारी मंजन...........ये आपके पीले दांतों को एक हफ्ते में मोतियों सा चमका
डालेगा । श्याम सिंह देसाई का अस्सी वर्षों से प्रसिद्व, चमत्कारी मंजन
..............
कम्पार्टमेंट में सन्नाट पसरा था ।








