संवादहीनता (21/04/18)
जितेन्द्र और राधा की ये अरेंन्जड मेरिज थी । शादी से पहले
वो न एक दूसरे को जानते थे और न ही कभी मिले थे । जितेन्द्र की बस एक यही ख्वाहिश
थी कि उसकी होने वाली पत्नी पढ़ी लिखी और कामकाजी महिला हो और उसकी माता ने उसकी
पसंद के मुताबिक ही राधा को उसका जीवन साथी बनाया था । शादी को एक वर्ष ही हुआ था
कि उसकी माता का देहान्त हो गया । अब घर में बस दो ही सदस्य थे एक राधा दूसरा
जितेन्द्र । शादी के एक साल बाद भी दोनों एक दूसरे को न समझ पाये थे । समझ पाना तो
दूर अभी एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे, न एक दूसरे की पसंद नापसंद, न एक
दूसरे की आदतें । वजह ? वजह साफ़ थी दोनों ही नौकरी पेशा थे । जितेंन्द्र जो सुबह 9
बजे दफ़्तर के लिये निकलता तो रात को 9 बजे तक ही लौट पाता था वहीं राधा भी 10 बजे
निकल कर 6 बजे तक लौटती थी और फिर दिनभर की थकन के साथ अगले दिन की फ़िक्र ने
उन्हें कभी मौका ही नहीं दिया, फ़ुर्सत के उस वक्त का जिसे अक्सर लोग अग्रेज़ी में अक्सर
“क्वालिटी टाईम” कहते हैं । यही वजह है कि वो पति पत्नी का रिश्ता निभा रहे थे
लेकिन उनमें इस रिश्ते की वो गर्माहट नहीं थी जो होनी चाहिये थी ।
माता के
देहान्त के बाद हालात बिगड़ने लगे क्योंकि माताजी घर पर रहतीं थी तो राधा के घर के
कामों में सहयोग करतीं थीं परन्तु अब घर के सारे कामों का बोझ भी राधा के कंधों पर
ही था । धीरे धीरे उसने जितेन्द्र से कहना शुरु किया कि जितेन्द्र आप भी घर के
कामों में थोड़ा हाथ बटाया कीजिये मुझसे अकेले सारे काम नहीं हो सकते । जितेन्द्र
की भी राधा से बहुत सी अपेक्षायें थीं मगर वो अपने मुंह से कुछ नहीं कहता था । ये
पुरुषों का स्वभाव होता है कि वो अपनी ख्वाहिशों का इज़हार शब्दों से नहीं करना
चाहते वो चाहते हैं कि उनका जीवन साथी उनके मन की बात को इशारों में समझे । मगर
इसके लिये एक दूसरे की परस्पर समझ और समय भी तो दरकार है जो दोनों के पास था ही
नहीं । इन बातों को लेकर दोनों में हल्की नोक झोंक होने लगी और जो थोड़ा बहुत
सामान्य रिश्ता था वो भी बिगड़ने लगा । कहते हैं बातचीत करने से बड़ी से बड़ी समस्या
भी हल हो जाती है मगर इन दोनों के केस में संवादहीनता ने कोढ़ में खाज का काम किया
। दोनों एक दूसरे के साथ रहते तो थे मगर अजनबियों की तरह ।
बहरहाल
दिल को बहलाने के लिये जितेंन्द्र ने फ़ेसबुक का सहारा लिया । उसने अपने निकनेम
“जाय” के नाम से फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल बनाई और आफ़िस में मिलने वाले खाली समय में फ़ेसबुक
से दिल बहलाने लगा । उसने अपनी प्रोफ़ाईल पिक्चर में अपने पसंदीदा एक्टर जितेन्द्र
की तस्वीर लगा रखी थी । फ़ेसबुक पर उसकी दोस्ती उसके ही शहर दिल्ली की रहने वाली
“निम्मी” से हो गई । निम्मी और जितेन्द्र की दोस्ती बढ़ने लगी । वक्त मिलते ही आफ़िस
में बैठकर दोनो चैट किया करते थे ।
निम्मी – जाय, तुम्हें कौन सा रग पसंद है ?
जाय - मुझे तो हल्का ब्लू कलर और वो भी ब्लू कलर का कुर्ता
पाजामा बहुत पसंद है । बेहतरीन रंग और कंफ़र्टेबल ड्रेस । क्या कहती हो ।
निम्मी – क्या बात है यार ! मुझे भी ब्लू कलर पसंद है । और
मर्दों पर कुर्ता पाजामा एकदम राजसी लगता है ।
जाय ने पूछा – अच्छा बताओ तुम्हें परफ़्यूम कौन सा पसंद है ?
लड़कों वाले या लड़कियों वाले ? अरे ! मज़ाक कर रहा था ।
निम्मी – मुझे परफ़्यूम की जगह गुलाब का इत्र पसंद है ।
जाय ने आश्चर्य से पूछा – क्या सचमुच ! मुझे भी यही पसंद है
। गुलाब की भीनी भीनी खुश्बु वाला इत्र ।
बस कब वक्त इन्हीं बातों में गुज़र जाता पता ही नहीं चलता ।
आफ़िस का लंच खत्म तो चैटिंग खत्म । फिर अगले दिन ही बात हो पाती थी और अगर आफ़िस
में काम ज्यादा होता था तो दो तीन दिन चैट नहीं हो पाती थी ।
इस अरसे मैं उन्होंने जाना कि दोनों की आदतें, हाबीज़, मिज़ाज
और पसंद –नापसंद में बहुत समानता थी ।
दोनो को ऐसा लगने लगता था कि जैसे वो दोनों एक दूसरे के
लिये ही बने हों ।
निम्मी इस बात से अन्जान थी कि जितेन्द्र शादीशुदा है । इस
बात की चर्चा भी कभी दोनों के बीच हुई नहीं थी । दिन गुज़रते गये दोनों की दोस्ती
प्रगाढ़ होती गई । जितेंन्द्र को लगने लगा शायद उसने शादी करने में जल्दबाज़ी कर दी
या फ़िर उसे सिर्फ़ मां के भरोसे पर शादी नहीं करनी चाहिये थी हालांकि वो जानता था
कि दुनिया में अगर कोई उसे सबसे अच्छी तरह से समझता है तो वो केवल मां ही है और
उसका चुनाव कभी ग़लत हो नहीं सकता । मगर अब क्या किया जा सकता था ।
निम्मी को ब्लैक काफ़ी बहुत पसंद थी और जितेन्द्र को भी । एक
दिन निम्मी ने जितेन्द्र को कनाट प्लेस के काफ़ी हाउस में मिलने की रिक्वेस्ट भेजी
। निम्मी ने लिखा “कल सण्डे है क्यों न हम दोनो अपनी पसंदीदा काफ़ी का एक साथ लुत्फ़
उठाने के लिये काफ़ी हाउस में मिलें”
जितेन्द्र ने पूछा – किस वक्त ?
निम्मी ने जवाब दिया – कल 11 बजे ?
जितेन्द्र ने लिखा – लेकिन अचानक ये प्रोग्राम क्यों ?
निम्मी ने जवाब दिया – अरे भाई 6 महीने से जिस अन्जान शख्स
से दिन भर बातें करती रहती हूं जिसकी सारी आदतें और हाबीज़ मेरी जैसी हैं उससे
मिलना और उसकी सूरत देखना तो बनता है न ? है कि न ?
जितेन्द्र कुछ पल के लिये कुछ जवाब न दे पाया ।
निम्मी ने वापिस लिखा – क्या बात जाय साहब ? कोई प्राब्लम है ?
जितेन्द्र एक सभ्य, ईमानदार और समझदार लड़का था और वो नहीं
चाहता था कि निम्मी किसी ग़लत फ़हमी का शिकार हो कर उससे कुछ ऐसी उम्मीदें बांध ले
जिसकी वजह से उनकी दोस्ती में दरार आये या निम्मी के दिल को ठेस पहुंचे इसलिये
उसने मुलाकात से पहले उसे सच बताने का फ़ैसला किया । अपने शादीशुदा होने का सच ।
एकबारगी तो उसे लगा कि कहीं ये सच जानकर निम्मी उससे नाराज़ न हो जाये लेकिन फिर
उसने हिम्मत करके जवाब लिखा – निम्मी क्या तुम ये जानती हो मैं एक शादीशुदा लड़का
हूं ?
निम्मी ने बड़े ताज्जुब और जोश के साथ जवाब लिखा – अरे
वाह ! तो जनाब इंगेज्ड हैं ! बड़ी
खुशकिस्मत लड़की होगी जो आपकी जीवनसंगिनी होगी ।
कुछ देर दोनो ओर शांति रही । फिर निम्मी का मैसेज आया – तो
फिर कल का क्या प्लान है ? आ रहे हो 11 बजे ।
जितेन्द्र की कुछ समझ नहीं आ रहा था । निम्मी का रिऐक्शन
उसे हैरान कर रहा था ।
निम्मी का फिर मैसेज आया – ओ माई डियर फ़्रैंड ! अगर मैडम का
डर सता रहा है तो उन्हें भी साथ लेकर आना । हम भी तो देखें हमारे बेस्ट फ़्रेंड की
ज़िन्दगी में कौन है ?
जितेन्द्र समझ चुका था कि निम्मी को ग़लत फ़हमी नहीं है, न ही
उसके दिल में कोई दूसरा ख्याल है वो उसे एक अच्छा दोस्त मानती है बस । जितेन्द्र
ने लिखा – ओके माई डियर फ़्रेंड कल आता हूं 11 बजे ।
कुछ देर बाद निम्मी का मैसेज फिर आया – टेबल नम्बर 21
अगले दिन सण्डे था और सण्डे को जितेन्द्र देर से ही उठता था
। खिड़की से आती तेज़ धूप ने जैसे ही उसके गालों को झुलसाया उसकी आंख खुल गई । उसकी
नज़र जैसे ही दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ़ पड़ी वो घबरा कर खड़ा हो गया और उसके मुंह से
बेसाख़्ता निकला – ओ माई गाड ! साढ़े दस बज गये ! वो तेज़ी से कमरे से बाहर निकला और
बाथरूम में घुस गया । बाथरूम से निकलते ही उसने बाई को आवाज़ लगाई । मोहिनी बाई ज़रा
एक कप चाय तो पिला दो । मोहिनी उसे बाथरूम में जाते देख ही चाय तैयार कर चुकी
इसलिये आवाज़ लगाते ही चाय के कप के साथ हाज़िर थी ।
राधा कहां है ? जितेन्द्र ने पुछा ।
वो किसी काम से बाहर गईं हैं । कहां गईं है मुझे नहीं पता
लेकिन आप रात देर से आये थे और थके हुये थे इसलिये आपको उठाया नहीं था और मुझसे भी
मना किया था कि साहब को न उठाना और कमरे की सफ़ाई तभी करना जब साहब उठ जायें ।
“अच्छा ठीक है ।” जितेन्द्र ने जवाब दिया और घर से कैफ़े के
लिये निकल पड़ा ।
आज ड्राईव करते हुये उसे बड़ा अजीब सा आनन्द आ रहा था । आज
वो हमेशा की तरह सुस्त, उखड़ा हुआ, परेशान और काम के बोझ का मारा हुआ नहीं था बल्कि
अलमस्त, जोशीला और खुद को बहुत हल्का फ़ुल्का महसूस कर रहा था । आज उसे ये रास्ता
बड़ा लम्बा महसूस हो रहा था । उसे फ़िक्र थी कि अगर वो वक्त पर न पहुंचा तो निम्मी
क्या सोचेगी । उसका दिल अनजाने ख्यालात और जज्बात से लबरेज़, सीने में बिल्लियों की
तरह अछल रहा था । खैर काफ़ी हाउस की पार्किंग में कार पार्क करके वो कैफ़े में दाखिल
हुआ । चारों ओर नज़र दौड़ाई तो उसे टेबल नम्बर 21 नज़र आ गई । वो टेबल के करीब पहुंचा
तो देखा टेबल पर किसी का हैंण्ड बैग रखा था लेकिन कुर्सी पर कोई नहीं था । उसने
दूसरी कुर्सी सरकाई और बड़ी शालीनता से बैठ गया और इन्तेज़ार करने लगा ।
एक ऐसे दोस्त को देखने और उससे मिलने की जिज्ञासा अब चरम पर
थी जो बिल्कुल उसके जैसी थी, जो उसी की तरह सोचती थी, उसी की तरह बिहेव करती थी
जिसकी आदतें, जिसकी रूचियां, जिसके सपने, जिसकी ख्वाहिशें सभी कुछ उसके जैसी ही
थीं । कभी कभी चैटिंग के दौरान उसे लगता था कि जैसे निम्मी और वो एक दूजे के लिये
बने हैं । मगर ये सच नहीं था । और वो दिल ही दिल में सोचता था काश ये सच होता !
वो अपने ख्यालों में गुम था कि सामने की कुर्सी पर कोई आकर
रुका और उसने अपने पर्स को उठाया और कुर्सी पर बैठने लगा । दोनों की नज़रें मिलीं
और हैरत से खुली रह गईं । दोनों के मुंह से एक साथ निकला – तुम यहां ?
जितेन्द्र ने देखा वो राधा थी और राधा ने देखा वो
जितेंन्द्र था ।
तुम यहां कैसे जितेन्द्र ?
राधा ने पूछा । जवाब सुनने से पहले ही उसने सवालों की बौछार कर दी थी -
और वो भी काफ़ी हाउस में ?
तुम्हें भी काफ़ी पसंद है
?
तुमने कभी बताया ही नहीं ?
और तुम ब्लू कुर्ते पाजामे में ?
और तुमने गुलाब का इत्र लगाया है ? वन आफ़ माई फ़ेवरेट
फ़्रेगरेंस ! वाव
राधा के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं था ।
राजेश ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसने भी राधा की जानिब
आश्चर्य से देखते हुये पूछा –
मगर तुम यहां कैसे ?
और फ़िर बिना रुके कई सवालात एक साथ कर डाले –
ब्लू साड़ी में ? तुम वाकई गार्जियस लग रही हो !
तुम्हारा इत्र भी तो गुलाब ही है ? हैं न ?
और अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो तुम भी इस टेबल नम्बर 21 पर
काफ़ी का आनन्द लेने आई हो ।
दोनों बहुत खुश थे क्योंकि घरेलू संवादहीनता ने जिस “मेड आफ़
ईच अदर कपल” के बीच गहरी दीवार खड़ी कर रखी थी उसे सोशल मीडिया ने ध्वस्त कर दिया
था ।
जितेन्द्र की आंखे नम हो गईं और दोनो हाथ बरबस अपनी मां की
दुआ के लिये उठ गये । उसे आज अपनी मां की याद बहुत सता रही थी ।
अकमल नईम अकमल
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