रविवार, 11 सितंबर 2022

रामबाण चूरन

 

रामबाण चूरन



भाइयों, बहनों, दोस्तों सहेलियों, नौजवानों, बुजुर्गों, माँओं और बेटियों सभी को हमारा सादर प्रणाम, राम राम, सत श्री अकाल और आदाब ! लो जी आ गया बरेली वाले वैध शास्त्री प्रसाद जी का नया उपहार, आप सभी के लिए .............एक ऐसा प्रोडक्ट जो पिछले सत्तर सैलून से आप सभी का मनपसंद बना हुआ है । जी हाँ  ! आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से बना अत्यंत लाभकारी और चमत्कारी  रामवाण चूरन ।

भाइयों ये है सत्तर वर्षों से आज़माया हुआ, वैद्य शास्त्री प्रसाद का शानदार फार्मूला जिसका नाम ज़रूर रामबाण चूरन है लेकिन आप इसे केवल चूरन समझने की भूल हरगिज़ न करना ! ये कहते हुए उस चूरन वाले व्यक्ति ने अपने कंधे पर लटकाए हुए झोले में से दो डिब्बे रामबाण चूरन के निकाले और अपने दोनों हाथों में लेकर उन्हें हवा में ऊपर की और लहराया ताकि सवारियों से खचाखच भरे डिब्बे में मौजूद हर नजदीक और दूर बैठा व्यक्ति इन डिब्बों को देख सके । भीड़ में किसी तरह की कोई हलचल नहीं हुई क्योंकि मुसाफिरो के लिए ये बहुत ही साधारण और रोज घटित होने वाली घटना थी ।

चूरन फ़रोश चूरन के डिब्बों को वापिस लोगों के सामने किया और बोलने लगा “हाँ तो साहिबान, कद्रदान, मेज़बान ! आपको चाहे कब्ज़ हो या दस्त आते हों , गैस बनती हो या एसिडिटी से परेशान हों , बदहज़मी हो अजीर्ण हो , अपच हो हो या खाया पिया शरीर को न लगता हो, तो लीजिये आ गया है इन सब बीमारियों का एक शर्तिया इलाज, एक रामबाण इलाज जी हाँ ! रामबाण चूरन । सत्तर वर्षों से जाना पहचाना नाम । बरेली वाले वैद्य शास्त्री प्रसाद का रामबाण चूरन । एक डिब्बे की क़ीमत है सिर्फ डेढ़ सौ रुपये.......... डेढ़ सौ रुपये........... डेढ़ सौ रुपये........ ये कहते हुए उसने डिब्बे को लोगों के सामने घुमाया । मंगर कम्पार्टमेंट में अब भी कोई हलचल न हुई । मुसाफ़िर बदस्तूर उसे नज़र अंदाज करते रहे ।

चूरन फ़रोश ने अपने हाथ में लिए हुए दोनों डिब्बों को वापिस अपने झोले में डाल दिया और एक दूसरा डिब्बा निकाला । उसने इस डिब्बे का ढक्कन खोल दिया और उसमें से एक चम्मच निकालकर दिखाते हुए फिर से कहने लगा देखिये भाइयों और बहनों ये सौ ग्राम का रामबाण चूरन का डिब्बा है जब आप इसे खोलते हैं तो इसमें आपको मिलता है ये स्टील का बेहतरीन और खूबसूरत चम्मच । आपके लिए बिलकुल मुफ्त में दिया जाता है । आधा चम्मच चूरन रोज़ाना रात को नीवाये पानी से लीजिये और सुबह आराम से निपटिये । जी मिचलाना, सर दर्द, पेट दर्द, अफ़ारा, बादी, घुटनों का दर्द रीह का दर्द, बाय का दर्द, जी हाँ ! हर दर्द का केवल एक ही इलाज............रामबाण चूरन...........रामबाण चूरन । जिस भाई को टेस्ट करना है वो कर सकता है । ..................... पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें । सत्तर बरसों पुराना जांचा परखा नुसख़ा........... लीजिये........ चखिए......... टेस्ट कीजिये........... ये कहते हुए उसने बारी बारी से चम्मच में चूरन लेकर मुसाफिरों की तरफ़ बढ़ाया । तीन चार बुजुगों ने अपनी अपनी हथेती झट से आगे बढ़ा दी कम्पार्टमेंट में थोड़ी थोड़ी से हलचल शुरू हो चुकी थी ।बुजुर्गों की देखा देखी कुछ मनचले नौजवानों ने भी अपनी हथेतियाँ आगे कर दी ।  चूरन फरोश ने तेज़ी से सभी हथेलियों पर थोड़ा थोड़ा सा चूरन सजाना शुरू कर दिया । लोग फुंकारते हुए नागों की तरह चटाचट अपनी लपलपाती और लार टपकाती ज़बान से मुफ़्त का चूरन चाटने में मसरूफ हो गए । पूरे कम्पार्टमेंट में चूरन की अजीब सी खट्टी खट्टी खुशबु तैरने लगी । बच्चे, नौजवान, बुज़ुर्ग, औरतें सभी मुफ्त के चूरन से अपनी ज़बान को आनन्दित करने में मगन थे कि चूरन फरोश ने अपना अगला दांव चला । उसने मुफ़्त का चूरन चाट रहे लोगों से चूरन पर तब्सिरा करना शुरू कर दिया ।  

“हाँ भाई साहब, चूरन का टेस्ट कैसा है ?”  उसने चूरन चाट रहे एक मुसाफिर से मुख़ातिब होते हुए पूछा । “टेस्ट तो बहुत अच्छा है भैया” मुसाफिर ने गर्दन हिलाते हुए कहा ।

“हाँ जी भाई साहब ! कैसा लगा टेस्ट ?” चूरन फरोश ने एक मोटे से पेट वाले व्यक्ति से पूछा जो अपनी हथेली का चूरन पूरा चाट चुका था और हथेलियों को अपनी पेंट से रगड़ का साफ़ कर रहा था ।

“चूरन बढ़िया है भाई............ बढ़िया है ...........” मुसाफिर ने चूरन फरोश की जानिब देखे बिना जवाब दिया ।

“भाई साहब ! ये जो आपका पेट फूल रहा है न, ये कब्ज़ और अफारे की वजह से है । एक डिब्बा खा लो वैध जी की चूरन का फिर देखो क्या कमाल होता है ।

 “हूँ ...हूँ” कहते हुए और गर्दन को इधर उधर हिलाते हुए उस मुसाफिर ने चूरन फ़रोश को नज़र अंदाज़ करने के लिए खिड़की से बाहर की ओर देखना शुरू कर दिया ।

 चूरन फरोश की कोशिशें जारी थी और मुसाफिरों का इम्तिहान ।  मुसाफिर किसी तरह चूरन फरोश के किसी दांव में नहीं आ रहे थे, उनके लिए ये रोज़ का तजुर्बा था मगर चूरन फरोश भी पिछले कई सालों से, रोज़ाना तीस चालीस डिब्बे ऐसे ही मुसाफिरों को बेच ही देता था ।  ऐसा महसूस होता था मानों चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है ।

अब चूरन फ़रोश ने एक आफ़र पेश किया “दोस्तों और भाइयों ! क्या आपको मालूम है आज का दिन आपके और हमारे लिए बहुत विशेष है...... विशेष इसलिए क्योंकि आज ही के दिन.......... जी हाँ ठीक आज ही के दिन......... हमारे वैध जी का इस धरती पर अवतरण हुआ था...... इसलिए आज के दिन आप सभी के लिए एक स्कीम है, जी हाँ ! एक शानदार आफ़र...... ये बेहतरीन रामवाण चूरन जो यूं तो अनमोल है लेकिन जिसकी कीमत मात्र डेढ़ सौ रुपये निर्धारित है..... आज के दिन और केवत आज के दिन आप को डेढ़ सौ में नहीं मिलेगी......... स्कीम के तहत आपको डेढ़ सौ रूपये में चूरन के दो डिब्बे दिए जायेंगे । यानि एक के साथ एक बिलकुत मुफ्त । दोहरा फायदा डबल प्रॉफिट” ये कहते हुए चूरन फरोश ने वापिस चूरन के दो डिब्बे अपने झोले से निकाले और लोगों के सामने पेश करते हुए कहने लगा “जी हाँ ! एक के साथ एक मुफ़्त.... सिर्फ आज के दिन....जल्दी कीजिए...जल्दी । भीड़ में कोई ख़ास हलचल नहीं हुई । किसी ने भी चूरन ख़रीदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ।  मगर चूरन फरोश के चेहरे पर कोई शिकन न था ।

 

“भाइयों और बहनों ! मुझे माफ करना । मैंने आपको गलत ऑफर बता दिया । हाँ भाइयो और बहनों ऑफर ये नहीं है । ऑफर  है एक रामबाण चूरन के साथ दो रामबाण चूरन के डिब्बे मुफ्त...... यानी एक डिबे की कीमत डेढ़ सौ नहीं...... सौ भी नहीं..... सिर्फ पचास रुपये .... जी हाँ ! सिर्फ पचास रुपये” चूरन फरोश ने एक और फंदा फेंका ।

तभी भीड़ में से एक बुजुर्ग ने मरी हुई सी आवाज में पूछा “ओ ! भय्या हमे तो सिर्फ़  एक डिब्बा चाहिए । एक डिब्बा दे दो और ये पचास रूपये ले लो” बुज़ुर्ग ने पचास का नोट चूरन फ़रोश की तरफ बढ़ाते हुए कहा ।

चूरन फरोश ने पचास का नोट लेकर एक डिब्बा बुजुर्ग के हाथों में थमा दिया और फिर शुरू हो गया ।  “हाँ तो साहिबान, कद्रदान, मेज़बान आपको चाहे कब्ज़ हो या दस्त आते हो, गैस बनती हो या एसिडिटी से परेशान हो, बदहज़मी हो अजीर्ण हो, अपच हो भूख ना लगती हो, या खाया पिया शरीर को न लगता हो तो लीजिये आ गया है इन सब बीमारियों का एक शर्तिया इलाज ।  एक रामबाण इलाज.... जी हाँ रामबाण चूरन सत्तर वर्षों से जाना पहचाना नाम, बरेली का रामबाण चूरन ।  एक डिब्बे की कीमत है सिर्फ डेढ़ सौ रुपये........... जी नही डेढ़ सौ रुपये में तीन है......वैध जी के जन्म दिन पर खुशियाँ मनाइए..... डेढ़ सौ रुपये में तीन डिब्बे लीजिये । वैध जी की लम्बी उम्र की दुआ कीजिए । “ कम्पार्टमेंट में बैठे लोगों के कानों पर जूँ भी नहीं रेंगी ।

चूरन फरोश अपने पहले ग्राहक की तरफ मुतवज्जे हुआ और उसने चूरन ख़रीदने वाले बुज़ुर्ग से कहा कि वो चूरन का डिब्बा खोलें और चूरन को चख क्र इसके बारेमें कुछ बताएं । बुज़ुर्ग ने चूरन का डिब्बा खोलकर थोड़ा सा चूरन चखा और अपनी गर्दन को ऊपर नीचे हिलाते हुए चूरन की गुणवत्ता को सर्टिफिकेट प्रदान किया । तभी अचानक चूरन फरोश ने बुज़ुर्ग का दिया हुआ पचास का नोट हवा में लहराया और पब्लिक से मुख़ातिब हो कर कहने लगा “भाइयों और बहनों आज का दिन धमाल ही धमाल का दिन है ...........ये कमाल का दिन है .........आज वैध जी का जन्म दिन ही नहीं है बल्कि आज वैध जी की कंपनी “चुन्नी ला एन्ड संस” का भी जैम दिन है इसलिए इस दुगुनी खुशी के अवसर पर बाबा जी के लिए ये चूरन बिलकुल मुफ्त .......” ये कहते हुए उसने चूरन का डिब्बा ख़रीदने वाले बुज़ुर्ग को उनका पचास का नोट लौटा दिया । बुज़ुर्ग ने हैरत और ताज्जुब के तास्सुरात के साथ, तेज़ी से पचास का नोट ले लिया और कम्पार्टमेंट में बैठे लोगों की जानिब फातिहाना मुस्कान से देखने लगे ।

तभी भीड़ में से एक और मरियल सी आव़ाज आई “भाई मुझे भी एक डिब्बा देना” ये कहते हुए एक बुज़ुर्ग औरत ने चूरन फरोश की तरफ पचास का नोट बढाया । चूरन फरोश ने नोट हाथ में लेकर बुज़ुर्ग औरत को चूरन का डिब्बा पकड़ाया और उससे कहने लगा “माताजी चूरन का डिब्बा खोलिए” । बूढी औरत ने डिब्बा खोला तो चूरन फरोश बोला “देखिये इसमें स्टील का चम्मच है ?” बुढ़िया ने अपने सीधे हाथ की उँगलियों को डिब्बे में दाल कर टटोला तो उसके हाथ में स्टील का छोटा सा चमचमाता हुआ चम्मच आ गया । उसने चम्मच को डिब्बे से निकाल का चूरन फरोश को दिखाया । चूरन फरोश ने फिर कहा “अब आप चूरन को टेस्ट कीजिए “ बुधिया ने चम्मच से थोड़ा सा चूरन निकाल कर टेस्ट किया और कहा “बढ़िया है “

चूरन फरोश ने सब के सामने बात की तसदीक़ करवाने के उद्देश्य से, बुढ़िया से फिर वही सवाल ज़रा उंची आवाज़ में दोहराया “माता जी चूरन कैसा है ?”

“अच्छा है बेटा ! बहुत अच्छा है,” बुढ़िया ने भी थोड़ा जोर से कहा ।

   

चूरन फरोश ने पचास का नोट वापिस हवा में लहराया और कहने लगा “भाइयों और बहनों कम्पनी की सालगिरह सेलिब्रेट कीजिए” और येकहते हुए उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ बुढ़िया का पचास का नोट   बुढ़िया को लौटा दिया । बुढ़िया ने भी हैरत और खुशी के मिले जुले तास्सुरात के साथ पचास का नोट तेज़ी से हाथ में पकड़ लिया ।

 

अचानक कम्पार्टमेंट में हलचल बढ़ गई । लोगों ने एक पल के लिए एक दूसरे का मुंह देखा और फिर एक शोर सा कम्पोर्टमेंट में गूंजने लगा । मुझे भी देना......... मुझे भी देना......  हवा में पचास पचास के नोट लहराने लगे ।  चूरन फरोश एक हाथ से नोट पकड़ने लगा और दूसरे हाथ से लोगों को डिब्बे पकड़ाने लगा और साथ साथ कहता जाता था “डिब्बे को खोलिए, चैक कीजिए इसमें चम्मच है या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है  ?” इस दौरान उसने ऐसे तीन चार और लोगों के पचास पचास रूपये लौटाए जिन्होंने उसे चूरन के डिब्बे से चम्मच निकाल कर दिखाया और चूरन को टेस्ट करके उसकी तारीफ़ की ।  

ट्रेन की रफ्तार कम होती जा रही थी और चूरन फरोश की रफ़्तार में इज़ाफ़ा होता जा रहा था । अब वो तेज़ी से पैसे ले रहा था और डिब्बे दे रहा था । साथ ही अपनी बात दोहराता जता था “डिब्बे को खोलिए, चैक कीजिए इसमें चम्मच है या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है  ?” मगर अब वो किसी के पैसे लौटा नहीं रहा था । कम्पार्टमेंट में मौजूद तक़रीबन सभी सत्तर अस्सी लोगों ने चूरन ख़रीदा था । चूरन फ़रोश धीरे धीरे भीड़ के साथ सरकते हुए गेट के बिलकुल करीब हो चुका था । पूरे कम्पार्टमेंट में लोग चूरन के डिब्बे लिए बैठे थे । बहुत से लोग अपना डिब्बा खोल रहे थे, बहुत से लोग चूरन के डिब्बे में स्टील का चम्मच तलाश कर रहे थे, कुछ चूरन चखने की स्टेज में थे और जो इन सब से निवृत हो चुके थे वो चूरन फ़रोश से अपने पचास रूपये वापिस पाने के मुन्तज़िर थे ठीक वैसे ही जैसे अब तक चूरन फरोश सात आठ ख़रीदारों को लौटा चुका था । ट्रेन की रफ़्तार कम हो चुकी थी । शायद कोई छोटा स्टेशन आने वाला था । चूरन फरोश बराबर कहे जा रहा था “डिब्बे को खोलिए, चैक कीजिए इसमें चम्मच है या नहीं, टेस्ट कीजिए, टेस्ट कीजिए चूरन कैसा है  ?”

बड़ी आहिस्ता, आहिस्ता ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुकी और अचानक बड़ी फुर्ती के साथ चूरन फरोश ट्रेन से उतरा और कहीं गायब हो गया ।इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते ट्रेन ने पुन: चलना शुरू कर दिया था

पूरा कम्पार्टमेंट चूरंनमय था । कम्पार्टमेंट में चूरन की खट्टी मीठी खुश्बू के साथ, चूरन के असर से  पेट में पैदा होने वाली बदबूदार हवा की बू भी शामिल हो गई थी जिसकी वजह से कम्पार्टमेंट की आबो हवा में दिल्ली शहर के प्रदूषण जैसा महसूस होने लगा था । पूरे कम्पार्टमेंट में सन्नाटा छाया हुआ था । ट्रेन ने गति पकड़ ली थी ।

सहसा पिछले कम्पार्टमेंट से एक मंजन फ़रोश की आवाज़ बुलंद होती हुई सुनाई दी “साहिबान, मेज़बान, क़द्रदान..........ये है जादुई और चमत्कारी मंजन...........ये आपके पीले दांतों को एक हफ्ते में मोतियों सा चमका डालेगा । श्याम सिंह देसाई का अस्सी वर्षों से प्रसिद्व, चमत्कारी मंजन ..............

कम्पार्टमेंट में सन्नाट पसरा था ।    

 

शनिवार, 10 सितंबर 2022

अकेला

 अकेला

राजेश जीवन की उलझनों से इतना परेशान और निराश हो गया था कि उसने एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिया । आत्महत्या का निर्णय ।  इस तरह के निर्णय आमतौर पर उन लोगों द्वारा लिये जाते हैं जिनके जीवन में दोस्तों की कमी होती है । इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह अपने गांव के पास एक निर्जन रेलवे लाइन पर पहुंच गया । गाड़ी का समय भी हो गया था । वो किसी भी समय आ सकती थी । राजेश पटरियों पर इस तरह लेट गया कि एक पटरी पर उसकी गर्दन थी और दूसरी पटरी पर उसकी टाँगे । उसने अपनी आँखे बंद कर लीं, एक गहरी सांस ली और अपने जीवन के उन सभी कड़वे क्षणों को याद करने लगा जो उसके इस निर्णय का आधार थे ।

एक फिल्म सी उसकी आँखों के सामने घूमने लगी । उसने इसी हालत में आधा घंटा बिताया लेकिन ट्रेन नहीं आई । ये भारतीय ट्रेनें भी कभी समय पर नहीं आती हैं । अतीत की सभी कड़वी यादें ख़त्म हो गई लेकिन ट्रेन का कोई अता पता नहीं था । परेशान हो कर उसने अपनी आँखें खोली तो उसने लोगों की भीड़ को अपने दाएं बाएं खड़े देखा, जो बड़ी उत्सुकता से उसकी ओर देख रहे थे । "भारत के लोग बहुत व्यावहारिक होते हैं, इसलिए किसी ने ये अजीब सवाल नहीं पूछा कि भाई यहाँ क्यों पड़े हो ? जाहिर है कि सभी जानते थे कि इरादा आत्महत्या करने का था ।

राजेश घबरा कर उठ गया । एक युवक ने अपना मोबाइल निकाला और राजेश की फोटो खींचकर तुरंत फेसबुक पर पोस्ट कर दी और लिखा “एक आदमी आत्महत्या के लिए ट्रेन की पटरियों पर बैठा है । तुरंत उसकी मदद को पहुंचे, इससे पहले कि रेलगाड़ी आकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दे । आपको अपने ईश्वर की क़सम है, इस ख़बर को इतना शेयर करें कि यह ख़बर जंगल में आग की तरह फैल जाए ।" पोस्ट वायरल हो गई । लाइक और कमेंट्स आने लगे ।

एक ओर नौजवान लड़का आगे आया, राजेश के पास पहुंचा और इशारों में उसके साथ एक सेल्फी लेने को कहा । राजेश का आश्चर्य और घबराहट अभी खत्म नहीं हुये थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता या जवाब दे पाता , युवक ने अपना चेहरा राजेश के करीब किया और जवाब का इंतजार किये बिना एक सेल्फी ले ली । उसके बाद वो एक तरफ हट गया और राजेश को भूल कर अपने मोबाइल में व्यस्त हो गया । उसने व्हाट्सएप खोला और सेल्फी को आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के साथ अंतिम सेल्फी, अगर दुबारा जन्म लिया तो अगले जन्म में फिर मिलेंगे ।" के टैग के साथ विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुपों में भेजना शुरू कर दिया । संदेश को बहुत पसंद किया गया । ग्रुप में सभी ने इसे रुचि और आश्चर्य के साथ पढ़ा और फिर लाईक करके फॉरवर्ड कर दिया ।

इसी व्हट्सएप ग्रुप में कुछ बौद्धिक लोग थे, जो देश में बढ़ती आत्महत्याओं से चिंतित और परेशान थे, इसलिए उन्होंने इस मुद्दे पर बहुत गंभीर बहस शुरू कर दी । सैकड़ों लोग बहस का हिस्सा बन गए और बेबाक तरीके से अपने विचार व्यक्त करने लगे । सेल्फी पोस्ट करने वाला इस हंगामे को देखकर फूला नहीं समा रहा था मानो उसने देश भर में एक नया सामाजिक आंदोलन खड़ा कर दिया हो ।

हुजूम में कुछ बूढ़े लोग भी शामिल थे जो भीड़ देखकर इधर आ गए थे । जब उन्होंने ये पूरा प्रकरण देखा तो पटरियों से कुछ दूरी पर बरगद के नीचे बने पक्के चबूतरे पर अपने अपने हुक्के और चिलम लेकर बैठ गए और आत्महत्या की समस्या के बारे में चर्चा करने लगे । बड़े दिनों के बाद उन्हें वक़्त गुज़ारी के लिए एक अच्छा विषय मिला था जिस के सहारे वो अपना काफ़ी समय बिता सकते थे ।

राजेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था । वो बस हैरत से इधर उधर देखे जा रहा था । उसकी हालत बड़ी विचित्र हो चली थी । अब उसे महसूस होने लगा कि दुनिया में कितने लोगों को उसकी परवाह है, हालांकि न वो उसे जानते हैं और न वो उनको जानता है । फिर भला वो क्यूँ मरने चला है ? अभी ये ख्याल उसके ज़हन में आया ही था कि अचानक भीड़ में से कुछ लोग ज़ोर से चिल्लाए, “अरे देखो ! ट्रेन आ रही है ट्रेन, दूर हट जाओ !" जैसे ही भीड़ ने ये ऐलान सुना, पटरियों पर राजेश को चारों तरफ़ से घेरे खड़ी भारी भीड़ तितर बितर हो गई । राजेश एक बार फिर पटरियों पर अकेला था ।

 

 

 

सोफा सेट

 

सोफा सेट

रात के तकरीबन दस बजे होंगे । कविता अपनी सहेली अनुपमा के यहाँ से दावत के बाद घर लौट रही थी । कार राजेश ड्राइव कर रहा था । रास्ते में कविता ने राजेश से मुख़ातिब होते हुए कहा " राजेश तुमने अनुपमा का डाइंग रूम देखा ? और तुमने वो सोफा सेट और सेंटर टेबल देखी देट वाज़ सो अमेजिंग, हैं न ! ?

“हाँ !  कविता वाकई देट वाज़ वैरी ब्यूटीफुल”  राजेश ने उसकी तरफ़ देखे बिना जवाब दिया ।

“तुम्हें पता है में ने अनुपमा की फैमिली को इस मन्डे लंच पर इनवाईट किया है ?" कविता ने राजेश की जानिब देखते हुए बताया ।

राजेश ने कविता की तरफ़ एक पल के लिए देखा और कहा । “ओह ! देट्स ग्रेट !"

“लेकिन राजेश हम अपने घर को घर कब बनायेंगे डार्लिंग ? .........” कविता ने प्यार से अपनी कोहनी राजेश के कंधे पर टिकाते हुए शिकायती लहजे में कहा और राजेश के जवाब का इंतज़ार करने लगी । राजेश का ध्यान ड्राइविंग पर था । उसने कविता की तरफ देखे बगैर बड़ी मासूमियत से पूछा “क्या मतलब " “अरे बाबा अपना घर देखा है ? और आज अनुपमा का घर देखा ? घर उसको कहते हैं माई लव” कविता ने अपने दूसरे हाथ से राजेश के गालों पर एक हलकी सी थपकी देते हुए प्यार से कहा ।  

“देखो राजेश में भी चाहती हूँ कि हमारे घर में भी एक शानदार सोफा सेट हो जिसके सेंटर में एक खूबसूरत सी टेबल हो और जिसे देखते ही मेरी सहेलियों और तुम्हारे दोस्तों के मुंह से एकदम निकले वाव "

“अच्छा ! तो तुम्हारा मतलब है कि हमारा घर इसलिए घर नहीं है क्यूंकि हमारे पास एक शानदार सोफा सेट नहीं है ? “ राजेश ने मुस्कुराते हुए कहा ।

“और तुम्हे तो पता है कि हमारे घर में सोफा रखने की जगह भी कहाँ है ? " राजेश ने वज़ाहत की ।

“मुझे पता है राजेश ! मगर मुझे एक कमरा चाहिए जहां मुझे एक शानदार सोफा रखना है बस ! " कविता ने ज़िद के से अंदाज में कहते हुए अपनी कोहनी राजेश के कंधे से हटा ली और दूसरी तरफ़ देखने लगी । " “देखो कविता घर में कुल चार कमरे ही तो हैं । एक बच्चों का स्टडी रूम है , एक हमारा बेडरूम है और एक कमरे में मेरा आफिशियल वर्क होता है जो मेरे लिए ज़रूरी है तो बताओ अब कैसे करेंगे ? " राजेश ने सवालिया नज़रों से एक पल के लिए कविता की जानिब देखते हुए कहा ।

“मुझे पता है । और जो भी गेस्ट आते हैं उन्हें बेडरूम में ही बिठाना पड़ता है मुझे कितना ख़राब लगता है । पता है आपको ?” कविता ने मुंह बनाते हुए कहा ।

 " ठीक है बाबा ! अब मूड खराब मत करो । इसके बारे में भी सोचेंगे ।“ राजेश ने गाड़ी के ब्रेक लगाते हुए कविता से कहा । बातों ही बातों में कब घर आ गया पता ही नहीं चला ।

अगले दिन डिनर पर कविता ने चहकते हुए राजेश से कहा “राजेश ! ये देखो में ने सब सेट कर दिया है”  और वो मोबाईल पर राजेश को तस्वीरें दिखाने लगी । “देखो ये सोफा सेट, सेंटर टेबल और ये पर्दे, मैं ने आर्डर कर दिये है । कैसे हैं ? कविता ने सवाल के साथ अपनी बात खत्म की । राजेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “वेरी नाइस ! तुम्हारी पसंद का तो मैं हमेशा से ही कायल हूँ । तभी तो मैं ने तुम्हें पसंद किया स्वीट हार्ट !” राजेश ने कविता को छेड़ते हुए कहा । मगर कविता हमारे पास कोई एक्स्ट्रा कमरा भी तो नहीं है ?“ राजेश ने सवाल किया ।

“बच्चों  के स्टडी रूम के पास वाले कमरे को ड्राइंग रूम बना सकते हैं न ? " कविता ने कुछ कुछ सकुचाते हुए कहा ।

“और माँ बापूजी कहाँ जायेंगे ?” राजेश ने सवालिया नज़रों से कविता की जानिब देखते हुए कहा ।

“राजेश ! माँ और बाबूजी के लिए वो कमरा बहुत बड़ा है । और फिर हमारे पास कोई दूसरा आप्शन भी तो नहीं है डार्लिंग । “ कविता ने मासूमियत से कहा । देखो राजेश !मैं ने अपना काम कर दिया है । कल तक सब सामान भी डिलीवर हो जाएगा और परसों सन्डे है । परसों अनुपमा भी लंच के लिए आ जायेगी । फिर मुझे कमरा सेट भी करना पड़ेगा कब से गंदा पड़ा है । जाले वाले भी लगे होंगे । देखो ! अब तुम्हारा काम बाक़ी है । तुमने प्रामिस किया था कि तुम कुछ न कुछ ज़रूर करोगे ।“ कविता ने राजेश की प्लेट मे सलाद रखते हुए कहा ।

"ठीक है भाई ! मैडम का हुक्म सर आँखों पर”  राजेश ने सीधे हाथ से सैल्यूट की मुद्रा बनाते हुए कहा । “अब खाना खाने की इजाज़त है ? " राजेश ने मुस्कुरा कर पूछा ।

“बिलकुल इजाज़त है” कविता ने भी इठलाते हुए जवाब दिया ।

सन्डे का दिन आ गया । अनुपमा और उसका हसबैंड कविता के घर लंच के लिए पहुँच गए । अनुपमा ने ड्राइंग रूम में दाख़िल होते ही बड़े जोश और हैरत के साथ, अपने दोनों हाथों को अपने होंठों पर रखते हुए, अपनी दोनों आँखों को पूरा खोलकर जोर से चिल्लाकर कहा “कविता ! व्हाट आ ब्यूटीफुल सरप्राइज़ ! कितना प्यारा ड्राइंग रूम है तेरा ! और ये फर्नीचर कहाँ से लिया यार !"

कविता का सर गर्व से तन गया । उसने कनखियों से राजेश की तरफ देखा । राजेश ने भी मुस्कुराते हुए अपनी भवों को उचका कर कविता की तारीफ़ की । कविता ने अनुपमा और उसके हसबैंड को बैठने का इशारा किया और खुद भी नए सोफे पर बैठ गई । थोड़ी ही देर में कमरे से ठहाकों की आवाजें गूजने लगीं । उधर छत पर बने स्टोर रूम में ख़ामोशी छाई हुई थी । स्टोर रूम की मद्धिम रोशनी में दो काले साए ख़ामोश बैठे हुए थे ।

अकमल नईम सिद्दीक़ी

 

 

 

फ़ैशन

 फ़ैशन


10
बजे का वक़्त था, में पडौस में एक साईकिल मिस्त्री के यहाँ बैठा अपनी साइकिल के ठीक होने का इंतज़ार रहा था । एक बच्चा यही कोई 10-11 साल की उम्र का साइकित की दुकान पर आया । उसके पास एक इस साइकित की हालत बड़ी ख़स्ता थी । साइकित का पीछे का मडगार्ड टूटा हुआ था । दोनों टायर घिस चुके थे । घन्टी थी नहीं केवल अवशेष स्वरूप उसकी क्लिप हैंडत पर लगी रह गई थी । और तो और साइकित का एक पैडल भी नहीं था । मैं सोच में पड़ गया कि बिना एक पेंडल के ये लड़का साइकित कैसे चलाता होगा ? मगर फिर ख़ुद की बेवकूफी पर मुस्कुराते हुए खुद से कहने लगा अरे यार ! साइकिल मरम्मत करवाने के लिए ही तो ये दूकान पर आया है । अचानक उसकी तेज़ आवाज़ ने मेरी सोच के सिलसिले को तोड़ दिया । अंकल उसने मेरी साइकिल के पंचर में व्यस्त मिस्त्री को आवाज़ देते हुए कहा ।   "अंकल आपके पास साइकिल के पहियों में लगाने वाली चमकदार मछलियाँ है क्या ? वो रेडियम वाली वो जो चक्के की ताड़ियों में लगाते हैं” उसने स्पष्ट करते हुए कहा । मिस्त्री ने नज़र उठाये बिना असहमति में गर्दन हिलाते हुए कहा “नहीं ख़त्म हो गई है ।“ दो तीन दिन बाद ते तेना ।" लड़के का चेहरा उतर गया । वो कुछ सोचकर इधर उधर देख रहा था । मुझसे रहा न गया और मैं ने उससे मुखातिब होते हुए कहा बेटा मछलियों से ज्यादा ज़रूरी तो तुम्हारी साइकिल का पेंडल है । पहले इसको तो ठीक करवाओ । उसने उचटती हुई आवाज में जवाब दिया “नहीं अंकत ! आपको पता नहीं । ये मछलियों का फैशन है । मुझे तो यही लगवानी हैं ।“

मैं ने फिर पूछा “मगर बगैर पेड़त के साइकित कैसे चता पाओगे ? " उसने जवाब दिया है  अंकल चला लेता हूँ अब आदत हो गई है ।“ और ये कहकर वो एक पेंडल से ही साइकिल पर सवार होकर तेज़ी से निकल गया । मैं सोच रहा था कि हमें क्या हो गया है ? हालात से समझौता कर लेना अच्छी बात है लेकिन हम ग़ैर  ज़रूरी चीजों के पीछे क्यूँ भाग रहे हैं ? क्या ये बेवक़ूफी नहीं है ? अब आवश्यकता से कहीं अधिक फैशन का दिखावा महत्वपूर्ण हो गया है । ये बाज़ार की शक्तियाँ हमें किस और ले जा रही हैं ।

 

अकमल नईम सिद्दीक़ी

 

 

 

सच्ची खुशी

सच्ची खुशी 

पिछली एक सदी में जो क्रांतिकारी परिर्वतन हुआ है उसके पीछे प्रमुख कारण है विज्ञान और प्रोद्योगिकी का तीव्र विकास । परन्तु इसके साथ ही इस विकास से अनुचित लाभ कमाने के लिये पूंजीपतियों ने इसके साथ उपभोक्तावाद को जोड़ दिया है। विज्ञान द्वारा रचित उपकरण आज हमारी दिनचर्या का एक आवष्यक अंग हो नहीं गये हैं बल्कि बना दिये गये हैं और यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रखी गई है । और इसके चलते उपभोक्तावाद ने हमारी सोच तक बदल डाली है । इंसान सदैव से ही जिस चीज को खोजता रहा है वो है मन की ख़ुशी । वैज्ञानिक तरक्की और उपभोक्तावाद ने एक एैसी संस्कृति को जन्म दिया है जिसमें अधिकाधिक लोग सफलता, संतोष और ख़ुशी के अर्थ ऐशो आराम की चीजों के अधिकाधिक उपयोग में तलाशते हैं ।
 आज हम टी.वी., वी.सी.डी., वाशिंग मशीन, मिक्सी, गीजर, वैक्यूम क्लीनर कम्प्यूटर, लैपटाप, इन्टरनेट, मोबाइल, कार जैसी भौतिक वस्तुओं में खुशी ढ़ूंढ़ रहे हैं और एक के बाद एक इनका अम्बार अपने घरों में लगाते जा रहे हैं इस उम्मीद में कि शायद कभी तो हमें स्थायी खुशी प्राप्त होगी इसीलिये ये सभी इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद या अन्य इसी तरह के मशीनी आराम प्रदान करने वाले उत्पाद हमारी आवश्यकता और मजबूरी बनते जा रहे हैं । कुछ समय तक तो ये उत्पाद खुशी देते है लकिन थोड़े समय बाद यह खुशी ग़ायब हो जाती है और फिर हम चल पड़ते हैं पुनः खुशी की तलाश में और खरीद लाते है एक और प्रोडक्ट जो न केवल हमारी गाढ़ी कमाई खा जाता है अपितु उन गरीबों का हक़ भी मार जाता है जो आपको उन्हें अदा करना चाहिये था । और साथ ही ले जाता है आपकी थोड़ी सी आत्मनिर्भरता और बदले में देता है मशीन की गुलामी जिसके बिना थोड़े समय बाद आप स्वंय को पंगु समझने लगते हैं । 
उपभोक्तावादी शक्तियों ने बड़ी चतुराई से हमारी सोच परिवर्तित की है । उन्होने अपने उत्पादों को हमारी खुशी, हमारे विकास, हमारे सभ्य होने और हमारे माडर्न होने से सम्बद्ध कर दिया है । अर्थात यदि आपके पास जानीमानी कम्पनियों के उत्पाद नहीं हैं तो आपको लगने लगेगा कि आप न तो विकसित हैं, न सभ्य हैं आप बैकवर्ड हैं, पिछड़े हुये व्यक्ति हैं आप ज़माने से पीछे हो गये हैं आपके भीतर एक हीन भावना का विकास होने लगेगा और आपसे आपकी स्वभविक खुशी दूर होती चली जायेगी इसीलिये आज पूरी दुनिया के लोग इन तमाम उत्पादेां और मशीनों से अपने घरों को आरास्ता करना चाहते हैं ताकि वो मार्डन और आधुनिक बने रहें सभ्य और समझदार कहलायें और उनको मन की खुशी प्राप्त होती रहे फिर चाहे इस खुशी को खरीदने के लिये उन्हे भ्रष्टाचार को ही क्यों ना अपनाना पड़े । 
वर्ड वाच इन्स्टीट्यूट की एक रिपोर्ट ”ट्रान्सफोर्मिंग कलचर्स फ्रॉम कन्ज़्यूमरिज़्म टू सस्टेनेबिलिटि” के अनुसार वर्ष 2008 में दुनिया भर में 6.8 करोड़ वाहन, 8.5 करोड़ रेफ्रिजरेटर, 29.7 करोड़ कम्प्यूटर और 1.2 अरब मोबाइल खरीदे गये । 1960 में दुनिया में उपभोग पर खर्च 49 खरब डॉलर था जो 2006 तक आते आते 300 खरब डॉलर हो गया है । अर्थात उपयोग पर ख़र्च छः गुना बढ़ा है जबकि इस दौरान जनसंख्या केवल 2.2 गुना बढ़ी है। स्पष्ट है कि इंसान की उपभोग की भूख अंजाम की परवाह किये बिना बढ़ती जा रही है । 
जिस रफ्तार से ये उत्पाद और इनका उपभोग बढ़ रहा है उसी तेज़ी से धरती की प्राकृतिक सम्पदा खनिज, धातुओं और जीवाष्म ईंधन का दोहन भी बढ़ रहा है । उपभोक्तावादी यह जीवन शैली पृथ्वी के विनाश का कारण बनती जा रही है और पृथ्वी के विनाश से जुड़ा है समस्त मानव जाति का विनाश । और हम खुद अपनी धरती को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। उच्च उपभोग वाली जीवन शैली जिसका मूल मंत्र है खाओ पिओ और मौज करो, जहां प्रत्यक्ष रूप से बडी खुशी देने वाली प्रतीत होती है परन्तु जब यह खुशी हम से इसकी कीमत वसूलती है तो अहसास होता है कि यह खुशी तो बड़ी महंगी है। जहां थोडे समय के लिये यह शैली हमारे जीवन को बड़ा आसान बनाती है वहीं तनाव, कर्ज, बीमारियां और मृत्यु का बढ़ना इसके घातक दुष्प्रभाव भी है। दुनियां में प्रतिवर्ष मरने वाले लोगों में से आधे से अधिक लोग हृदय रोग या गुर्दे से सम्बंधी रोगों से मरते हैं तथा डायबिटीज़ और सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गवांते हैं। स्पष्ट है कि स्मोकिंग, शराबनोशी, ड्रग्स की लत , पोष्टिक भोजन की अपेक्षा फास्टफूड, शारीरिक श्रम की कमी, विलासिता की वस्तुओं का उपयोग, अनैतिक मनोरंजन आदि सभी मोटापा, तनाव, माईग्रेन, डायबिटीज़, हार्ट अटैक जैसी शारीरिक और ईर्ष्या, जलन, द्वेष, राग जैसी विकृत मानसिक बीमारियों को जन्म देते है। और तथाकथित बहुप्रचारित क्षणिक खुशी अन्ततः इसकी बहुत बड़ी क़ीमतमत वसूल कर मनुष्य का जीवन बर्बाद कर देती है और मन का चैन, सूकूंन और संतोष जैसी स्थितियों का हरण कर लेती है । 
अब भी समय है हमें जागना होगा, हमें पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण से बचना होगा, हम क्यों नहीं समझते कि जिस जीवन शैली को हम अपना रहे हैं उसी जीवन शैली ने पाश्चात्य देशों की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और राजनैतिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर दिया है । वे अपने इस तथाकथित खुशी प्रदान करने वाले विकास के दुष्परिणामों से घबराकर वास्तविक खुशी और शांति की तलाष में भटक रहे है । हमें इस समस्या से निपटने के लिये उसी की तरफ लौटना होगा जो हमारा सच्चा पालहार है समस्त ब्रहमाण्ड का रचियता है उसी की शरण में हमें अपनी समस्याओं का हल मिल सकेगा। 
कुरआन कहता है बेशक दिलों का चैन और सुकून और खुशी अल्लाह की याद में है । इसी तरह फुज़ूल खर्ची करने वालों को शैतान का भाई कहा गया है । उपरोक्त दोनो तथ्यों को ध्यान में रखकर समझे तो स्पष्ट हो जायेगा कि जिस सच्ची खुशी की तलाश में हम भटक रहे हैं वो वास्तव में सादगी, साधारण जिन्दगी और अपने रब की स्तुति में है । चैन और सुकून कभी भी भौतिक वस्तुओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि खुशी, चैन और सुकून भौतिक वस्तु या स्थिति नहीं है । हां ! हम खुशी को खरीदने के लिये जिन भौतिक वस्तुओं पर बेतहाशा खर्च कर रहे हैं उन्होने हमें शैतान का भाई अवश्य बना दिया है। शैतान के भाई का अर्थ है हम भी शैतान हो गये हैं और सुख, शान्ति कभी भी शैतान के नसीब में कैसे हो सकती है ? 
इसीलिये इस्लाम कहता है कि वो आदमी कभी ग़रीबी और तंगदस्ती में मुब्तला नहीं हो सकता जो क़नाअत से बसर करता है तथा अपने कमाये माल पर ना तो कुण्डली मार कर बैठ जाता है, न ही आंख मूंदकर बेतहाषा खर्च करता है । साथ ही अपने माल में से हाजतमंद लोगों का हिस्सा भी रखता है । इसके दो फायदे हैं ना तो आदमी खुद मुफ़लिस रहता है और ना समाज के अन्य व्यक्ति तंगदस्त। यही मंत्र है एक सम्पन्न और सुखी समाज के निर्माण का । 
गीता भी इस विषय में ये कहती है कि इन्द्रियों को राग और द्वैष से मुक्त कर, खुद के वष में करके जब मनुष्य विषयों को संयम से ग्रहण करता है तो वह प्रसन्नता और शान्ति को प्राप्त करता है । स्पष्ट है कि कुरआन और गीता का मूल मंत्र खुशी के संदर्भ में एक ही है और वह है संयत जीवन । 

        
                                                                                                                    अकमल नईम सिद्दीक़ी
                                                                                                                         9413844624

महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में नो बैग डे का आयोजन

असगर वजाहत की कहानी “शेर’ तथा “पहचान” पर हुई चर्चा

महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में नो बैग डे का आयोजन


आज दिनांक 10 सितम्बर को स्थानीय महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में नो बैग डे का आयोजन किया गया । आज नो बैग डे की थीम का सम्बन्ध हिन्दी साहित्य से था इसलिए विद्यालय के वरिष्ठ अध्यापक अकमल नईम सिद्दीकी ने हिन्दी साहित्य की सबसे चहेती विधा “कहानी” के सम्बन्ध में विद्यार्थियों से बात की और उन्हें कहानी के विभिन्न तत्वों से अवगत करवाया । इसी क्रम में उन्होंने प्रसिद्व साहित्यकार असगर वजाहत की दो छोटी छोटी कहानियाँ “शेर” तथा “पहचान” का वाचन किया और विद्यार्थियों के साथ इस पर चर्चा की । 


पुस्तकालय अध्यक्ष निधि भार्गव ने छात्रों को लघु कथाओं की पुस्तकें उपलब्ध करवाते हुए कहा कि आगामी नो बैग डे पर इन कहानियों को वो विद्यालय में लघु नाटिका के रूप में मंचित करेंगे ।


विद्यालय प्रभारी तथा व्याख्याता भल्लाराम चैधरी ने विद्यार्थियों को कहानी लिखने के लिये प्रेरित किया वहीं अन्य कक्षाओं में अंशु परिहार ने बच्चों को खेल खेल में राइमिंग वर्ड्स के बारे में बताया साथ ही बच्चों ने भी बड़े आत्मविश्वास के साथ विभिन्न प्रस्तुतियां दीं।




मोहम्मद आसिफ ने भी बच्चों को मेरी कहानी दोस्त की जबानी गतिविधि करवाई जिसमें बच्चों ने अपनी कक्षा के दोस्तों के बारे में बताया । 



वैशाली लाम्बा और सोनल जोधा ने मैं होता तो क्या करता  गतिविधि  के माध्यम से सोचने पर मजबूर किया और बच्चों को विभिन्न प्रकार के फ्लेश कार्ड प्रदान करते हुए उनसे पूछा कि अगर वो कोई जानवर होते तो क्या करते



सुप्रीति चौधरी, सुमित्रा मैडम और सुखविंदर जी ने बच्चों को वर्क बुक की महत्ता बताते हुए इसके उद्देश्यों से अवगत करवाया । प्रेमाराम जी ने हिन्दी और संस्कृत के शब्दों की पहेली बूझी तो किरण देवड़ा ने विज्ञान के चमत्कारों से रूबरू करवाया और मनीष सर ने गणित की उलझनों को बच्चों से सुलझवाया । सोनिया परिहार और खुशबु परिहार ने बच्चों को कहानियां सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया। दशरथ जी पूरे कार्यक्रम को अनुशासित ढंग से संपादित करने में अपना योगदान दिया।

अन्य सभी ने भी विभागीय निर्देशानुसार विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जिसमें विद्यार्थियों का उत्साह देखते ही बनता था । प्रधानाचार्या प्रतिभा शर्मा ने भी विद्यार्थियों से संवाद किया तथा जीवन में अनुशासन के महत्त्व के बारे में बताते हुए इसकी आवश्यकता पर बल दिया ।        


                                                                                                             स्कूल डेस्क

                                                                                                    अकमल नईम सिद्दीकी

कार्यक्रम की झलकियाँ 











شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...