शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

 नात पाक


मुहम्मद मुस्तुफा सल्ले-अला की शान क्या कहना
नहीं आया फिर उन जैसा कोई ज़ीशान क्या कहना

शहे-वाला, शहे-बतहा, शाहे-कौनैन क्या कहना
खुदा की बज़्म में उनकी भला फिर शान क्या कहना

ये फरमान-ए-इलाही है हिदायत का ख़ज़ाना है
मिला है उनकी निस्बत से हमें क़ुरआन क्या कहना

जो नक्श-ऐ-पा चला उनके तो फिर ये फैज़ पाया है
बड़ी मुश्किल थीं जो राहें, हुईं आसान क्या कहना

किसी ने आयशा माँ से जो पूछा उनके बारे में
बताया ज़िन्दगी उनकी थी बस कुरआन क्या कहना

अंधेरी रात सी जु़ल्फें निगाहें माह-ओ-अख्तर सीं
हों गोहर देख शर्मिंदा, लब-ओ-दन्दान क्या कहना

अरब के रेगजा़रों से दरोग़-ऐ-कुफ्र में जिसने
सदाक़त की इमामत का किया ऐलान क्या कहना

मदीने की जि़यारत का हमें भी शर्फ़ हासिल हो
मुकम्मल हो कभी अकमल का ये अरमान क्या कहना

अकमल नईम अकमल


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شاعر

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