समाचार गिद्ध
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
समाचार गिद्ध
नात पाक
نعت پاک
نعت پاک
محمد مصتفی صل علیٰ کی شان کیا کہنا
शुक्रवार, 14 अगस्त 2020
भुखिया
भुखिया
चुनाव नज़दीक थे . शहर में एक बार फिर दंगे भड़क उठे थे. मौजपुर की एक सुनसान गली में फसादी लड़के हाथों में लाठी, भाले और सरिये वगैरह लिए शिकार की तलाश में भेड़ियों की तरह घूम रहे थे . अचानक उन्होंने एक 15-16 साल के लड़के को दबोच लिया जिसके हाथ में कुछ गुब्बारे, बांसुरियां और प्लास्टिक के खिलौने वगैरह थे . लड़का बचते बचाते बड़ी होशियारी से गलियों गलियों में से होकर अपने घर पहुँचना चाहता था मगर अब पकड़ा जा चुका था .
दंगाई लड़कों ने उसे घेर लिया था . एक लड़के ने उसके गुब्बारे में कोई नुकीली चीज़ चुभोई ....."फड़ाक" की आवाज़ के साथ गुब्बारा फूट गया . गुब्बारा फूटते ही लड़का डर के मारे उछल गया और बाक़ी लड़के जोर से हंसने लगे . गुब्बारा फरोश की आँखों में एक सूनापन उतर आया था मानो पचास पैसे का गुब्बारा न फूटा हो बल्कि कोई धन दौलत थी जिसे किसी ने लूट लिया हो . एक और लड़के को शरारत सूझी और उसने धड़ाधड़ सारे गुब्बारों में कोई नुकीली चीज़ बारी बारी चुभाई ................. एक के बाद एक आवाज़ आई "फटाक, फटाक, फटाक"......................... हवा में फिर कई क़हक़हे गूँजे ............हा हा हा !!!!!
गुब्बारा फ़रोश की आँखें डर और दहशत से बंद हो गईं . उसने घबरा कर बेसाख्ता अपने दोनों कानों पर अपने हाथ रख लिए .
गुब्बारे फूटने की आवाज़ उसे ऐसी महसूस हो रही थी जैसे उसके आसपास कई बम फूट रहे हों "भड़ाम........... भड़ाम.............भड़ाम ! ............उसका दिल बैठ गया, साँसें तेज़ हो गईं ...............आँखें पथरा गईं .................लड़के को ऐसा लगा मानो कोई चार पांच बम उसके आशियाने पर गिर गए हों और ..और........सब कुछ खत्म हो गया हो ..................... सब कुछ .
तभी एक मनचले ने उसके थैले में से लकड़ी का बना हुआ बाजा निकाल लिया और उसके कान के पास ले जाकर ज़ोर से बजाया "पीं ................................."
गुब्बारा फ़रोश दहशत से काँप उठा . उसका संतुलन बिगड़ गया और वो धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरा . फिर एक बार एक जोरदार क़हक़हा सूनी गली में गूँजा "हा हा हा ............"
गुब्बारा फ़रोश को शोले फिल्म का गब्बर वाला सीन याद आ गया . उसे लगा जैसे वो एक नहीं कई कई गब्बरों के क़दमों में पड़ा है . लाचार और बेबस ........फिज़ा में गब्बरों के क़हक़हे गूँज रहे थे . "सज़ा मिलेगी, बरोबर मिलेगी .......... ठांय ठांय ठांय ..................किसी ने बहुत तेज़ी से दो तीन लातें उसकी नाज़ुक और कमज़ोर सी छाती पर रसीद कर दी थीं . ................
उठ साले................... उठ . एक लडके ने उसका गिरेबान पकड़ कर उसे ज़बरदस्ती खड़ा कर दिया था . उनमें से एक लड़के ने आगे बढ़ कर गुब्बारा फ़रोश से कड़कदार आवाज़ में पूछा ..................... अपना नाम बता ?
बता .........नाम बता ? .....................एक गंदे से पीले दांत वाले लड़के ने बुरा सा मुंह बनाकर जोर से पूछा ................बता ................. नाम बता, मुसलमान है ? ......................हिन्दू है ?..................... बोल जल्दी बोल ............... लड़का दहशत के मारे ख़ामोश था .
ऐसा लगा कि दंगाई अपना काम जल्दी पूरा करना चाहते थे क्योंकि उनके पास अभी बहुत काम बाक़ी था . उनको दिया गया टार्गेट अभी मुकम्मल कहाँ हुआ था ? अभी तक तो सिर्फ 11 लोगों का क़त्ल, दो औरतों से बलात्कार और मात्र 6 घरों को आग लगाई थी . सब हिसाब था दंगाइयों के पास . ये बिलकुल एक टीम वर्क की तरह था . टीम में एक लड़के को इसीलिए रखा गया था जो सब कामों का हिसाब रखता था . ये लड़का स्कूल के समय से ही बहुत ज़िम्मेदार और हिसाब में बहुत माहिर था. आजकल बी०काम० करके बेरोज़गार घूमा रहा था . इसी बीच उसे जुए और नशाखोरी की लत ने आ पकड़ा था जिससे उसके मामलात बहुत बिगड़ गये थे . खैर वो सब काम का पक्का हिसाब रखता था . शाम को अध्यक्ष महोदय से पेमेंट लेने के लिए भी वही जाया करता था. एक लड़का और था टीम में जिसके हाथ में मोबाइल कैमरा था . इस लड़के का काम था अपनी टीम के कामों को फोटो और वीडियो के रूप में सहेजना . हिसाब के समय कभी कभी नेता जी को अपने काम की तस्वीरें और वीडियो भी दिखाने पड़ा जाया करते थे . कभी कभी ऐसा भी होता था कि वीभत्स तस्वीरों और वीडियोज़ की बदौलत नेता जी या अध्यक्ष महोदय खुश होकर उन्हें शराब और शबाब की पार्टी के लिए कुछ बोनस रक़म भी दे दिया करते थे .
परसों ही की बात है उन्होंने एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक बालात्कार का वीडियो बनाया था फिर उस महिला के पेट को चीर कर उसका गर्भ निकाल कर अपनी तलवार की नोक पर रखकर लहराया था . फिर एक राष्ट्रवादी ने उस पर पेट्रोल छिड़ककर महिला और उसके गर्भ को आग के हवाले कर दिया था . आग ..................आग सब कुछ पवित्र कर देती है चाहे दंगों की हो या हवन कुण्ड की . इस वीडियों ने उनके आक़ाओं को इतना आनन्दित और प्रभावित किया था कि उन्होंने दल के सभी सदस्यों को अपने यहाँ रात्रि भोज की दावत दी थी . क्या पार्टी थी ! वेज और नान वेज खाना, शराब और शबाब की बेपनाह मस्तियाँ ....................... एक बेहतरीन शाम ......................... शानदार काम का शानदार इनाम .................इससे बेहतर क्या हो सकता था .
ये फोटोग्राफर लड़का भी पिछले कई सालों से बेरोज़गार ही था . वैसे तो कम्प्यूटर साफ्टवेयर इंजीनियर था मगर फोटोग्राफी का जुनून था इसको . जब नौकरी नहीं मिली तो मायूस हो गया . जो भी छोटा मोटा काम मिल जाता कर लेता था .
नाम बता ना ........................... फिर एक बार दो तीन आवाजें गूँजीं .......................
"भूखिया" लड़के ने डरते हुए मरियल सी आवाज़ में कहा .
"क्या नाम है ? " भीड़ में से फिर आवाज़ आई .
"भूखिया" लड़के ने डरते हुए मरियल सी आवाज़ में दुबारा कहा .
"भुखिया ?" ये क्या नाम है ?" झुण्ड में सरगोशियाँ होने लगीं . ये क्या नाम हुआ ? इससे तो समस्या हल होने की बजाय और उलझ गई थी . इस नाम से तो पता ही नहीं चलता कि लड़के का मज़हब क्या है ?
समस्या जस की तस देखकर एक लड़के ने झुंझलाकर पूछा "अबे साले हिंदू है या मुसलमान ?"
"मुझे नहीं पता" लड़के ने डरते डरते मासूमियत से कहा .
"मुझे नहीं पता ! अबे क्या नहीं पता ?" लड़के ने गुब्बारा फरोश का कंधा धकियाते हुए ज़ोर से पूछा .
"मुझे नहीं पता ! वो हिन्दू .....मुसलमान......."लड़के ने अपने सर को खुजाते हुए बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया .
मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित था .
तभी भीड़ में से एक समझदार लड़का आगे आया और उसने लड़के की कलाई पकड़ कर कहा "देखो ........ये इसके हाथ पर मौली बंधी हुई है ! क्या यार ........नज़र नहीं आता है तुम्हें...... हिन्दू है यार हिन्दू !"
एक पल को मसअला हल हो गया था मगर तभी झुण्ड के एक लड़के ने गुब्बारा फरोश के गले की तरफ इशारा करते हुए कहा " वो देखो इसके गले में तावीज़ लटका है .....तावीज़ !........................मुसलमान है ........मुसलमान !" लड़का ज़ोर से चिल्लाया .
"अबे यार ..............." कहते हुए एक लड़के ने उलझ कर गुब्बारे वाले से पूछा "औ जानवर ये क्या है ये तावीज़ गले में क्यूँ डाल रखा है ? किसने डाला ये गले में ?"
"ये तावीज़ तो मेरी मासी ने डाला था गले में जब मुझे पीलिया हो गया था पिछले साल" गुब्बारा फरोश ने तावीज़ को हाथ में लेकर देखते हुए कहा "वो कहती थीं कि इससे मेरी बीमारी जल्दी ठीक हो जायेगी . मेरी माँ के पास पैसे नहीं थे न इसलिए वो मुझे डाक्टर के पास नहीं ले जा सकती थी . हमारी झुग्गी के ऊपर एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था कि सरकारी अस्पताल में बीमारी की दवा मुफ्त मिलती है ये पढ़कर वो मुझे सरकारी अस्पताल ले गई थी . मुझे याद है माँ डाक्टर को हाल बताती जाती थी और डाक्टर बिना गर्दन उठाये दवा लिखता जाता था . उस दिन मुझे बहुत तेज़ बुख़ार था . माँ ने डाक्टर से कहा भी था कि इसे बहुत तेज़ बुख़ार भी है मगर डाक्टर ने उलझ कर माँ को झिडकते हुए कहा था कि वो ज़्यादा बात न करे और जाकर दवा ले ले. डाक्टर ने मेरी तरफ़ देखा तक नहीं था . माँ ने मुझे स्टूल से हाथ पकड़ कर उठाया और अस्पताल के एक कोने में ज़मीन पर बिठा दिया और ख़ुद दवा लेने के लिए लाइन में लग गई . एक घंटे बाद वो लौटी तो उसके हाथ में कुछ दवाइयां थीं . घर आकर मां बाबूजी से कह रही थी कि इस में से कुछ दवाइयां अस्पताल में नहीं हैं . ये दवाइयां अस्पताल के सामने वाली दुकान से ख़रीद कर डाक्टर साहब ने दिखाने के लिए बोला है . मगर माँ ने अस्पताल से मिली हुई दवाईयों से ही काम चलाना ठीक समझा क्योंकि बाज़ार से दवाई खरीदना उसके लिए मुमकिन न था . मुझे लगता है शायद वो मेडिकल स्टोर गई तो थी तभी बाबा से कह रही थी कि एक दिन की दवा की क़ीमत हमारे दो दिन के राशन के बराबर है . इसलिए ख़ाली हाथ लौट आई . उसी दिन मासी आई थी और मेरे गले में ये तावीज़ डाल गई थी .और कुछ दिनों के अन्दर ही मैं ठीक हो गया था " यह कहते हुए उसने अकीदत के साथ तावीज़ को बारी बारी से दोनों आँखों से लगाया .
"तेरी मासी मुसलमान है क्या ?" एक लडके ने पूछा
"मुसलमान क्या होता है ? " गुब्बारा फरोश ने सवाल के जवाब में सवाल किया .
"तेरे हाथ में ये मौली किसने बाँधी ?" एक लड़के ने उसकी कलाई पकड़ते हुए जोर से पूछा .
"ये तो शायद बाबा ने बाँधी थी" लडके ने जवाब दिया .
पहेली को जितना सुलझाने की कोशिश की जा रही थी वो उतना ही उलझती जा रही थी .
"अच्छा चल बता, क्या तू मंदिर जाता है ?" झुण्ड में से किसी ने सवाल किया .
"हाँ जाता हूँ न ." गुब्बारा फरोश ने जवाब दिया .
"कौन से मंदिर जाता है ?" किसी ने पूछा .
"मैं तो कई मंदिरों में जाता हूँ बारी बारी . शनिवार को शनि मंदिर ज़रूर भेजते हैं बाबा . वहां बहुत भीड़ होती है न शनिवार को . गुब्बारा फरोश ने कहा .
"ये लो , मैं कह रहा था न हिन्दू है !" एक लड़के ने विजयी मुस्कान के साथ सबको संबोधित करते हुए कहा .
तभी एक मनचले ने यूं ही पूछ लिया " तू कभी मस्जिद भी गया है क्या ?"
"हाँ जाता हूँ न ! हर जुमा को मस्जिद ही जाता हूँ .रमजान में तो रोज़ाना जाता हूँ शाम को . वहीं रोज़ा खुलवाया जाता है न, वो इफ्तारी मिलती है फल फ्रूट, चाट, पकौड़ी और अच्छा खाना, भरपेट पूरे महीने . फिर ईद के दिन ईदगाह भी जाता हूँ बाबा के साथ .
गुबारा फरोश ने लड़कों को फिर कन्फ्यूज़ कर डाला था .
लड़कों ने अपना सर पीट लिया था . इस सारी गुफ्तुगू ने उनके उन्माद को खत्म सा कर दिया था और उनके सामने एक चैलेन्ज सा खड़ा कर दिया था . एक सवाल ! महज़ एक छोटा सा सवाल पहेली बन गया था !
भीड़ में से एक लड़का आगे आया जो ज़रा समझदार सा प्रतीत होता था . उसने भीड़ से मुख़ातिब होते हुए कहा ज़रा ठहरो ! मैं पता लगाता हूँ कि इसका धर्म क्या है !
"बेटा बताओ तुम दीपावली मनाते हो या ईद ?" उसने बड़ी नरमी से लड़के से मालूम किया .
गुब्बारा फरोश ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया हम तो दोनों ही मनाते हैं . मगर हम दीवाली पर पटाखे नहीं फोड़ते हैं क्योंकि पटाखे महंगे होते हैं न ! (लड़के ने गर्दन हिलाते हुए मासूमियत से कहा) और इनसे प्रदूषण भी होता है . मगर मैं हैं न वो ............ क्या कहते हैं .. हाँ रामलीला भी देखता हूँ . रामलीला मैदान में ख़ूब गुब्बारे, तलवारें और खिलौने बिकते हैं . दीवाली मुझे बहुत पसंद है . दीवाली पर मिठाई भी तो मिलती है . ईद पर भी मिठाई मिलती है . खीर भी मिलती है . ईद पर भी गुब्बारे और खिलौने खूब बिकते हैं भय्या . बहुत मज़ा आता है ." लड़के ने उत्साह से बताया .
"अच्छा चल ये बता कोई मन्त्र वंत्र भी आता है तुझे ?" लड़के ने पूछा .
"आता है न साहब ." गुब्बारा फरोश ने कहा .
भीड़ के चेहरे पर अचानक रौनक़ लौट आई .
"चल सुना कौन सा मन्त्र आता है ?" लडके ने कहा .
"ओम भुर्व भुव स: .........................." गुब्बारा फरोश ने एक ही सांस में गायत्री मन्त्र पढ़ डाला .
"अरे वाह ! कहाँ से सीखा ?" भीड़ में से किसी ने पूछा .
"वो जिस फुटपाथ पर हम रहते हैं न उसके पीछे स्कूल है वहां सुबह सुबह जब प्रार्थना होती है तो मैं ध्यान से सुनता रहता हूँ ." गुब्बारा फरोश ने बताया .
"कोई भजन आता है ?" लड़के ने पूछा .
"हां .. बहुत सारे आते हैं .............सुनाऊं ?" लड़के ने इजाज़त मांगी .
"सुना ......सुना......... सुना.......... एक साथ कई आवाजें गूँज उठीं .
गुब्बारा फरोश ने अपना एक हाथ कान पर रखा और दूसरा हवा में सीधा किया . आँखें बंद की और बुलंद आवाज़ में भजन गाना शुरू किया "दुनिया चले न श्रीराम के बिना ......"
गुब्बारा फरोश की आवाज़ में दर्द था, कशिश थी, जादू था........... सारा माहौल अचानक बदल गया था .
भीड़ अश अश कर उठी थी .
"हनुमान चालीसा गाऊँ ?" लड़के ने भजन मुकम्मल करने के बाद पूछा . लड़के को भी मज़ा आने लगा था .
जवाब का इंतज़ार किये बिना उसने अपनी आँखें बंद कर लीं . कुछ देर खामोश रहा जैसे कुछ याद करने की चेष्टा कर रहा हो फिर हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया "जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ..जय कपीस तिंहु लोक उजागर ..........."
"क्या आवाज़ है ......!, वाह ............! शाबाश !.................अबे यार यो तो पंडित है पंडित .............! ग़ज़ब !"
भीड़ फिर मत्रमुग्ध हो गई थी.
"पक्का पंडित है भाई ........... देख ज्ञानी बाबा है ज्ञानी बाबा !"
"आवाज़ में दम है भाई .........शानदार !" कई आवाजें फ़िज़ा में गूँजीं .
लड़के पर अपनी इन तारीफों का कुछ असर नहीं हुआ था . वो ज्यों का त्यों खड़ा था . एक दम मासूम, भोला भाला, निष्कपट................उसके चेहरे को देख कर लगता था मानो ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, काम, क्रोध, लालच............. सभी अवगुणों से पवित्र एक नन्हा साधु कोई पवित्रात्मा खड़ी हो.............शुद्धात्मा !
तभी पीछे से किसी मनचले ने सवाल किया "तू तो कह रहा था कि तू जुमे के दिन मस्जिद जाता है .."
"हाँ जाता हूँ न .......... जुमे के दिन जो अज़ान होती है न वो भी आती है मुझे. सुनाऊं ? और फिर जवाब का इंतेज़ार किये बिना वो अज़ान के अल्फाज़ दोहराने लगा .......अल्लाहु अकबर........... अल्लाहु अकबर..........."
गुब्बारा फरोश की आँखें बंद थीं . शहादत की उंगलियाँ कानों में थीं . चहरे पर एक नूर सा उभर आया था . मजमे मैं मौजूद हर शख्स के चहरे पर हैरत थी और दिलों का हाल अजीब सा हो चला था . सन्नाटा छाया हुआ था . मुकम्मल सन्नाटा . सन्नाटे को चीरती हुई उस नन्हे मौलवी की आवाज़ फिज़ा में बुलंद थी "लाईलाहा इलल्लाह :"
कुछ देर पहले जो लड़का पंडित मालूम हो रहा था अचानक मौलवी लगने लगा था .
मजमे को तो मानो सांप सूँघ गया था . अब किसी में कोई सवाल करने की सकत जैसे बाक़ी न थी . कुछ पलों तक तो विस्मय भरी शांति छाई रही फिर अचानक मजमे में से किसी ने धीरे से पूछा "भाई तेरा नाम क्या है ?"
"भूखिया" लडके ने सवाल की आवाज़ की जानिब गर्दन घुमाते हुए एक बार फिर बताया .
"भुखिया ...... ये क्या नाम है यार ................. किसने रखा तेरा ये नाम ..........." लड़के ने दूसरा सवाल पूछा .
"मेरे बाबा ने रखा " लड़के ने मासूमियत से अपनी ढीली फटी हुई पैंट को ऊपर उठाते हुए जवाब दिया जो नीचे गिरी जा रही थी .
"भुखिया ?, ये कोई नाम होता है ?" सवाल करने वाले लड़के ने वज़ाहत चाही .
गुब्बारा फरोश की चमकदार आँखें अचानक बेनूर हो गईं . ऐसा लगा जैसे किसी ने अचानक एक नूरानी क़ुमकुमे का स्विच आफ़ करके बर्क़ी शुआओं का सिलसिला मुन्क़ते कर दिया हो जिसकी वजह से कुमकुमा बेनूर हो गया हो .
गुब्बारा फरोश ने धीरे धीरे कहना शुरू किया "बाबा ने बताया था मुझे एक बार . उन्होंने कहा था कि जिस रात मैं पैदा हुआ था वो रात बहुत भयानक रात थी . शहर भर में दंगे की वजह से कर्फ्यू लगाया गया था . ये कर्फ्यू एक हफ्ते से लगा हुआ था जिसकी वजह से बाबा मज़दूरी पर नहीं जा पा रहे थे . घर पर राशन न होने की वजह से बाबा और मां पांच दिन से भूखे थे . इसी काली घनघोर भूखी रात में अचानक मेरी मां ने तड़पना शुरू किया . पड़ौस की झुग्गी से एक बुआजी ने मां को संभाला और मेरा जन्म हुआ . बाबा कहते हैं कि जब मैं जन्मा तो इतना भूखा था कि मैं अपनी माँ के बालों को ही मुंह मैं लेकर चूसने की कोशिश कर रहा था . भूख के मारे मेरा और मां का बुरा हाल था . बुआजी ने मेरी माँ को पानी में आटा और थोड़ी सी शक्कर का घोल बना कर पिलाया था तब कहीं मेरी माँ की जान बच पाई थी . मैं जब पैदा हुआ तो हर तरफ़ भूख ही भूख थी मुझे अभी भी भूख बहुत लगती है . रोज़ लगती है .दिन में दो दो बार लगती है. मेरे बाबा कहते हैं "भुखिया तेरे अन्दर तेरे नाम का असर आया है रे ! तुझे भूख बहुत लगती है ! तुझे रोज़ खाना चाहिए . ऐसा नहीं होता है भुखिया . भूख रोज़ नहीं लगनी चाहिए . समझा कर ." मगर मेरी समझ में नहीं आती भय्या ! मैं क्या करूं ?"
गुब्बारा फरोश की मासूम, उदास आँखों में बला का दर्द उतर आया था . हुजूम में सन्नाटा छाया हुआ था .
"भय्या ....आज आपने मेरे सारे गुब्बारे फोड़ दिए .........मुझे आज भी भूखा सोना पड़ेगा . बाबा की डांट खानी पड़ेगी वो अलग . भय्या जिस रात हमारे पास खाने को कुछ नहीं होता न उस रात मेरी माँ,मुझे अपनी गोद में लिटाकर कहानी सुनाती है ऐसी कहानी कि जिसे सुनते सुनते मैं ये भूल जाता हूँ कि मैं भूखा हूँ. मैं सब भूल जाता हूँ भूख भी प्यास भी .......मगर जब सोकर उठता हूँ न सुबह ............ वापिस भूख लगने लगती है (लड़के ने पेट पर हाथ फेरते हुए मुस्कुरा कर शिकायती लहजे में कहा.) इसीलिए मेरे बाबा ने मेरा नाम भूखिया रख दिया "
"भय्या आप मुझसे वो पूछ रहे थे न हिन्दू .मुसलमान कुछ ? मुझे नहीं पता भय्या ........ मुझे तो इस भूख से ही फुर्सत नहीं मिलती ............. (वो खिलखिलाकर हंस पड़ा ) मुझे तो जहां पेट भरने का सामान मिलता है चला जाता हूँ मंदिर, मस्जिद, ईदगाह, चर्च, गुरुद्वारा, दरगाह,जागरण, भजन कीर्तन, क़व्वाली ................... हाँ भय्या मुझे क़व्वाली भी आती है ...........एक क़व्वाली भी सुनाऊं ..वो वाली .............. मुहम्मद के शहर में ...................... ."
गुब्बारा फरोश गुनगुनाने लगता है "................हूँ हूँ हूँ .................." फिर अचानक कहने लगता है "भय्या मुझे त्यौहार सब अच्छे लगते हैं ...ईद पर सेवइयां, दीवाली पर मिठाई, होली पर गुजिया, रमजान में इफ्तारी.......................... मज़ा आता है ........ ये त्यौहार रोज़ होने चाहिए ...............मैं ने ये सब यहीं मंदिर मस्जिद से सीखा भय्या अज़ान, कीर्तन, भजन, प्रेयर सब ................ मगर एक चीज़ नहीं सीख पाया भय्या ................ ये भूख का इलाज नहीं सीखा ............. रोज़ लग जाती है भूख .................पता नहीं क्यूँ ? ............ एक बार में क्यूँ नहीं बुझ जाती ?......................... रोज़ परीक्षा लेती है भय्या ........रोज़ ....रोज़ गुब्बारे बेचो ...... रोज़ ........... "
भीड़ खामोश थी ..मानो किसी बहुत बड़े संत के प्रवचन सुन रही हो ................... शांत एकदम शांत मरघट की तरह ............... सारे सिरफिरे, उपद्रवी ऐसे लग रहे थे मानो किसी कब्रिस्तान में ज़िंदा लाशें खड़ी हों और अपनी मौत का मातम मना रही हों ...................
"भय्या इस भूख का कोई इलाज करो ..................... इसे मार डालो बस ...................... इसका कोई उपाय बताओ ..............................हिन्दू, मुसलमान ये बड़ी बात नहीं है ........ये भूख बड़ी समस्या है ....................."
भीड़ में सन्नाटा था किसी के पास कोई जवाब नहीं था .
रविवार, 9 अगस्त 2020
बस इतनी सी बात ……
बस इतनी सी बात ……
धड़ाम की आवाज़ सुनकर राधिका कमरे कि तरफ़ लपकी तो देखा
ज़मीन पर स्कवैश की खाली बोतल पड़ी है । प्लास्टिक की ये बोतल दिनेश ने अलमारी से
निकाल कर ।ग़ुस्से में फैंकी थी । राधिका ने बोतल को उठाते हुये तल्ख लहजे में
दिनेश से कहा “तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है?
मैं देख रही हूं आजकल तुम्हें कुछ ज़्यादा ही ग़ुस्सा आने लगा है ? आज तो
सामान फैंक रहे हो कल मुझे भी उठा कर फैंक दोगे ?
“हां फैंक दूंगा ! तो ?” दिनेश ने झुंझलाते हुये । ग़ुस्से से जवाब
दिया । फिर बात को सम्भालते हुये ज़रा नरमी से कहने लगा “राधिका तुम्हें कितनी बार कहा है ये खाली
बोतलें अलमारी में मत रखा करो । मुझे इन्हें देखकर उलझन होती है । मगर तुम हर बार
भूल जाती हो या तुम्हारी समझ में नहीं आता है ।“
राधिका फिर बिफ़र पड़ी “मेरी
समझ में तो सब आता है । मुझे ये भी समझ में आ रहा है कि तुम आजकल बदल क्यूं गये हो
।“
“मैं बदल गया हूं ?” दिनेश ने ज़ोरदार क़ह्क़हा लगाया ।
“क्या बात कर रही हो तुम ?” दिनेश ने अजीब सा मुंह बना कर मज़ाकिया लहजे में
कहा ।
“जब से तुम्हारे आफ़िस में वो चुड़ैल सुलेखा आई है तब से तुम्हारे रंग ढंग बदले
बदले हैं ………।“ राधिका ने कड़वाहट भरे लहजे में कहा ।
“अब हमारे बीच सुलेखा कहां से आ गई ? ” दिनेश ने हंसते हुये चुट्की ली ।
“मैं सब समझती हूं । मैं जब दूसरे मर्दों की आंखें पढ़ सकती हूं तो तुम्हारी
आंखें भी पढ़ सकती हूं । किसी ग़लतफ़हमी में मत रहना । मैं देख रही हूं आजकल बड़े
तैय्यार हो होकर आफ़िस जाते हो । रोज़ नये कपड़े, रोज़ नई खुश्बु और रोज़ाना जूते भी
चमकाये जाते हैं । ये सब किस के लिये ?”
इस लांछन ने सीधे सादे दिनेश के तन बदन में आग लगा दी थी मगर वो खामोश होकर
सोफ़े पर बैठ गया ।
राधिका का लैक्चर जारी था “……। तुम देखना मैं आज ही उस चुड़ैल को फ़ोन करूंगी और
बताऊंगी ……… मैं बताऊंगी कि ये जो दिनेश साहब तुम्हारे सामने बड़े डिसैंट बने फ़िरते
हैं न ये घर मैं सामान उठा उठा कर फ़ैंकते हैं …………………।“
“राधिका तुम बात कहां की कहां ले जा रही हो ?” दिनेश ने नरमी से कहा ।
“देखो किसी शरीफ़ महिला के बारे में ऐसी बातें नहीं करते हैं ।“ दिनेश ने
राधिका को समझाते हुये कहा ।
“ओ…हो…हो…… तो साहब को बुरा लग रहा है । क्यूं भाई ? आपको बुरा क्यूं लग रहा है ? कुछ तो बात है
न ? बोलो …बोलो ……खामोश क्यूं हो ?” राधिका का पारा और चढ़ गया था ।
दिनेश का मन तल्खी से भर
गया । वो अभी तक राधिका की बातों को हंस कर टाल रहा था मगर राधिका के इस इल्ज़ाम ने
उसके आत्मसम्मान को चोटिल कर दिया था । एक पराई औरत पर लगाया गया झूठा लांछन उसे
बड़ा तकलीफ़देह महसूस हो रहा था । वो खामोशी से उठा और अपने कमरे में चला गया ।
राधिका बहुत देर तक बुड़बुड़ाती रही और फ़िर खुद ही नाराज़ होकर बिस्तर में धंस गई ।
राधिका जानती थी कि दिनेश
बहुत ही नेक और संजीदा इंसान है । उसने केवल दिनेश को जलाने के लिये सुलेखा का नाम
लिया था और ये बातें की थीं लेकिन ये तीर दिनेष की भावनाओं को बहुत गहराई तक आहत
कर गया था ।
दिनेश तैय्यार होकर बिना
नाश्ता किये आफ़िस चला गया । राधिका दोपहर तक बिस्तर पर पड़ी रोती रही । दिनेश लन्च
के लिये घर आया करता था मगर आज वो नहीं आया । आफ़िस ख़्त्म होने के बाद भी वो आफ़िस
में ही बैठ्कर पैण्डिग काम निपटाने लगा । दरअसल वो जल्दी घर नहीं जाना चाहता था ।
उसे रह रह कर राधिका के शब्द याद आ रहे थे । रात 9 बजे वो आफ़िस से निकला और बाहर
ही खाना खा कर देर रात 11 बजे घर पहुंचा और दूसरे कमरे में जाकर सो गया ।
रोज़ 6 बजे घर आने वाला
दिनेश जब 7 बजे तक घर नहीं आया तो राधिका एकबारगी परेशान हो उठी । उसने कई बार
सोचा कि दिनेश को फ़ोन करे मगर फ़िर उसे दिनेश पर ग़ुस्सा आ जाता । वो सोचने लगती
ग़लती तो ख़ुद करते हैं और फिर अकड़ भी दिखाते हैं । इन्हें तो बस मुझे परेशान करने
में मज़ा आता है । मैं फ़ोन क्यूं करूं ? देखती हूं कब तक नहीं आते ? हालांकि वक़्त
गुज़रने के साथ दिल की घबराहट भी बढ़ती जाती थी मगर अन्दर की ईगो फ़ोन करने से हर बार
रोक देती थी । दिल में बेक़रारी, आंखों में जलन और पेट में भूख लिये वो तब तक जागती
रही जब तक दिनेश घर नहीं आ गया ।
दिनेश 11 बजे घर में दाख़िल
हुआ मगर राधिका की उम्मीद के ख़िलाफ़, उससे बात किये बग़ैर दूसरे कमरे में जाकर सो
गया । राधिका भी निढाल होकर भूखे पेट ही बिस्तर पर अकेली दराज़ हो गई । अब घर के दो
कमरों में दो जिस्म थे, दो दिल थे और दोनों के दरम्यान ईगो की एक पारदर्शी दीवार
थी । दोनों की रात आंखों में कटी । मगर ये रात ऐसी आख़्री रात नहीं थी ।
आज संवादहीनता का तीसरा दिन
था । शाम को जब दिनेश घर लौटा तो राधिका अपने मायके जा चुकी थी । राधिका का तर्क
था कि जब दिनेश उससे बात ही नहीं करता, उसके साथ खाना नहीं खाता, उससे अलग कमरे
में सोता है तो फिर इस घर में रहने का औचित्य क्या ? हो सकता है कि मेरे जाने के
बाद दिनेश को मेरी कमी का अहसास हो और सब कुछ पहले जैसा हो जाये ?
उधर दिनेश को राधिका का यूं
चले जाना बहुत अखर रहा था । इतनी छोटी सी बात पर क्या कोई घर छोड़ देता है ? क्या उसको मेरी कोई क़द्र नहीं है, कोई फ़िक्र
नहीं है ? क्या वो ख़ुद मुझसे बात नहीं कर सकती थी ? अगर वो बात कर लेती तो क्या
उसके मान सम्मान में कोई कमी आ जाती ? ठीक है फ़िर मैं भी देखता हूं कब तक रहती है
मायके में । दिनेश ने भी निश्चय कर लिया था कि अब वो उसे लेने नहीं जायेगा । उसे
आना होगा तो वो ख़ुद आ जायेगी ।
दिनेश ने तय कर लिया था कि
वो राधिका को लेने नहीं जायेगा और राधिका ने भी निश्चय कर लिया था कि वो ख़ुद से घर
नहीं जायेगी । मामला गम्भीर हो चला था । राधिका को मायके में रहते हुये एक हफ़्ता
बीत चुका था । मां और भाई से उस ने अभी तक कुछ नहीं बताया था । उसके घर वालों को
यह बात अखरती भी नहीं थी क्यूंकि अक्सर दिनेश आफ़िस के काम काज से शहर से बाहर जाता
रहता था और उस दौरान वो मां के घर ही रहा करती थी ।
राधिका ने मन ही मन सोच
लिया था कि जिस आदमी को उसकी ज़रूरत ही नहीं उसके साथ रहने का क्या फ़ायदा ? क्यूं न
दिनेश से तलाक़ ले लिया जाये । उधर दिनेश ने भी अपने मन को समझा लिया था और वो ख़ुद को
यह महसूस करवाने की कोशिश करने लगा था कि
वो पहले वाला कुंवारा दिनेश ही है । उसने आफ़िस के साथ साथ घर का काम भी सम्भाल
लिया था । खाना बनाने और कपडे धोने की आदत तो उसे पहले से ही थी क्यूंकि पढ़ाई और
फ़िर नौकरी के पांच साल तक वो अकेले ही कमरा किराये पर ले कर रहा करता था । राधिका
के ज़िन्दगी में आने के बाद ही उसे इन कामों से छुट्टी मिली थी । दिनेश ने सोच लिया
था कि वो वापिस अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौट आयेगा ।
सुबह सवेरे जब वो बाथरूम में नहाने के लिये
घुसता या फ़िर नाश्ता बनाने के लिये किचन में जाता या ड्राईंग रूम में बैठकर अख़बार
पढ़ता तो वहां मौजूद हर चीज़ उसे राधिका की याद दिलाती थी । साफ़ सुथरा चमकता हुआ
बाथरूम, चमाचम फ़र्श, क़रीने से रखे हुये सोफ़ा सैट जो राधिका ने ही अपनी पसन्द से
ख़रीदे थे, कांच की अलमारियों में सजे गुलदान, टेबल पर बिछा हुआ सुर्ख़ गुलाबों वाला
टेबल कवर, सिंगार मेज़ पर रखी हुई बिन्दिया, काजल और परफ़्यूम की खूबसूरत शीशी। घर
के जिस कोने में वो नज़र घुमाता, जिस चीज़ की जानिब निगाह उठाता मानो उससे सवाल करती
थी “दिनेश ! राधिका कब आयेगी ?”
ये अकेलापन उसे
अब काटने लगा था एक एक पल एक एक सदी के बराबर महसूस होता था इसलिये उसने घर को
होटल बना लिया था । वो सिर्फ़ देर रात सोने के लिये घर आता और सुबह जल्दी घर से
निकल जाता था । एक हफ़्ता और गुज़रने को था । किचन, बाथरूम, ड्राईंग रूम, बालकनी,
फ़र्श, टेबल, सोफ़ा ग़रज़ वो सभी चीज़ें जो कभी चमाचम रहा करती थीं अपनी चमक, अपना नूर
खो चुकीं थीं ।
राधिका दिन भर गुमसुम अपने
कमरे में अकेली पड़ी रहती थी । राधिका की मां को भी अब कुछ कुछ शक होने लगा था मगर
वो जब भी इस बारे में कुछ बात शुरु करती राधिका बड़ी सफ़ाई से उसे टाल जाती थी । हमेशा
की तरह आज भी राधिका अपने कमरे में अकेली, गुमसुम पड़ी थी । अचानक उसे बड़ी ज़ोर से
किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई । वो घबरा कर उठी और कमरे की खिड़की के एक पट को
हल्का सा खोल कर बाहर देखने लगी । सामने वाला कमरा उसके भाई राजेश का था । राजेश
कमरे में अलमारी के पास खड़ा था । अलमारी खुली हुई थी । पैरों के पास फ़र्श पर
नक़्क़ाशीदार पीतल के दो ख़ूबसूरत गिलास पडे हुये थे । राधिका समझ गई थी कि ये गिलास या
तो अलमारी खोलते हुये गिरे हैं या फिर भाई ने इन्हें झुंझलाहट में ज़मीन पर पटक
दिया है । उसके चेहरे पर झुंझलाहट और ग़ुस्से के वही भाव झलक रहे थे जो उस दिन
दिनेश के चेहरे से झलक रहे थे । अचानक उसकी भाभी रिया लगभग दौड़ते हुये राजेश के
कमरे दाख़िल हुई । उसके दोनों हाथ आटे से सने हुये थे शायद वो किचन में आटा गूंथ
रही थी और आवाज़ सुनकर हड़बड़ाहट में ऐसे ही कमरे की तरफ़ दौड़ पड़ी थी । रिया जैसे ही
कमरे में दाख़िल हुई राजेश उस पर झल्ला पड़ा । उसने झुंझलाते हुये रिया से कहा
“तुम्हें कितनी बार मना किया है कि मेरी रैक में कोई दूसरा सामान मत रखा करो ।
इसमें मेरी आफ़िस की फ़ाईलें रहती हैं । मगर तुम्हारी समझ में ही नहीं आता है । और
ये गिलास ! ये गिलास रखने की जगह है ?“
रिया ने ख़ामोशी से दोनों गिलासों
को उठाया और पास ही टेबल पर रख दिया । ये ख़ूबसूरत गिलास उसकी मां ने ख़ास उसके लिये
मुरादाबाद से मंगवाये थे । गिलासों को टेबल पर रखकर रिया फ़िर राजेश के सामने खड़ी
हो गई ।
राजेश ने एक फ़ाईल निकालते हुये पास खड़ी रिया को
सवालिया निगाहों से देखा । फ़िर दूसरी फ़ाईल निकालने लगा । रिया अभी भी वहीं खड़ी थी
। दूसरी फ़ाईल निकाल कर उसने पास खड़ी रिया को फ़िर देखा और झुंझला कर पूछा “ अब क्या
है ? यहां क्यूं खड़ी हो ?”
रिया ने राजेश के हाथ से फ़ाईल छीन कर बिस्तर पर फ़ैंक दी और अपनी दोनो बांहें
राजेश की गर्दन के इर्दगिर्द डालकर बड़ी
मासूमियत से कहनी लगी “ अच्छा साहिबे आलम अभी तक नाराज़ हैं ? चलिये नाचीज़ से ग़लती
हो गई । अब तो माफ़ कर दीजिये हुज़ूर । चलिये हम आपके कान पकड़ कर आपसे माफ़ी मांगते
हैं “ और ये कहकर उसने राजेश के दोनों कान, अपने आटे से सने हुये हाथों से कसकर
पकड़ लिये ।
“देखो रिया मेरा मूड ठीक नहीं है मुझे बहुत सारा काम करना है तुम समझती नहीं
हो……” राजेश का जुमला पूरा होता उससे पहले ही रिया ने अपना एक हाथ उसके होंठों पर
रख दिया और दूसरे हाथ से उसके गाल को सहलाते हुये कहने लगी “मैं सब समझती हूं
……………और जो नहीं समझती वो बाद में आराम से मुझे समझा देना । रही बात मूड की तो मूड
वूड की ऐसी तैसी …………… काम बाद में भी होता रहेगा । पहले पेट पूजा बाद में काम
दूजा । तुम यहां बैठो मैं अभी नाश्ता लेकर आई “ और राजेश के कान , गाल और पूरा
मुंह आटे से भर कर हंसते हुये तेज़ी से कमरे से निकल गई ।
रिया की बच्ची तू ने मेरा पूरा मुंह आटे से भर दिया तेरी तो ऐसी की तैसी राजेश
ने बड़बड़ाते हुये मुंह से आटा झाड़ा और रिया को पकड़ने के लिये तेज़ी से उसके पीछे दौड़
लगाई मगर रिया तब तक किचन में पहुंच चुकी थी । राजेश जैसे ही उसे पकड़ने के लिये
कमरे से निकला सामने से मां को आता देखकर वापिस कमरे में घुस गया ।
राधिका के चेहरे पर
मुस्कुराहट तैर गई उसने धीरे से खिड़की का पट बन्द कर दिया । राधिका ने अपना सूटकेस
तैयार किया और कपड़े तब्दील करके तेज़ी से कमरे से बाहर आ गई । मां और भाई ने जब
सुबह सुबह राधिका को जाने के लिये तैयार देखा तो भाई ने घबरा कर एक साथ कई सवाल कर
डाले “क्या हुआ राधिका ………अचानक………सब ठीक
तो है ?” राधिका ने भाई के गाल को सहलाते हुये मुस्कुरा कर कहा “हां हां सब ठीक है
राजेश !, दिनेश का फ़ोन आया था वो अभी घर लौटने वाले हैं इसलिये जा रही हूं ।“
“मगर नाश्ता तो करके जाईये भाभी “ किचन से निकलते हुये रिया ने इसरार किया ।
“नहीं रिया दिनेश थके हुये होंगे उन्हीं के साथ करूंगी नाश्ता” राधिका ने
मुस्कुराते हुये कहा ।
मां की आंखों में संतोष का भाव साफ़ नज़र आ रहा था । उसने प्यार से राधिका के सर
पर हाथ रखते हुये कहा “ठीक है मेरी बच्ची …। खुश रह सलामत रह ।“
“राधिका थोड़ी देर रुक मैं तुझे आफ़िस जाते हुये घर ड्राप कर दूंगा” राजेश ने अपने
बाल ठीक करते हुये कहा ।
“नहीं राजेश …मैं लेट हो जाउंगी” ये कहकर वो सूटकेस उठाये तेज़ी से घर से निकल
गई ।
सुबह के साढ़े आठ बजे थे ।
अचानक डोरबेल बजने लगी ।राजेश किचन में चाय बना रहा था । लगातार बज रही बेल को सुन
कर वो झल्ला गया और ग़ुस्से से दरवाज़ा खोलकर चिल्लाया “कौन है ?”
दरवाज़ा खुलते ही वो सन्न रह गया ।
सामने राधिका खड़ी थी । एक सैकेण्ड को उसे कुछ समझ नहीं आया । फ़िर अचानक राधिका
ने उसे अपनी बांहों में भींच लिया । दिनेश हतप्रभ था । वो जड़वत खड़ा था । राधिका की
आखों से गर्म गर्म लावा बह रहा था । इस गर्म लावे ने इतने दिनों की कड़वाहट, दर्द,
तकलीफ़, शिकवे, शिकायतें सब कुछ जला कर राख कर दिया था । जब राधिका की आंखों से
निकलने वाला गर्म लावा दिनेश के गालों तक पहुंचा तो मानो उसका अहसास जागा । दिनेश ने राधिका को अपनी बांहों के घेरे में ले
लिया । दिनेश की आंखों से शीतल जल की धारा बह निकली और बहते बहते राधिका के गालों
तक जा पहुंची । शीतल जल धारा ने लावे को ठ्ण्डा कर दिया था । सब कुछ शांत हो चला
था । आंसुओं में बहुत ताक़त होती है । ये बरसों की कड़वाहट और सदियों की अदावत को एक
पल में ख़्त्म कर देते हैं । बहुत देर तक दोनों इसी हालत में खड़े रहे बिल्कुल मौन
बिल्कुल नि:शब्द ! मौन का भी अपना अलग
प्रभाव है, अलग शक्ति है । कभी कभी ये शब्दों से भी अधिक प्रभावी महसूस होता है ।
जैसे आज महसूस हो रहा था दिनेश और राधिका को ।
दिनेश ने राधिका को ख़ुद से
अलग किया और हाथ पकड़ कर अन्दर लाया और उसे सोफ़े पर बिठाया । किचन से चाय लाकर
राधिका के हाथ में पकड़ाई और उसके क़रीब बैठ गया । राधिका ने ड्राईंग रूम पर नज़र
दौड़ाई । सब कुछ अव्यवस्थित था । उसने थोड़ा आगे झुककर किचन की तरफ़ नज़र घुमाई
…………किचन का हाल भी बुरा था । ढेरों बर्तन सिंक में पड़े थे । उसने दिनेश की तरफ़
सवालिया नज़रों से देखा । दिनेश की आंखों ने भी सवाल पढ़ लिया था । प्रत्युत्तर में
उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया “तुम्हारे बिना कुछ भी ठीक नहीं था राधिका …… कुछ भी
नहीं”
दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट तैर गई । निश्च्छ्ल, निष्कपट, निर्मल
मुस्कुराहट ……………
दिनेश ने राधिका के हाथों को अपने हाथों में लेते हुये कहा “ आई एम सारी
राधिका ………।“
राधिका ने दिनेश के हाथों को अपने गालों पर फ़ैरते हुये कहा “नहीं दिनेश
……………आई एम सारी”
कमरे में ख़ामोशी तैर गई………………और आंखों में आंसूं तैरने लगे ।
“चलो आज आफ़िस की छुट्टी
करते हैं और मिल कर इस कबाड़ख़ाने को वापिस एक घर बनाते हैं ।” यह कहते हुये दिनेश
खड़ा हो गया………………… चलो राधिका ………………और उसने राधिका का हाथ पकड़ उसे भी खड़ा कर दिया
।
रविवार, 8 मार्च 2020
होली
شاعر
شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ ! واہ ! کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...
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