बस इतनी सी बात ……
धड़ाम की आवाज़ सुनकर राधिका कमरे कि तरफ़ लपकी तो देखा
ज़मीन पर स्कवैश की खाली बोतल पड़ी है । प्लास्टिक की ये बोतल दिनेश ने अलमारी से
निकाल कर ।ग़ुस्से में फैंकी थी । राधिका ने बोतल को उठाते हुये तल्ख लहजे में
दिनेश से कहा “तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है?
मैं देख रही हूं आजकल तुम्हें कुछ ज़्यादा ही ग़ुस्सा आने लगा है ? आज तो
सामान फैंक रहे हो कल मुझे भी उठा कर फैंक दोगे ?
“हां फैंक दूंगा ! तो ?” दिनेश ने झुंझलाते हुये । ग़ुस्से से जवाब
दिया । फिर बात को सम्भालते हुये ज़रा नरमी से कहने लगा “राधिका तुम्हें कितनी बार कहा है ये खाली
बोतलें अलमारी में मत रखा करो । मुझे इन्हें देखकर उलझन होती है । मगर तुम हर बार
भूल जाती हो या तुम्हारी समझ में नहीं आता है ।“
राधिका फिर बिफ़र पड़ी “मेरी
समझ में तो सब आता है । मुझे ये भी समझ में आ रहा है कि तुम आजकल बदल क्यूं गये हो
।“
“मैं बदल गया हूं ?” दिनेश ने ज़ोरदार क़ह्क़हा लगाया ।
“क्या बात कर रही हो तुम ?” दिनेश ने अजीब सा मुंह बना कर मज़ाकिया लहजे में
कहा ।
“जब से तुम्हारे आफ़िस में वो चुड़ैल सुलेखा आई है तब से तुम्हारे रंग ढंग बदले
बदले हैं ………।“ राधिका ने कड़वाहट भरे लहजे में कहा ।
“अब हमारे बीच सुलेखा कहां से आ गई ? ” दिनेश ने हंसते हुये चुट्की ली ।
“मैं सब समझती हूं । मैं जब दूसरे मर्दों की आंखें पढ़ सकती हूं तो तुम्हारी
आंखें भी पढ़ सकती हूं । किसी ग़लतफ़हमी में मत रहना । मैं देख रही हूं आजकल बड़े
तैय्यार हो होकर आफ़िस जाते हो । रोज़ नये कपड़े, रोज़ नई खुश्बु और रोज़ाना जूते भी
चमकाये जाते हैं । ये सब किस के लिये ?”
इस लांछन ने सीधे सादे दिनेश के तन बदन में आग लगा दी थी मगर वो खामोश होकर
सोफ़े पर बैठ गया ।
राधिका का लैक्चर जारी था “……। तुम देखना मैं आज ही उस चुड़ैल को फ़ोन करूंगी और
बताऊंगी ……… मैं बताऊंगी कि ये जो दिनेश साहब तुम्हारे सामने बड़े डिसैंट बने फ़िरते
हैं न ये घर मैं सामान उठा उठा कर फ़ैंकते हैं …………………।“
“राधिका तुम बात कहां की कहां ले जा रही हो ?” दिनेश ने नरमी से कहा ।
“देखो किसी शरीफ़ महिला के बारे में ऐसी बातें नहीं करते हैं ।“ दिनेश ने
राधिका को समझाते हुये कहा ।
“ओ…हो…हो…… तो साहब को बुरा लग रहा है । क्यूं भाई ? आपको बुरा क्यूं लग रहा है ? कुछ तो बात है
न ? बोलो …बोलो ……खामोश क्यूं हो ?” राधिका का पारा और चढ़ गया था ।
दिनेश का मन तल्खी से भर
गया । वो अभी तक राधिका की बातों को हंस कर टाल रहा था मगर राधिका के इस इल्ज़ाम ने
उसके आत्मसम्मान को चोटिल कर दिया था । एक पराई औरत पर लगाया गया झूठा लांछन उसे
बड़ा तकलीफ़देह महसूस हो रहा था । वो खामोशी से उठा और अपने कमरे में चला गया ।
राधिका बहुत देर तक बुड़बुड़ाती रही और फ़िर खुद ही नाराज़ होकर बिस्तर में धंस गई ।
राधिका जानती थी कि दिनेश
बहुत ही नेक और संजीदा इंसान है । उसने केवल दिनेश को जलाने के लिये सुलेखा का नाम
लिया था और ये बातें की थीं लेकिन ये तीर दिनेष की भावनाओं को बहुत गहराई तक आहत
कर गया था ।
दिनेश तैय्यार होकर बिना
नाश्ता किये आफ़िस चला गया । राधिका दोपहर तक बिस्तर पर पड़ी रोती रही । दिनेश लन्च
के लिये घर आया करता था मगर आज वो नहीं आया । आफ़िस ख़्त्म होने के बाद भी वो आफ़िस
में ही बैठ्कर पैण्डिग काम निपटाने लगा । दरअसल वो जल्दी घर नहीं जाना चाहता था ।
उसे रह रह कर राधिका के शब्द याद आ रहे थे । रात 9 बजे वो आफ़िस से निकला और बाहर
ही खाना खा कर देर रात 11 बजे घर पहुंचा और दूसरे कमरे में जाकर सो गया ।
रोज़ 6 बजे घर आने वाला
दिनेश जब 7 बजे तक घर नहीं आया तो राधिका एकबारगी परेशान हो उठी । उसने कई बार
सोचा कि दिनेश को फ़ोन करे मगर फ़िर उसे दिनेश पर ग़ुस्सा आ जाता । वो सोचने लगती
ग़लती तो ख़ुद करते हैं और फिर अकड़ भी दिखाते हैं । इन्हें तो बस मुझे परेशान करने
में मज़ा आता है । मैं फ़ोन क्यूं करूं ? देखती हूं कब तक नहीं आते ? हालांकि वक़्त
गुज़रने के साथ दिल की घबराहट भी बढ़ती जाती थी मगर अन्दर की ईगो फ़ोन करने से हर बार
रोक देती थी । दिल में बेक़रारी, आंखों में जलन और पेट में भूख लिये वो तब तक जागती
रही जब तक दिनेश घर नहीं आ गया ।
दिनेश 11 बजे घर में दाख़िल
हुआ मगर राधिका की उम्मीद के ख़िलाफ़, उससे बात किये बग़ैर दूसरे कमरे में जाकर सो
गया । राधिका भी निढाल होकर भूखे पेट ही बिस्तर पर अकेली दराज़ हो गई । अब घर के दो
कमरों में दो जिस्म थे, दो दिल थे और दोनों के दरम्यान ईगो की एक पारदर्शी दीवार
थी । दोनों की रात आंखों में कटी । मगर ये रात ऐसी आख़्री रात नहीं थी ।
आज संवादहीनता का तीसरा दिन
था । शाम को जब दिनेश घर लौटा तो राधिका अपने मायके जा चुकी थी । राधिका का तर्क
था कि जब दिनेश उससे बात ही नहीं करता, उसके साथ खाना नहीं खाता, उससे अलग कमरे
में सोता है तो फिर इस घर में रहने का औचित्य क्या ? हो सकता है कि मेरे जाने के
बाद दिनेश को मेरी कमी का अहसास हो और सब कुछ पहले जैसा हो जाये ?
उधर दिनेश को राधिका का यूं
चले जाना बहुत अखर रहा था । इतनी छोटी सी बात पर क्या कोई घर छोड़ देता है ? क्या उसको मेरी कोई क़द्र नहीं है, कोई फ़िक्र
नहीं है ? क्या वो ख़ुद मुझसे बात नहीं कर सकती थी ? अगर वो बात कर लेती तो क्या
उसके मान सम्मान में कोई कमी आ जाती ? ठीक है फ़िर मैं भी देखता हूं कब तक रहती है
मायके में । दिनेश ने भी निश्चय कर लिया था कि अब वो उसे लेने नहीं जायेगा । उसे
आना होगा तो वो ख़ुद आ जायेगी ।
दिनेश ने तय कर लिया था कि
वो राधिका को लेने नहीं जायेगा और राधिका ने भी निश्चय कर लिया था कि वो ख़ुद से घर
नहीं जायेगी । मामला गम्भीर हो चला था । राधिका को मायके में रहते हुये एक हफ़्ता
बीत चुका था । मां और भाई से उस ने अभी तक कुछ नहीं बताया था । उसके घर वालों को
यह बात अखरती भी नहीं थी क्यूंकि अक्सर दिनेश आफ़िस के काम काज से शहर से बाहर जाता
रहता था और उस दौरान वो मां के घर ही रहा करती थी ।
राधिका ने मन ही मन सोच
लिया था कि जिस आदमी को उसकी ज़रूरत ही नहीं उसके साथ रहने का क्या फ़ायदा ? क्यूं न
दिनेश से तलाक़ ले लिया जाये । उधर दिनेश ने भी अपने मन को समझा लिया था और वो ख़ुद को
यह महसूस करवाने की कोशिश करने लगा था कि
वो पहले वाला कुंवारा दिनेश ही है । उसने आफ़िस के साथ साथ घर का काम भी सम्भाल
लिया था । खाना बनाने और कपडे धोने की आदत तो उसे पहले से ही थी क्यूंकि पढ़ाई और
फ़िर नौकरी के पांच साल तक वो अकेले ही कमरा किराये पर ले कर रहा करता था । राधिका
के ज़िन्दगी में आने के बाद ही उसे इन कामों से छुट्टी मिली थी । दिनेश ने सोच लिया
था कि वो वापिस अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौट आयेगा ।
सुबह सवेरे जब वो बाथरूम में नहाने के लिये
घुसता या फ़िर नाश्ता बनाने के लिये किचन में जाता या ड्राईंग रूम में बैठकर अख़बार
पढ़ता तो वहां मौजूद हर चीज़ उसे राधिका की याद दिलाती थी । साफ़ सुथरा चमकता हुआ
बाथरूम, चमाचम फ़र्श, क़रीने से रखे हुये सोफ़ा सैट जो राधिका ने ही अपनी पसन्द से
ख़रीदे थे, कांच की अलमारियों में सजे गुलदान, टेबल पर बिछा हुआ सुर्ख़ गुलाबों वाला
टेबल कवर, सिंगार मेज़ पर रखी हुई बिन्दिया, काजल और परफ़्यूम की खूबसूरत शीशी। घर
के जिस कोने में वो नज़र घुमाता, जिस चीज़ की जानिब निगाह उठाता मानो उससे सवाल करती
थी “दिनेश ! राधिका कब आयेगी ?”
ये अकेलापन उसे
अब काटने लगा था एक एक पल एक एक सदी के बराबर महसूस होता था इसलिये उसने घर को
होटल बना लिया था । वो सिर्फ़ देर रात सोने के लिये घर आता और सुबह जल्दी घर से
निकल जाता था । एक हफ़्ता और गुज़रने को था । किचन, बाथरूम, ड्राईंग रूम, बालकनी,
फ़र्श, टेबल, सोफ़ा ग़रज़ वो सभी चीज़ें जो कभी चमाचम रहा करती थीं अपनी चमक, अपना नूर
खो चुकीं थीं ।
राधिका दिन भर गुमसुम अपने
कमरे में अकेली पड़ी रहती थी । राधिका की मां को भी अब कुछ कुछ शक होने लगा था मगर
वो जब भी इस बारे में कुछ बात शुरु करती राधिका बड़ी सफ़ाई से उसे टाल जाती थी । हमेशा
की तरह आज भी राधिका अपने कमरे में अकेली, गुमसुम पड़ी थी । अचानक उसे बड़ी ज़ोर से
किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई । वो घबरा कर उठी और कमरे की खिड़की के एक पट को
हल्का सा खोल कर बाहर देखने लगी । सामने वाला कमरा उसके भाई राजेश का था । राजेश
कमरे में अलमारी के पास खड़ा था । अलमारी खुली हुई थी । पैरों के पास फ़र्श पर
नक़्क़ाशीदार पीतल के दो ख़ूबसूरत गिलास पडे हुये थे । राधिका समझ गई थी कि ये गिलास या
तो अलमारी खोलते हुये गिरे हैं या फिर भाई ने इन्हें झुंझलाहट में ज़मीन पर पटक
दिया है । उसके चेहरे पर झुंझलाहट और ग़ुस्से के वही भाव झलक रहे थे जो उस दिन
दिनेश के चेहरे से झलक रहे थे । अचानक उसकी भाभी रिया लगभग दौड़ते हुये राजेश के
कमरे दाख़िल हुई । उसके दोनों हाथ आटे से सने हुये थे शायद वो किचन में आटा गूंथ
रही थी और आवाज़ सुनकर हड़बड़ाहट में ऐसे ही कमरे की तरफ़ दौड़ पड़ी थी । रिया जैसे ही
कमरे में दाख़िल हुई राजेश उस पर झल्ला पड़ा । उसने झुंझलाते हुये रिया से कहा
“तुम्हें कितनी बार मना किया है कि मेरी रैक में कोई दूसरा सामान मत रखा करो ।
इसमें मेरी आफ़िस की फ़ाईलें रहती हैं । मगर तुम्हारी समझ में ही नहीं आता है । और
ये गिलास ! ये गिलास रखने की जगह है ?“
रिया ने ख़ामोशी से दोनों गिलासों
को उठाया और पास ही टेबल पर रख दिया । ये ख़ूबसूरत गिलास उसकी मां ने ख़ास उसके लिये
मुरादाबाद से मंगवाये थे । गिलासों को टेबल पर रखकर रिया फ़िर राजेश के सामने खड़ी
हो गई ।
राजेश ने एक फ़ाईल निकालते हुये पास खड़ी रिया को
सवालिया निगाहों से देखा । फ़िर दूसरी फ़ाईल निकालने लगा । रिया अभी भी वहीं खड़ी थी
। दूसरी फ़ाईल निकाल कर उसने पास खड़ी रिया को फ़िर देखा और झुंझला कर पूछा “ अब क्या
है ? यहां क्यूं खड़ी हो ?”
रिया ने राजेश के हाथ से फ़ाईल छीन कर बिस्तर पर फ़ैंक दी और अपनी दोनो बांहें
राजेश की गर्दन के इर्दगिर्द डालकर बड़ी
मासूमियत से कहनी लगी “ अच्छा साहिबे आलम अभी तक नाराज़ हैं ? चलिये नाचीज़ से ग़लती
हो गई । अब तो माफ़ कर दीजिये हुज़ूर । चलिये हम आपके कान पकड़ कर आपसे माफ़ी मांगते
हैं “ और ये कहकर उसने राजेश के दोनों कान, अपने आटे से सने हुये हाथों से कसकर
पकड़ लिये ।
“देखो रिया मेरा मूड ठीक नहीं है मुझे बहुत सारा काम करना है तुम समझती नहीं
हो……” राजेश का जुमला पूरा होता उससे पहले ही रिया ने अपना एक हाथ उसके होंठों पर
रख दिया और दूसरे हाथ से उसके गाल को सहलाते हुये कहने लगी “मैं सब समझती हूं
……………और जो नहीं समझती वो बाद में आराम से मुझे समझा देना । रही बात मूड की तो मूड
वूड की ऐसी तैसी …………… काम बाद में भी होता रहेगा । पहले पेट पूजा बाद में काम
दूजा । तुम यहां बैठो मैं अभी नाश्ता लेकर आई “ और राजेश के कान , गाल और पूरा
मुंह आटे से भर कर हंसते हुये तेज़ी से कमरे से निकल गई ।
रिया की बच्ची तू ने मेरा पूरा मुंह आटे से भर दिया तेरी तो ऐसी की तैसी राजेश
ने बड़बड़ाते हुये मुंह से आटा झाड़ा और रिया को पकड़ने के लिये तेज़ी से उसके पीछे दौड़
लगाई मगर रिया तब तक किचन में पहुंच चुकी थी । राजेश जैसे ही उसे पकड़ने के लिये
कमरे से निकला सामने से मां को आता देखकर वापिस कमरे में घुस गया ।
राधिका के चेहरे पर
मुस्कुराहट तैर गई उसने धीरे से खिड़की का पट बन्द कर दिया । राधिका ने अपना सूटकेस
तैयार किया और कपड़े तब्दील करके तेज़ी से कमरे से बाहर आ गई । मां और भाई ने जब
सुबह सुबह राधिका को जाने के लिये तैयार देखा तो भाई ने घबरा कर एक साथ कई सवाल कर
डाले “क्या हुआ राधिका ………अचानक………सब ठीक
तो है ?” राधिका ने भाई के गाल को सहलाते हुये मुस्कुरा कर कहा “हां हां सब ठीक है
राजेश !, दिनेश का फ़ोन आया था वो अभी घर लौटने वाले हैं इसलिये जा रही हूं ।“
“मगर नाश्ता तो करके जाईये भाभी “ किचन से निकलते हुये रिया ने इसरार किया ।
“नहीं रिया दिनेश थके हुये होंगे उन्हीं के साथ करूंगी नाश्ता” राधिका ने
मुस्कुराते हुये कहा ।
मां की आंखों में संतोष का भाव साफ़ नज़र आ रहा था । उसने प्यार से राधिका के सर
पर हाथ रखते हुये कहा “ठीक है मेरी बच्ची …। खुश रह सलामत रह ।“
“राधिका थोड़ी देर रुक मैं तुझे आफ़िस जाते हुये घर ड्राप कर दूंगा” राजेश ने अपने
बाल ठीक करते हुये कहा ।
“नहीं राजेश …मैं लेट हो जाउंगी” ये कहकर वो सूटकेस उठाये तेज़ी से घर से निकल
गई ।
सुबह के साढ़े आठ बजे थे ।
अचानक डोरबेल बजने लगी ।राजेश किचन में चाय बना रहा था । लगातार बज रही बेल को सुन
कर वो झल्ला गया और ग़ुस्से से दरवाज़ा खोलकर चिल्लाया “कौन है ?”
दरवाज़ा खुलते ही वो सन्न रह गया ।
सामने राधिका खड़ी थी । एक सैकेण्ड को उसे कुछ समझ नहीं आया । फ़िर अचानक राधिका
ने उसे अपनी बांहों में भींच लिया । दिनेश हतप्रभ था । वो जड़वत खड़ा था । राधिका की
आखों से गर्म गर्म लावा बह रहा था । इस गर्म लावे ने इतने दिनों की कड़वाहट, दर्द,
तकलीफ़, शिकवे, शिकायतें सब कुछ जला कर राख कर दिया था । जब राधिका की आंखों से
निकलने वाला गर्म लावा दिनेश के गालों तक पहुंचा तो मानो उसका अहसास जागा । दिनेश ने राधिका को अपनी बांहों के घेरे में ले
लिया । दिनेश की आंखों से शीतल जल की धारा बह निकली और बहते बहते राधिका के गालों
तक जा पहुंची । शीतल जल धारा ने लावे को ठ्ण्डा कर दिया था । सब कुछ शांत हो चला
था । आंसुओं में बहुत ताक़त होती है । ये बरसों की कड़वाहट और सदियों की अदावत को एक
पल में ख़्त्म कर देते हैं । बहुत देर तक दोनों इसी हालत में खड़े रहे बिल्कुल मौन
बिल्कुल नि:शब्द ! मौन का भी अपना अलग
प्रभाव है, अलग शक्ति है । कभी कभी ये शब्दों से भी अधिक प्रभावी महसूस होता है ।
जैसे आज महसूस हो रहा था दिनेश और राधिका को ।
दिनेश ने राधिका को ख़ुद से
अलग किया और हाथ पकड़ कर अन्दर लाया और उसे सोफ़े पर बिठाया । किचन से चाय लाकर
राधिका के हाथ में पकड़ाई और उसके क़रीब बैठ गया । राधिका ने ड्राईंग रूम पर नज़र
दौड़ाई । सब कुछ अव्यवस्थित था । उसने थोड़ा आगे झुककर किचन की तरफ़ नज़र घुमाई
…………किचन का हाल भी बुरा था । ढेरों बर्तन सिंक में पड़े थे । उसने दिनेश की तरफ़
सवालिया नज़रों से देखा । दिनेश की आंखों ने भी सवाल पढ़ लिया था । प्रत्युत्तर में
उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया “तुम्हारे बिना कुछ भी ठीक नहीं था राधिका …… कुछ भी
नहीं”
दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट तैर गई । निश्च्छ्ल, निष्कपट, निर्मल
मुस्कुराहट ……………
दिनेश ने राधिका के हाथों को अपने हाथों में लेते हुये कहा “ आई एम सारी
राधिका ………।“
राधिका ने दिनेश के हाथों को अपने गालों पर फ़ैरते हुये कहा “नहीं दिनेश
……………आई एम सारी”
कमरे में ख़ामोशी तैर गई………………और आंखों में आंसूं तैरने लगे ।
“चलो आज आफ़िस की छुट्टी
करते हैं और मिल कर इस कबाड़ख़ाने को वापिस एक घर बनाते हैं ।” यह कहते हुये दिनेश
खड़ा हो गया………………… चलो राधिका ………………और उसने राधिका का हाथ पकड़ उसे भी खड़ा कर दिया
।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें