शुक्रवार, 24 जून 2016

URDU HAI JIS KA NAAM...........

उर्दू है जिसका नाम
पूरे मुल्क के साथ साथ राजस्थान के राजकीय विधालयों में प्रारम्भिक स्तर पर उर्दू भाषा का शिक्षण आज़ादी के बाद से ही किया जाता रहा है । मिडिल, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर भी छात्र छात्रायें वर्षों से इसका एच्छिक विषय के रूप में अध्ययन करते  रहे  हैं । पिछले दो वर्षों में, जब से राज्य में बीजेपी की सरकार आई है, न जाने क्यों उर्दू ज़बान उन की नज़र में खटकने लगी है बल्कि बात यही तक सीमित होती तो भी इतनी तकलीफ़ न होती अब तो राज्य के शिक्षामन्त्री जी उर्दू ज़बान को जड़मूल से उखाड़ फ़ेंकने को प्रतिबद्व प्रतीत होने लगे हैं और मुख्यमन्त्री महोदया जो समय समय पर उर्दू अशआर पढ़ने के लिये प्रसिद्व हैं , उनकी मौन सहमति इसमें स्पष्ट दिखाई दे रही है ।
          इस बात के स्पष्ट प्रमाण सर्वप्रथम उस समय देखने को मिले जब स्कूल शिक्षा की नवीन पाठयपुस्तकें छप कर आईं । इन पुस्तकों से तमाम मुस्लिम लेखकों के पाठ और कविताओं आदि का विलोपन ही नहीं किया गया बल्कि ऐसे हिन्दु विद्वानों की पाठय सामग्री पर भी वज्रपात किया गया जिन्होने अपनी कविताओं, कहानियों या आलेखों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किया था । इसके बाद आरपीएससी परीक्षा पास कर, चयनित उर्दू शिक्षको की पोस्टिंग जानबूझ कर रोकने की कोशिश की गई, सेकेण्ड ग्रेड भर्ती में उर्दू के पद 300 से घटाकर 29 कर दिये गये, उर्दू डीपीसी में चयनित अध्यापको को दूरस्थ स्थानो पर लगाया गया यहां तक कि शहर में पद रिक्त होते हुये भी महिला अभ्यार्थियों को 200 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षैत्रों में पदस्थापित किया गया और उनकी परिवेदना तक नही ली गई जिसकी वजह से उन्हे पदौन्नत्ति परित्याग करना पड़ा । जोधपुर ज़िले के लगभग समस्त पदौन्नत उर्दू शिक्षको को पदौन्नति का परित्याग करना पड़ा । और अब हद तो तब हो गई जब शिक्षामन्त्री ने प्राथमिक स्तर पर उर्दू को पूरी तरह से बन्द करने की घोषणा कर दी है तथा उर्दू के स्वीकत पदों को समाप्त कर दिया है साथ ही उर्दू अध्यापको का जबरन नियमविरुद्व विषय परिवर्तन कर उन्हे दूसरे विषयों का अध्यापन कराने के लिये बाध्य किया जा रहे है । ऐसा ही मामला इससे पूर्व प्रकाश में आया था जब कोटा बूंदी के उर्दू अध्यापाको के स्थानान्तरण, सस्कत के पदों पर कर दिये गये थे । ये समस्त तथ्य इस बात कि और इगिंत कर रहे हैं कि शिक्षामत्री और राज्य की सरकार लोक कल्याणकारी न होकर अल्पसंख्यक विरोधी सरकार की भांति कार्य कर रही है जो कि न सिर्फ़ इस देश के सविधान की आत्मा के विरुद्व है बल्कि अलौकतांत्रिक है ।    
शिक्षामंत्री जी को शायद ग़लतफ़हमी हो गई है कि उर्दू मुसलमानो की भाषा है या मुसलमान इसे कहीं विदेश से हिन्दुस्तान में लेकर आये हैं । उन्हें शायद याद नहीं रहा कि ये इसी देश की बेटी है और इसी देश का गौरव भी । वो शायद ये भूल गये है कि इस देश की आज़ादी में जिस भाषा का और में कहूंगा सिर्फ़ और सिर्फ़ जिस भाषा का योगदान है वो उर्दू ही है । जन्गे आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के विरोध का तमामतर दारोमदार इसी ज़बान पर था सारे अख़बार, पम्फ़लेट, ख़तो-किताबत और इन्कलाब ज़िन्दाबाद जैसे नारे इसी जबान में थे । वीर क्रान्तिकारी चाहे शहीदे आज़म भगत सिंह हों या शहीद बिस्मिल इसी ज़बान में अपना संदेश देते हुये इस दुनिया से रुख्सत हुये ।
          सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
          देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
ये उर्दू ही है जनाब, और हमारी राज्य की मुखिया जो “ हौसलों की उड़ान” भरती हैं वो भी उर्दू ही है जनाब ।
          आप शायद ये भी भूल रहे है कि उर्दू वाले जिन्हे अपना पहला अफ़साना निगार मानते हैं वो मुसलमान नही हैं जी उनका नाम है मुंशी प्रेमचंद । और किरशन चन्द्र का भी तो आपने नाम सुना होगा । और राजस्थान के शीन काफ़ निज़ाम से भी तो आप वाकिफ़ होगें जिन्हे सारी इज्जत और शोहरत उर्दू और उर्दू वालों से ही मिली । सम्पूर्ण सिंह कालरा, शायद ही कोई इन्हे इस नाम से जानता होगा । जी हां में बात कर रहा हूं गुलज़ार साहब की । गुलज़ार, कौन नहीं जानता ये नाम । और फ़िल्म इण्डस्ट्री की सारी तथाकथित हिन्दी फ़िल्में जिनमे सारे डायलाग और सारे गाने उर्दू में ही होते हैं । जनाब कहां कहां से मिटाओगे इस देश की बेटी को ?  अगर उर्दू को मिटाना ही आपका उद्देशय है तो फ़िर आप याद रखें आप के इन इकदामात से उर्दू मिटेगी तो नहीं बल्कि उसमें एक नई ज़िन्दगी, नई रूह ज़रूर पैदा हो जायेगी और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है जो पूरे राजस्थान में देखी जा सकती है । इस लिहाज़ से उर्दू वाले आप के हमेशा मशकूर रहेंगे कि आप के इन इकदामात की बदौलत उर्दू वाले न सिर्फ़ मुत्तहिद होने लगे हैं बल्कि इस ज़बान की शौहरत में और इज़ाफ़ा हो रहा है । रही बात इसे मिटाने की तो जो ज़बान लोगों के दिलों में बसती है उसे मिटाना तो दूर उसका बाल भी बांका करना किसी के बस में नहीं । 
         
                    उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़
                   सारे जहां में  धूम  हमारी ज़बा की  है
          यहां कुछ तथ्यात्मक बिन्दुओं की ओर भी नज़र डालनी ज़रुरी है जो इस राज्य की शिक्षण व्यवस्था के सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
गुजराल कमेटी की रिपोर्ट और शिक्षाविदों की राय स्पष्ट रूप से कहती है कि बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा उनकी मादरी ज़बान में ही दी जानी चाहिये, साथ ही संविधान के विभिन्न अनुच्छेद विशेष रूप से अनुच्छेद 350 ए में भी इसकी स्पष्ट विवेचना की गई है यही वजह है कि देश भर के अलपसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों के राजकीय विधालयों में प्राथमिक स्तर पर उर्दू भाषा के माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था की गई है । राजस्थान में भी उर्दू माध्यम के रूप में और उर्दू तीसरी भाषा के रूप में दशकों से पढ़ाई जाती रही है । यही वजह है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में जो कि शिक्षा की ऐतबार से अत्यंत पिछड़ा है शिक्षा के प्रति जागरुकता आई है । उर्दू शिक्षण के कारण  –
1-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान राजकीय विधालयों की प्रति बढ़ा है ।
2-     विधालय से वंचित बालक बालिकाओं (जिनमे सर्वाधिक प्रतिशत अलपसंख्यक और एससी, एसटी ब्च्चों का है) में अल्पसंख्यक समुदाय के बालक बालिका का प्रवेश दर में इज़ाफ़ा हुआ है।
3-       अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे जो कि सर्वाधिक संख्या में ड्रापआउट होते थे और शिक्षाविभाग की सबसे बड़ी समस्या थे, इसमें कमी आई है ।
4-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान सदैव मदरसा शिक्षा की ओर रहा है जिसकी मुख्य वजह मदरसों में उर्दू माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था है परन्तु राजकीय विधालयों में उर्दू खुलने से उनका रुझान इन विधालयों की तरफ़ बढ़ा है कयोकि मदरसे की अपेक्षा बच्चा यहां दूसरे विषयों का अध्ययन भी कर पाता है ।
5-     वर्तमान में राजकीय विधालयों में अध्ययनरत बच्चों में अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं का प्रतिशत अधिक है इसका मुख्य कारण विधालय में उर्दू अध्यापक का नियुक्त होना है । अपने समुदाय या अपनी मातभाषा का अध्यापक नियुक्त होने से अभिभावकों और छात्राओं को एक प्रकार का मानसिक सम्बल प्राप्त होता है और वो विधालय के महौल के साथ तारतम्य आसानी से बिठा पाते हैं साथ ही उन्हें भरोसा रहता  है । जिस कारण वो बच्चियों को विधालय भेजने का साहस कर पाते हैं । 
                    यदि प्राथमिक विधालयो से उर्दू समाप्त की जाती है तो ये कदम न केवल असंवैधानिक होगा जिसको कोर्ट में चेलेन्ज किया जा सकता है बल्कि अलौकतांत्रिक और राज्य सरकार के लिये अलौकप्रिय भी साबित होगा । परन्तु इसका सब से बड़ा दुष्प्रभाव राज्य की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ेगा । इस कदम से न केवल बड़ी संख्या में बालक बालिकाओं का ड्राप आउट होगा बल्कि जदीद तालीम छोड़कर बच्चे पुन: मदरसों का रुख कर लेंगे । बालिका शिक्षा के लिये तो ये कदम बड़ा घातक सिद्व होने वाला है । इसके अतिरिक्त अल्पसख्यक और पिछ्ड़े समुदाय के लिये ये रोज़गार का एक बड़ा ज़रिया साबित हुआ था जिसके कारण इन तबकों में शिक्षा की अलख जगी थी उस पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे । सार ये है कि ये फ़ैसला किसी भी प्रकार से समुदाय, राज्य या पार्टी के हित में नहीं है । इससे केवल अहित होगा । सब का अहित । अत: इस सम्बन्ध में सभी पक्षों को पुन: गम्भीरता से विचार करना चाहिये ।
                                                                                                अकमल नईम
                                                                                      जी सैक्टर, प्रताप नगर, जोधपुर  
                                                                                      मो0     9413844624

      

उर्दू है जिसका नाम

उर्दू है जिसका नाम
पूरे मुल्क के साथ साथ राजस्थान के राजकीय विधालयों में प्रारम्भिक स्तर पर उर्दू भाषा का शिक्षण आज़ादी के बाद से ही किया जाता रहा है । मिडिल, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर भी छात्र छात्रायें वर्षों से इसका एच्छिक विषय के रूप में अध्ययन करते  रहे  हैं । पिछले दो वर्षों में, जब से राज्य में बीजेपी की सरकार आई है, न जाने क्यों उर्दू ज़बान उन की नज़र में खटकने लगी है बल्कि बात यही तक सीमित होती तो भी इतनी तकलीफ़ न होती अब तो राज्य के शिक्षामन्त्री जी उर्दू ज़बान को जड़मूल से उखाड़ फ़ेंकने को प्रतिबद्व प्रतीत होने लगे हैं और मुख्यमन्त्री महोदया जो समय समय पर उर्दू अशआर पढ़ने के लिये प्रसिद्व हैं , उनकी मौन सहमति इसमें स्पष्ट दिखाई दे रही है ।
          इस बात के स्पष्ट प्रमाण सर्वप्रथम उस समय देखने को मिले जब स्कूल शिक्षा की नवीन पाठयपुस्तकें छप कर आईं । इन पुस्तकों से तमाम मुस्लिम लेखकों के पाठ और कविताओं आदि का विलोपन ही नहीं किया गया बल्कि ऐसे हिन्दु विद्वानों की पाठय सामग्री पर भी वज्रपात किया गया जिन्होने अपनी कविताओं, कहानियों या आलेखों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किया था । इसके बाद आरपीएससी परीक्षा पास कर, चयनित उर्दू शिक्षको की पोस्टिंग जानबूझ कर रोकने की कोशिश की गई, सेकेण्ड ग्रेड भर्ती में उर्दू के पद 300 से घटाकर 29 कर दिये गये, उर्दू डीपीसी में चयनित अध्यापको को दूरस्थ स्थानो पर लगाया गया यहां तक कि शहर में पद रिक्त होते हुये भी महिला अभ्यार्थियों को 200 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षैत्रों में पदस्थापित किया गया और उनकी परिवेदना तक नही ली गई जिसकी वजह से उन्हे पदौन्नत्ति परित्याग करना पड़ा । जोधपुर ज़िले के लगभग समस्त पदौन्नत उर्दू शिक्षको को पदौन्नति का परित्याग करना पड़ा । और अब हद तो तब हो गई जब शिक्षामन्त्री ने प्राथमिक स्तर पर उर्दू को पूरी तरह से बन्द करने की घोषणा कर दी है तथा उर्दू के स्वीकत पदों को समाप्त कर दिया है साथ ही उर्दू अध्यापको का जबरन नियमविरुद्व विषय परिवर्तन कर उन्हे दूसरे विषयों का अध्यापन कराने के लिये बाध्य किया जा रहे है । ऐसा ही मामला इससे पूर्व प्रकाश में आया था जब कोटा बूंदी के उर्दू अध्यापाको के स्थानान्तरण, सस्कत के पदों पर कर दिये गये थे । ये समस्त तथ्य इस बात कि और इगिंत कर रहे हैं कि शिक्षामत्री और राज्य की सरकार लोक कल्याणकारी न होकर अल्पसंख्यक विरोधी सरकार की भांति कार्य कर रही है जो कि न सिर्फ़ इस देश के सविधान की आत्मा के विरुद्व है बल्कि अलौकतांत्रिक है ।    
शिक्षामंत्री जी को शायद ग़लतफ़हमी हो गई है कि उर्दू मुसलमानो की भाषा है या मुसलमान इसे कहीं विदेश से हिन्दुस्तान में लेकर आये हैं । उन्हें शायद याद नहीं रहा कि ये इसी देश की बेटी है और इसी देश का गौरव भी । वो शायद ये भूल गये है कि इस देश की आज़ादी में जिस भाषा का और में कहूंगा सिर्फ़ और सिर्फ़ जिस भाषा का योगदान है वो उर्दू ही है । जन्गे आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के विरोध का तमामतर दारोमदार इसी ज़बान पर था सारे अख़बार, पम्फ़लेट, ख़तो-किताबत और इन्कलाब ज़िन्दाबाद जैसे नारे इसी जबान में थे । वीर क्रान्तिकारी चाहे शहीदे आज़म भगत सिंह हों या शहीद बिस्मिल इसी ज़बान में अपना संदेश देते हुये इस दुनिया से रुख्सत हुये ।
          सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
          देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
ये उर्दू ही है जनाब, और हमारी राज्य की मुखिया जो “ हौसलों की उड़ान” भरती हैं वो भी उर्दू ही है जनाब ।
          आप शायद ये भी भूल रहे है कि उर्दू वाले जिन्हे अपना पहला अफ़साना निगार मानते हैं वो मुसलमान नही हैं जी उनका नाम है मुंशी प्रेमचंद । और किरशन चन्द्र का भी तो आपने नाम सुना होगा । और राजस्थान के शीन काफ़ निज़ाम से भी तो आप वाकिफ़ होगें जिन्हे सारी इज्जत और शोहरत उर्दू और उर्दू वालों से ही मिली । सम्पूर्ण सिंह कालरा, शायद ही कोई इन्हे इस नाम से जानता होगा । जी हां में बात कर रहा हूं गुलज़ार साहब की । गुलज़ार, कौन नहीं जानता ये नाम । और फ़िल्म इण्डस्ट्री की सारी तथाकथित हिन्दी फ़िल्में जिनमे सारे डायलाग और सारे गाने उर्दू में ही होते हैं । जनाब कहां कहां से मिटाओगे इस देश की बेटी को ?  अगर उर्दू को मिटाना ही आपका उद्देशय है तो फ़िर आप याद रखें आप के इन इकदामात से उर्दू मिटेगी तो नहीं बल्कि उसमें एक नई ज़िन्दगी, नई रूह ज़रूर पैदा हो जायेगी और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है जो पूरे राजस्थान में देखी जा सकती है । इस लिहाज़ से उर्दू वाले आप के हमेशा मशकूर रहेंगे कि आप के इन इकदामात की बदौलत उर्दू वाले न सिर्फ़ मुत्तहिद होने लगे हैं बल्कि इस ज़बान की शौहरत में और इज़ाफ़ा हो रहा है । रही बात इसे मिटाने की तो जो ज़बान लोगों के दिलों में बसती है उसे मिटाना तो दूर उसका बाल भी बांका करना किसी के बस में नहीं । 
         
                    उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़
                   सारे जहां में  धूम  हमारी ज़बा की  है
          यहां कुछ तथ्यात्मक बिन्दुओं की ओर भी नज़र डालनी ज़रुरी है जो इस राज्य की शिक्षण व्यवस्था के सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
गुजराल कमेटी की रिपोर्ट और शिक्षाविदों की राय स्पष्ट रूप से कहती है कि बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा उनकी मादरी ज़बान में ही दी जानी चाहिये, साथ ही संविधान के विभिन्न अनुच्छेद विशेष रूप से अनुच्छेद 350 ए में भी इसकी स्पष्ट विवेचना की गई है यही वजह है कि देश भर के अलपसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों के राजकीय विधालयों में प्राथमिक स्तर पर उर्दू भाषा के माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था की गई है । राजस्थान में भी उर्दू माध्यम के रूप में और उर्दू तीसरी भाषा के रूप में दशकों से पढ़ाई जाती रही है । यही वजह है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में जो कि शिक्षा की ऐतबार से अत्यंत पिछड़ा है शिक्षा के प्रति जागरुकता आई है । उर्दू शिक्षण के कारण  –
1-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान राजकीय विधालयों की प्रति बढ़ा है ।
2-     विधालय से वंचित बालक बालिकाओं (जिनमे सर्वाधिक प्रतिशत अलपसंख्यक और एससी, एसटी ब्च्चों का है) में अल्पसंख्यक समुदाय के बालक बालिका का प्रवेश दर में इज़ाफ़ा हुआ है।
3-       अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे जो कि सर्वाधिक संख्या में ड्रापआउट होते थे और शिक्षाविभाग की सबसे बड़ी समस्या थे, इसमें कमी आई है ।
4-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान सदैव मदरसा शिक्षा की ओर रहा है जिसकी मुख्य वजह मदरसों में उर्दू माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था है परन्तु राजकीय विधालयों में उर्दू खुलने से उनका रुझान इन विधालयों की तरफ़ बढ़ा है कयोकि मदरसे की अपेक्षा बच्चा यहां दूसरे विषयों का अध्ययन भी कर पाता है ।
5-     वर्तमान में राजकीय विधालयों में अध्ययनरत बच्चों में अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं का प्रतिशत अधिक है इसका मुख्य कारण विधालय में उर्दू अध्यापक का नियुक्त होना है । अपने समुदाय या अपनी मातभाषा का अध्यापक नियुक्त होने से अभिभावकों और छात्राओं को एक प्रकार का मानसिक सम्बल प्राप्त होता है और वो विधालय के महौल के साथ तारतम्य आसानी से बिठा पाते हैं साथ ही उन्हें भरोसा रहता  है । जिस कारण वो बच्चियों को विधालय भेजने का साहस कर पाते हैं । 
                    यदि प्राथमिक विधालयो से उर्दू समाप्त की जाती है तो ये कदम न केवल असंवैधानिक होगा जिसको कोर्ट में चेलेन्ज किया जा सकता है बल्कि अलौकतांत्रिक और राज्य सरकार के लिये अलौकप्रिय भी साबित होगा । परन्तु इसका सब से बड़ा दुष्प्रभाव राज्य की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ेगा । इस कदम से न केवल बड़ी संख्या में बालक बालिकाओं का ड्राप आउट होगा बल्कि जदीद तालीम छोड़कर बच्चे पुन: मदरसों का रुख कर लेंगे । बालिका शिक्षा के लिये तो ये कदम बड़ा घातक सिद्व होने वाला है । इसके अतिरिक्त अल्पसख्यक और पिछ्ड़े समुदाय के लिये ये रोज़गार का एक बड़ा ज़रिया साबित हुआ था जिसके कारण इन तबकों में शिक्षा की अलख जगी थी उस पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे । सार ये है कि ये फ़ैसला किसी भी प्रकार से समुदाय, राज्य या पार्टी के हित में नहीं है । इससे केवल अहित होगा । सब का अहित । अत: इस सम्बन्ध में सभी पक्षों को पुन: गम्भीरता से विचार करना चाहिये ।
                                                                                                अकमल नईम
                                                                                      जी सैक्टर, प्रताप नगर, जोधपुर  
                                                                                      मो0     9413844624

      

उर्दू है जिसका नाम

उर्दू है जिसका नाम
पूरे मुल्क के साथ साथ राजस्थान के राजकीय विधालयों में प्रारम्भिक स्तर पर उर्दू भाषा का शिक्षण आज़ादी के बाद से ही किया जाता रहा है । मिडिल, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर भी छात्र छात्रायें वर्षों से इसका एच्छिक विषय के रूप में अध्ययन करते  रहे  हैं । पिछले दो वर्षों में, जब से राज्य में बीजेपी की सरकार आई है, न जाने क्यों उर्दू ज़बान उन की नज़र में खटकने लगी है बल्कि बात यही तक सीमित होती तो भी इतनी तकलीफ़ न होती अब तो राज्य के शिक्षामन्त्री जी उर्दू ज़बान को जड़मूल से उखाड़ फ़ेंकने को प्रतिबद्व प्रतीत होने लगे हैं और मुख्यमन्त्री महोदया जो समय समय पर उर्दू अशआर पढ़ने के लिये प्रसिद्व हैं , उनकी मौन सहमति इसमें स्पष्ट दिखाई दे रही है ।
          इस बात के स्पष्ट प्रमाण सर्वप्रथम उस समय देखने को मिले जब स्कूल शिक्षा की नवीन पाठयपुस्तकें छप कर आईं । इन पुस्तकों से तमाम मुस्लिम लेखकों के पाठ और कविताओं आदि का विलोपन ही नहीं किया गया बल्कि ऐसे हिन्दु विद्वानों की पाठय सामग्री पर भी वज्रपात किया गया जिन्होने अपनी कविताओं, कहानियों या आलेखों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किया था । इसके बाद आरपीएससी परीक्षा पास कर, चयनित उर्दू शिक्षको की पोस्टिंग जानबूझ कर रोकने की कोशिश की गई, सेकेण्ड ग्रेड भर्ती में उर्दू के पद 300 से घटाकर 29 कर दिये गये, उर्दू डीपीसी में चयनित अध्यापको को दूरस्थ स्थानो पर लगाया गया यहां तक कि शहर में पद रिक्त होते हुये भी महिला अभ्यार्थियों को 200 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षैत्रों में पदस्थापित किया गया और उनकी परिवेदना तक नही ली गई जिसकी वजह से उन्हे पदौन्नत्ति परित्याग करना पड़ा । जोधपुर ज़िले के लगभग समस्त पदौन्नत उर्दू शिक्षको को पदौन्नति का परित्याग करना पड़ा । और अब हद तो तब हो गई जब शिक्षामन्त्री ने प्राथमिक स्तर पर उर्दू को पूरी तरह से बन्द करने की घोषणा कर दी है तथा उर्दू के स्वीकत पदों को समाप्त कर दिया है साथ ही उर्दू अध्यापको का जबरन नियमविरुद्व विषय परिवर्तन कर उन्हे दूसरे विषयों का अध्यापन कराने के लिये बाध्य किया जा रहे है । ऐसा ही मामला इससे पूर्व प्रकाश में आया था जब कोटा बूंदी के उर्दू अध्यापाको के स्थानान्तरण, सस्कत के पदों पर कर दिये गये थे । ये समस्त तथ्य इस बात कि और इगिंत कर रहे हैं कि शिक्षामत्री और राज्य की सरकार लोक कल्याणकारी न होकर अल्पसंख्यक विरोधी सरकार की भांति कार्य कर रही है जो कि न सिर्फ़ इस देश के सविधान की आत्मा के विरुद्व है बल्कि अलौकतांत्रिक है ।    
शिक्षामंत्री जी को शायद ग़लतफ़हमी हो गई है कि उर्दू मुसलमानो की भाषा है या मुसलमान इसे कहीं विदेश से हिन्दुस्तान में लेकर आये हैं । उन्हें शायद याद नहीं रहा कि ये इसी देश की बेटी है और इसी देश का गौरव भी । वो शायद ये भूल गये है कि इस देश की आज़ादी में जिस भाषा का और में कहूंगा सिर्फ़ और सिर्फ़ जिस भाषा का योगदान है वो उर्दू ही है । जन्गे आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के विरोध का तमामतर दारोमदार इसी ज़बान पर था सारे अख़बार, पम्फ़लेट, ख़तो-किताबत और इन्कलाब ज़िन्दाबाद जैसे नारे इसी जबान में थे । वीर क्रान्तिकारी चाहे शहीदे आज़म भगत सिंह हों या शहीद बिस्मिल इसी ज़बान में अपना संदेश देते हुये इस दुनिया से रुख्सत हुये ।
          सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
          देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
ये उर्दू ही है जनाब, और हमारी राज्य की मुखिया जो “ हौसलों की उड़ान” भरती हैं वो भी उर्दू ही है जनाब ।
          आप शायद ये भी भूल रहे है कि उर्दू वाले जिन्हे अपना पहला अफ़साना निगार मानते हैं वो मुसलमान नही हैं जी उनका नाम है मुंशी प्रेमचंद । और किरशन चन्द्र का भी तो आपने नाम सुना होगा । और राजस्थान के शीन काफ़ निज़ाम से भी तो आप वाकिफ़ होगें जिन्हे सारी इज्जत और शोहरत उर्दू और उर्दू वालों से ही मिली । सम्पूर्ण सिंह कालरा, शायद ही कोई इन्हे इस नाम से जानता होगा । जी हां में बात कर रहा हूं गुलज़ार साहब की । गुलज़ार, कौन नहीं जानता ये नाम । और फ़िल्म इण्डस्ट्री की सारी तथाकथित हिन्दी फ़िल्में जिनमे सारे डायलाग और सारे गाने उर्दू में ही होते हैं । जनाब कहां कहां से मिटाओगे इस देश की बेटी को ?  अगर उर्दू को मिटाना ही आपका उद्देशय है तो फ़िर आप याद रखें आप के इन इकदामात से उर्दू मिटेगी तो नहीं बल्कि उसमें एक नई ज़िन्दगी, नई रूह ज़रूर पैदा हो जायेगी और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है जो पूरे राजस्थान में देखी जा सकती है । इस लिहाज़ से उर्दू वाले आप के हमेशा मशकूर रहेंगे कि आप के इन इकदामात की बदौलत उर्दू वाले न सिर्फ़ मुत्तहिद होने लगे हैं बल्कि इस ज़बान की शौहरत में और इज़ाफ़ा हो रहा है । रही बात इसे मिटाने की तो जो ज़बान लोगों के दिलों में बसती है उसे मिटाना तो दूर उसका बाल भी बांका करना किसी के बस में नहीं । 
         
                    उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़
                   सारे जहां में  धूम  हमारी ज़बा की  है
          यहां कुछ तथ्यात्मक बिन्दुओं की ओर भी नज़र डालनी ज़रुरी है जो इस राज्य की शिक्षण व्यवस्था के सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
गुजराल कमेटी की रिपोर्ट और शिक्षाविदों की राय स्पष्ट रूप से कहती है कि बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा उनकी मादरी ज़बान में ही दी जानी चाहिये, साथ ही संविधान के विभिन्न अनुच्छेद विशेष रूप से अनुच्छेद 350 ए में भी इसकी स्पष्ट विवेचना की गई है यही वजह है कि देश भर के अलपसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों के राजकीय विधालयों में प्राथमिक स्तर पर उर्दू भाषा के माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था की गई है । राजस्थान में भी उर्दू माध्यम के रूप में और उर्दू तीसरी भाषा के रूप में दशकों से पढ़ाई जाती रही है । यही वजह है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में जो कि शिक्षा की ऐतबार से अत्यंत पिछड़ा है शिक्षा के प्रति जागरुकता आई है । उर्दू शिक्षण के कारण  –
1-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान राजकीय विधालयों की प्रति बढ़ा है ।
2-     विधालय से वंचित बालक बालिकाओं (जिनमे सर्वाधिक प्रतिशत अलपसंख्यक और एससी, एसटी ब्च्चों का है) में अल्पसंख्यक समुदाय के बालक बालिका का प्रवेश दर में इज़ाफ़ा हुआ है।
3-       अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे जो कि सर्वाधिक संख्या में ड्रापआउट होते थे और शिक्षाविभाग की सबसे बड़ी समस्या थे, इसमें कमी आई है ।
4-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान सदैव मदरसा शिक्षा की ओर रहा है जिसकी मुख्य वजह मदरसों में उर्दू माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था है परन्तु राजकीय विधालयों में उर्दू खुलने से उनका रुझान इन विधालयों की तरफ़ बढ़ा है कयोकि मदरसे की अपेक्षा बच्चा यहां दूसरे विषयों का अध्ययन भी कर पाता है ।
5-     वर्तमान में राजकीय विधालयों में अध्ययनरत बच्चों में अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं का प्रतिशत अधिक है इसका मुख्य कारण विधालय में उर्दू अध्यापक का नियुक्त होना है । अपने समुदाय या अपनी मातभाषा का अध्यापक नियुक्त होने से अभिभावकों और छात्राओं को एक प्रकार का मानसिक सम्बल प्राप्त होता है और वो विधालय के महौल के साथ तारतम्य आसानी से बिठा पाते हैं साथ ही उन्हें भरोसा रहता  है । जिस कारण वो बच्चियों को विधालय भेजने का साहस कर पाते हैं । 
                    यदि प्राथमिक विधालयो से उर्दू समाप्त की जाती है तो ये कदम न केवल असंवैधानिक होगा जिसको कोर्ट में चेलेन्ज किया जा सकता है बल्कि अलौकतांत्रिक और राज्य सरकार के लिये अलौकप्रिय भी साबित होगा । परन्तु इसका सब से बड़ा दुष्प्रभाव राज्य की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ेगा । इस कदम से न केवल बड़ी संख्या में बालक बालिकाओं का ड्राप आउट होगा बल्कि जदीद तालीम छोड़कर बच्चे पुन: मदरसों का रुख कर लेंगे । बालिका शिक्षा के लिये तो ये कदम बड़ा घातक सिद्व होने वाला है । इसके अतिरिक्त अल्पसख्यक और पिछ्ड़े समुदाय के लिये ये रोज़गार का एक बड़ा ज़रिया साबित हुआ था जिसके कारण इन तबकों में शिक्षा की अलख जगी थी उस पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे । सार ये है कि ये फ़ैसला किसी भी प्रकार से समुदाय, राज्य या पार्टी के हित में नहीं है । इससे केवल अहित होगा । सब का अहित । अत: इस सम्बन्ध में सभी पक्षों को पुन: गम्भीरता से विचार करना चाहिये ।
                                                                                                अकमल नईम
                                                                                      जी सैक्टर, प्रताप नगर, जोधपुर  
                                                                                      मो0     9413844624

      

सोमवार, 13 जून 2016

” नहीं सर! वह हिंदू है। उसे प्यास लगी है। मेरा “रोज़ा” चल रहा है”


” नहीं सर! वह हिंदू है। उसे प्यास लगी है। मेरा “रोज़ा” चल रहा है”

दसवीं मंजिल पर कमरे की खिड़की से अपनी बेटी को बाहर की दुनिया दिखा रहा था। अचानक एक नौजवान  रस्सी से लटका हुआ खिड़की पर आ गया। पानी चाहिए। इतनी ऊंचाई पर निडर होकर वह उन दीवारों को रंग रहा था जिसके रंगीन होने का सुख शायद ही उसे मिले। मेरी बेटी तो बहुत खुश हो गई कि कोई दीवार से खिड़की पर लटक कर बात कर रहा है। डर नहीं लगता है, यह मेरा पहला सवाल था। दीवार पर रंग का एक कोट चढ़ाकर कहता है – नहीं। डर क्यों।
क्या नाम है। कामरान।
फिर कामरान से बात होने लगती है। बिहार के अररिया जिले का रहने वाला है। छह महीने पहले दिल्ली कमाने आया है। दो दिनों तक बैठकर देखता रहा कि कोई कैसे खुद को रस्सी से बांध कर लकड़ी की पटरी पर बैठकर इतनी ऊंचाई पर अकेला रंग रहा होता है। तीसरे दिन से कामरान खुद यह काम करने लगता है।
ramda
मैंने पूछा ” कोई प्रशिक्षण हुई है तुम्हारी। ‘
” नहीं! बस देख कर सीख लिया। ”
तो किसी ने कुछ नहीं बताया कि क्या सावधानी बरतनी चाहिए।
” नहीं। ”!
” तो तुम्हें डर नहीं लगता है नीचे देखने में। ”
नहीं लगता।
इससे पहले कितनी मंजिल इमारत का रंग और चमक किया है तुमने;
।37 मंज़िल।
मैं सोचने लगा कि जहां कामरान का बचपन बीता होगा वहाँ उस ने इतनी ऊँची इमारत कभी देखि न होगी, लेकिन दिल्ली आते ही तीसरे दिन वह ऊंचाई से खेलने लगता है। ” तो क्यों करते हो यह काम ”।
” इसमें मजदूरी अधिक मिलता है। जोखिम है न। ”
” कितनी मिलती है। ”
” पांच-छह सौ रुपये एक दिन के ” ….. फिर अचानक ” पानी दीजिए न। ”
मेरी रुचि कामरान से बात करने में थी। तीसरी बार उसने पानी मांगा। ” ओह, भूल गया। ”
” अब लाता हूँ।
गिलास लेकर आया तो कामरान ने अपने साथ रंग रहे एक और आदमी द्वारा गिलास बढ़ा दिया। जब ग्लास लौटा तो मैंने कहा ” मुझे लगा कि तुम्हें प्यास लगी है, मुझे तो पता ही नहीं चला कि खिड़की के बाहर कोई और भी लटका हुआ है। ”
” नहीं सर! वह हिंदू है। उसे प्यास लगी है। मेरा रोज़ा चल रहा है। ”
(नोट: – मज़हबी वैश्विक एकता हिन्दू मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे पर उभारने वाली भावनाओं से लबरेज इस लेखन को NDTV सीनियर एंकर रविश कुमार ने 6 जुलाई 2014 को अपने ब्लॉग ‘नई सड़क’ पर लिखा था जिसे 9 जुलाई 2014 को अशरफ अली बसतवी ने अपने ब्लॉग में पब्लिश किया था, रमजान करीम की प्रासंगिकता के मद्देनजर इस शिक्षाप्रद लेखन को फिर सियासत प्रकाशित कर रहा है, उम्मीद है कि पाठकों को पसंद आये)

गुरुवार, 24 मार्च 2016

علمائے اسلام پر انگریز مظالم کی دل ہلا دینے والی خونیں داستان

علمائے اسلام پر انگریز مظالم کی

دل ہلا دینے والی خونیں داستان

از:عطاء الرحمن نوری
مبلغ سنی دعوت اسلامی،مالیگائوں

    ۱۸۵۷ء میں علمائے اہلسنّت نے اپنی جان ومال اور عزت وآبرو کا خیال کئے بغیرانگریزوں کے خلاف فرضیت جہاد کا فتویٰ صادر کیا۔ان میں خاص طور پر علامہ فضل حق خیرآبادی، مفتی صدرالدین آزردہ،مولانافیض احمد بدایونی،احمد اللہ شاہ مدراسی،مفتی عنایت احمد کاکوروی،مولانا کفایت علی کافی ،مولانا رحمت اللہ کیرانوی ،ڈاکٹر وزیر خاں اکبرآبادی،مولانا امام بخش صہبائیؔ دہلوی ،مولانا وہاج الدین مرادآبادی اور مولانا رضا علی خاں بریلوی قابل ذکر ہیں۔فتویٔ جہاد کے صدور کے بعد ہزارہاں ہندوستانی اپنی ہتھیلیوں میں سروں کا نذرانہ لیے آزادی کے لیے انگریزوں سے برسرپیکار ہوئے مگر افسوس یہاں بھی بعض وجوہات کی بناپر مسلمانوں کو ہزیمت اٹھانی پڑی۔چوں کہ انگریزوں نے حکومت مسلمانوں سے لی تھی اور مسلمان ہی آزادی کی لڑائی میں پیش پیش تھے اس لیے اس کا خمیازہ صرف اور صرف مسلمانوں کو بھگتنا پڑا۔انگریز اپنے انتقام میں ایسے اندھے ہوگئے کہ انھیں برادران وطن کا خیال ہی نہیں رہا،انھیں اعزازی نوکریاں ملنے لگیں اور مسلمان ہر جگہ سے بے دخل کئے جانے لگے۔مختصر یہ کہ بغاوت کی ساری ذمہ داری مسلمانوں ہی کے حصے میں آئی   ؎
آکے پتھر تو مرے صحن میں دوچار گرے         جتنے اس پیڑ کے پھل تھے پس دیوار گرے
    ۱۸۵۷ء کی بغاوت کو کچلنے میں انگریزوں نے کوئی دقیقہ باقی نہیں رکھا۔چنانچہ علامہ فضل حق خیرآبادی ’’الثورۃ الہندیہ‘‘میں رقمطراز ہیں:’’اس ابتلاء عظیم میں پردہ نشین خواتین پیدل نکل کھڑی ہوئیں،ان میں بوڑھی اور عمر رسیدہ بھی تھیں،جو تھک کر عاجز ہوگئیں۔بہت سی خوف سے جان دے بیٹھیںاور پچاسوں عفت وعصمت کی بنا پر ڈوب کر مر گئیں،اکثر پکڑ کر قیدی بنائی گئیںاور طرح طرح کی مصیبتوں میں گرفتار ہوگئیں۔کچھ کو بعض رذیلوں نے لونڈیاں بنالیااور بعض چند ٹکوں کے بالعوض بیچ ڈالی گئیں۔بہت سی بھوک پیاس کی تاب نہ لا کر مرگئیں۔بہت سی ایسی غائب ہوئیں کہ پھر نہ تو لوٹ کر ہی آئیں،نہ ان کا کچھ پتہ ہی چل سکا۔ہزاروںعورتیںاپنے سرپرستوں،شوہروں، باپوں، بیٹوں اور بھائیوں سے جدا کردی گئیں۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔بہت سی صبح کی سہاگن عورتیں شام کو بیوہ بن گئیں اور شب کو آغوشِ پدر میں سونے والے بچے صبح کو یتیم ہوکر اٹھے۔کتنی ہی عورتیں اپنی اولاد وغیرہ کے گم میں گریہ وزاری کرتی تھیں اور کتنے مردوں کی آنکھوں سے آنسوئوں کا دریا جاری تھا۔شہر چٹیل میدان اور بے آب وگیاہ جنگل بن گیاتھا۔‘‘
(باغی ہندوستان،ص۵۳)
    ۱۸۶۴ء تا ۱۸۶۷ء تک انگریزوں نے علماء کوہلاک کرنا شروع کیا۔ایک انگریز فوجی افسر ہنری کوٹن (Henry Cotton)بیان کرتا ہے کہ ’’دہلی دروزہ سے پشاور تک گرینڈ ٹرنک روڈ کے دونوں ہی جانب شاید ہی کوئی خوش قسمت درخت ہوگا جس پر انقلاب ۱۸۵۷ء کے ردّ عمل اور اسے کچلنے کے لیے ہم نے ایک یا دو عالمِ دین کو پھانسی پر نہ لٹکایا ہو۔ایک اندازے کے مطابق تقریباً بائیس ہزار علما کو پھانسی دی گئی۔‘‘،مسلمان مجاہدین نامی کتاب میں ایک غیر مسلم مؤ رخ لکھتا ہے کہ ’’ایک اندازہ کے مطابق ۱۸۵۷ء میں پانچ لاکھ مسلمانوں کو پھانسیاں دی گئیں۔جوبھی معزز مسلمان انگریزوں کے ہاتھ لگ گیا اس کو ہاتھی پر بٹھایاگیااور درخت کے نیچے لے گئے۔پھندا اس کی گردن میں ڈال کر ہاتھی کو آگے بڑھایاگیا،لاشیں پھندے میں جھول گئیں،آنکھیں اُبل پڑی ،زبان منہ سے باہر نکل آئی۔‘‘
(علمائے اہلسنّت کی بصیرت وقیادت،ص۸۰)
    ان تین سالوں میں چودہ ہزار علمائے کرام تختۂ دار پر چڑھائے گئے۔دہلی میں چاندنی چوک کے اِردگرد دور دور تک ایسا کوئی درخت نہیں تھا جس پر علماء کی گردنیں نہ لٹکی ہوں۔علماء کو سُوروں کی کھالوں میں بند کرکے جلتے ہوئے تنوروں میں ڈالاگیا۔علماء کے جسموں کو تانبوں سے داغا گیا۔علماء کو ہاتھیوں پر چڑھا کر درختوں سے باندھا گیااور ہاتھیوں کا پھر چلا دیا جاتا۔ انگریزی رائٹر مسٹر ایڈورڈ ٹامسن ’’تصویر کا دوسرا رخ‘‘ نامی کتاب میںلکھتا ہے کہ ہاتھیوں کو اس طرح چلانے سے پھانسی لگنے والے شخص کا بدن انگریزی کے آٹھ (8)کے جیسا ہوجاتا۔لاہور کی شاہی مسجد میں ایک دن میں اسّی اسّی علمائے کرام کو پھانسی دی جاتی تھی۔لاہور کے دریائے راوی میں علما کو بوریوں میں بند کرکے بہادیا جاتااور اوپر سے گولیاں چلائی جاتی۔غرضیکہ ایسے ایسے مظالم ڈھائے گئے جن کی تصور ہی سے رونگٹے کھڑے ہوجاتے ہیں۔
دنیا سے آج پوچھو پیچھے نہیں ہے ہم             انگریز سے رہا تھا جب امتحاں ہمارا
زد میں بھی گولیوں کی مقصد نہ ہم نے چھوڑا        قیدوں میں بھی نہ بدلہ عزم جواں ہمارا
ریلوں میں راستوں میںجیلوں میں محفلوں میں         نعرہ تھا ہم کو دے دو ہندوستان ہمارا
    آزادی کی پوری تاریخ علمائے حق کی قربانیوں سے بھری پڑی ہے۔اب یہ ہماری ذمہ داری ہے کہ آزادی ٔ ہند کی صحیح تاریخ دنیاکے سامنے پیش کریں اور بتلائیں کہ دیش کی آزادی کے لیے خون کے قطرات ہمارے اسلاف نے بہائے ہیں۔میدان جنگ میں تیروسنان کے مقابلے کی جب بھی ضرورت پیش آئی ہے تو ہم نے اپنا سینہ پیش کیاہے۔
(یو این این)

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علمائے اسلام پر انگریز مظالم کی دل ہلا دینے والی خونیں داستان

علمائے اسلام پر انگریز مظالم کی

دل ہلا دینے والی خونیں داستان

عارف عزیز
(بھوپال)

پیدائش اور تعلیم:  ہندوستان میں اُردو کی اوّلین ورکنگ جرنلسٹ محترمہ خالدہ بلگرامی ۲۰؍دسمبر ۱۹۴۹ء کو بھوپال میں پیدا ہوئیں۔ اُن کے والدِ محترم جناب قاضی سید رؤف احمد بلگرامی اُترپردیش میں علم و ادب کے گہوارہ شہر بلگرام سے تعلق رکھتے تھے، اُن کی اولادوں میں محترمہ خالدہ بلگرامی سب سے بڑی تھیں، ابتدائی تعلیم کے بعد انھوں نے مدرسہ حیات العلوم نسواں موتی مسجد بھوپال سے دارالعلوم دیوبند کی سندِ عا  لمیت اعلیٰ نمبرات سے بیس سال کی عمر میں حاصل کی۔ جامعہ اردو علی گڑھ سے اردو کا ’ادیبِ کامل‘ امتحان ۱۹۶۱ء میں، پریاگ مہیلا ودیا پیٹھ الٰہ آباد سے ہندی کا ’سرسوتی‘ امتحان ۱۹۶۸ء میں، بھوپال یونیورسٹی سے بی اے ۱۹۷۳ء میں نیز بھوپال یونیورسٹی سے ہی ایم اے اردو ۱۹۷۸ء میں امتیازی حیثیت سے آرٹس فیکلٹی میں سب سے زیادہ نمبر حاصل کرکے پاس کیا، جس کے صلہ میں اُنہیں ’سجاد گولڈ میڈل‘ سے نوازا گیا۔

خالدہ صاحبہ نے اپنے مادرِ علمی مدرسہ حیات العلوم میں درس وتدریس کی خدمات انجام دیں، وہ بحیثیت ٹرسٹی مدرسہ کی مشاورتی کمیٹی کی رکن بھی رہیں، انھوں نے (۱) مدھیہ پردیش کے پہلے جدید وسائل سے آراستہ بھاسکر گروپ کے آفسیٹ روزنامہ ’آفتابِ جدید‘ کو بحیثیت سب ایڈیٹر ۱۹۷۹ء میں جوائن کیا، (۲) وہ بھوپال میونسپل کارپوریشن کے ترجمان ’ناگرک‘ کے اردو ایڈیشن کی ایڈیٹر رہیں اور (۳) روزنامہ ’ندیم‘ میں سب ایڈیٹر اور بچوں کے شعبہ کی نگراں کی حیثیت سے ۱۹۸۶ء سے ۲۰۰۵ء تک خدمات انجام دیں۔
محترمہ خالدہ بلگرامی کا ۳۱؍جنوری ۲۰۱۵ء کو انتقال ہوا، اُن سے چھوٹی تین بہنوں کے نام محترمہ شوکت فاطمہ بلگرامی، محترمہ نفیس فاطمہ بلگرامی، پروفیسر سلمیٰ فاطمہ بلگرامی اور محترمہ نجمہ فاطمہ بلگرامی ہے، بھائی کا نام فضل بلگرامی، بیٹی کا نام افشاں بلگرامی اور داماد شاہد متین سلمہ ہیں۔
قلمی سرگرمیاں:
مدھیہ پردیش اردو اکادمی کی طرف سے ۱۹۸۰ء میں ریاست کے ۲۵سالہ ادب پر شائع خصوصی مجلہ میں خالدہ صاحبہ کے دو مضامین منتخب کیے گئے۔
محترمہ خالدہ بلگرامی نے روزنامہ ’آفتابِ جدید‘ اور روزنامہ ’ندیم‘ میں ہفت روزہ بچوں کا صفحہ بیس سال تک مرتب کیا، اُن کے مضامین، انشایئے اور لئے گئے انٹرویو اخبارات میں شائع ہوتے رہے۔ اُن کو یہ امتیاز بھی حاصل رہا کہ وہ ہندوستان کی پہلی خاتون ورکنگ جرنلسٹ تھیں اور ۱۴سال تک مدھیہ پردیش حکومت سے تسلیم شدہ صحافی رہیں۔اُن کے انتقال سے بھوپال کی اُردو صحافت نے ایک باصلاحیت صحافی اور قلم کار کو کھودیا ہے، جس کی کمی تادیر محسوس کی جاتی رہے گی۔
(جاری کردہ: چندرہاس شکل کنوینر ’خالدہ بلگرامی میموریل فاؤنڈیشن بھوپال‘)

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علمائے اسلام پر انگریز مظالم کی دل ہلا دینے والی خونیں داستان

تحریکِ آزادی میں اردو صحافت کا کردار

عارف عزیز
(بھوپال)

 ٭ہندوستان کی پہلی جنگ آزادی میں اردو زبان اور صحافت کا کردار ہندوستان کی قومی تاریخ کا ایک ولولہ انگیز باب ہے ، اگر یہ کہا جائے تو حقیقت سے زیادہ قریب ہوگا کہ آزادی کی جنگ جس زبان میں لڑی گئی وہ مقبولِ عام زبان اردو اور اُس کی صحافت ہے۔ اِس زبان کے ادیبوں، شاعروں اور صحافیوں نے آزادی کی جدوجہد میں کلیدی حصّہ لیا، کئی صحافی و شاعر پھانسی پر چڑھائے گئے، اُن کی جائیدادیں ضبط اور مکانوں پر قبضے کئے گئے، اخبارات کے لیے ضمانتیں طلب کی گئیں ، اِن کے علاوہ مادرِ ہند کے جیالے ہندو مسلمان اور سکھوں نے باہمی اتحاد اور فکروعمل کی یکجہتی کے ساتھ جو جدوجہد کی اِس میں اُن کا سب سے بڑا سہارا اردو زبان اور اُس کی صحافت تھی۔ اِن سرفروشوں میں بہادرشاہ ظفرؔ، بیگم حضرت محل، جنرل بخت روہیلہ، احمداللہ شاہ ، فیروزشاہ، مہارانی لکشمی بائی، نانا صاحب پیشوا، تاتیا ٹوپے، بابو کنور سنگھ سب کے فرمان ، خطوط اور مُہروں میں اردو ہی استعمال ہوتی تھی۔
اردو کا پہلا اخبار ’’جامِ جہاں نما‘‘ ۱۸۲۲ء میں شائع ہوا اور مغلیہ سلطنت کے خاتمہ تک تقریباً ۴۰ اردو کے اخبارات جاری ہوچکے تھے، جنھوں نے عوام میں وطن پرستی اور ملک کی آزادی کا جذبہ پیدا کرنے میں بنیادی کردار ادا کیا، ’’تاریخِ صحافت اردو‘‘ کے مؤلف کے بقول ’۱۸۵۷ء میں ہندوستانیوں نے انگریز سامراج کے خلاف جو بغاوت کی اُس کی ذمہ داری انگریزوں نے اردو کے مذکورہ اخبارات پر ہی ڈالی اور اِس کی پاداش میں ’’دہلی اردو اخبار‘‘ کے بانی مولوی محمد باقر کو سولی پر چڑھادیا گیا، اُن کے بیٹے محمد حسین آزادؔ کے نام بھی گرفتاری کا وارنٹ تھا لیکن وہ بچ کر نکل گئے، اُن کے ہم عصر ’’صادق الاخبار‘‘ کے ایڈیٹر جمیل ہجرؔ پر بغاوت کا مقدمہ چلایا اور انہیں تین سال کی سزا ہوئی۔ اِسی سلسلہ کی ایک کڑی ۱۸۵۷ء میں بہادرشاہ ظفرؔ کے نواسے مرزا بیدار بخت کے تحریری حکم سے شائع ہونے والا اردو اور ہندی کا اخبار ’’پیامِ آزادی‘‘ ہے جو حقیقی معنوں میں آزادی کا نقیب بن کر منظرِ عام پر آیا، اِس اخبار نے جنگِ کی آگ بھڑکانے میں ایندھن کا کام کیا، یہی وجہ ہے کہ انگریز حکمرانوں نے اس اخبار کو بند کرنے کے ساتھ اِس کے پڑھنے والوں کو بھی سزا کا مستحق قرار دیا۔ یہاں تک کہ جن لوگوں کے گھروں سے اِس باغی اخبار کا شمارہ یا ایک ورق دستیاب ہوا اُنہیں بھی انگریز حکومت کے عتاب کا شکار ہونا پڑا، اِس اخبار کے ایڈیٹر ، پرنٹر، پبلشر اور ایڈیٹر بیدار بخت کو موت کی سزا دی گئی۔ اخبارات کی اشاعت کا باقاعدہ مرحلہ شروع ہونے سے پہلے ہی اردو زبان عوام کے درمیان رابطہ کی زبان کا درجہ حاصل کرچکی تھی ، صرف دہلی سے بارہ ایسے قلمی اخبار سپرد ڈاک کئے جاتے، جن کا مقصد انگریز حکومت کے خلاف عوام کو بیدار کرکے بغاوت کے لیے اُکسانا تھا، یہی وجہ ہے کہ لارڈ آک لینڈ اور اور لارڈ کیننگ کو اعتراف کرنا پڑا کہ ’’قلمی اخبارات کی صحافت نے ہندوستانی عوام میں برطانوی حکومت کے خلاف بدگمانی پھیلاکر ۱۸۵۷ء کے انقلاب کی راہ ہموار کی ہے‘‘ ۔
اردو اخبارات کے اس باغیانہ رول سے گھبراکر انگریز حکمرانوں نے ہندوستانی پریس کا گلا گھونٹنے کے لئے کاروائی شروع کی جس کے نتیجہ میں اردو اخبارات کی تعداد گھٹتے گھٹتے صرف ۲ ۱ رہ گئی، اِس کے بعد آگرہ سے مکندلال کی ادارت میں ماہنامہ ’’تاریخ بغاوتِ ہند‘‘ ، اجمیر سے اجودھیا پرساد کی ادارت میں ہفت روزہ ’’خیرخواہِ خلق‘‘ ، علی گڑھ سے سرسید احمد کی ادارت میں ’’سائنٹفک سوسائٹی‘‘ یا ’’علی گڑھ انسٹی ٹیوٹ گزٹ‘‘ اور لکھنؤ سے پہلے ’’اودھ اخبار‘‘ اور اس کے بعد ’’اودھ پنچ‘‘ جاری ہوئے، ان اخبارات نے عوام میں آزادی کے لئے جدوجہد کا جذبہ اور سیاسی شعور پیدا کرنے کا اہم کام انجام دیا۔ ۱۸۶۰ء میں دہلی کے مختلف امراء اور نواب زادوں کی زیرسرپرستی چھ اخبارات شائع ہورہے تھے، اِن میں سب سے مشہور ’’اکمل اخبار‘‘ تھا، جسے حکیم عبدالحمید نے شائع کیا۔ ۱۸۷۷ء میں تین مزید نئے اخبارات کا اجراء عمل میں آیا، یہ اخبار ’’نصرتُ الاکبر‘‘ ، ’’نصرتُ الاسلام‘‘ اور ’’مہرِ درخشاں‘‘ تھے، جن کا مقصد عوام کو حالاتِ حاضرہ سے باخبر رکھنا تھا، ۱۸۸۰ء کے دوران بارہ نئے اخبارات منظر عام پر آئے، اُس وقت تک میرٹھ، آگرہ، لکھنؤ، علی گڑھ اور لاہور میں اردو اخبارات اپنا حلقۂ اثر قائم کرچکے تھے، نیز آزادی کے لئے جدوجہد کو آگے بڑھانے میں مصروف تھے۔
۲۰ویں صدی کا آغاز ہوتے ہی آزادی کے لیے قومی تحریک نے نئی کروٹ لی، حسرتؔ موہانی اور ظفرعلی خاں نے اپنے اخبارات ’’اردوئے معلیٰ‘‘ اور ’’زمیندار‘‘ کے صفحات پر مضامین اور اشعار کے وسیلہ سے ملک کے عوام کو آزادی کی ضرورت واہمیت سمجھانے کی بھرپور کوشش کی، بنگال سے مولانا ابوالکلام آزادؔ کا ’’الہلال‘‘ یا اُس کی ضبطی کے بعد ’’البلاغ‘‘ دہلی سے محمد علی جوہر کے ’’ہمدرد‘‘ ،لکھنؤ سے ’’جواہرلال نہرو کے ’’قومی آواز‘‘، پنجاب سے لالہ لاجپت رائے کے ’’وندے ماترم‘‘ ، بجنور سے ’’مدینہ‘‘، لاہور سے ’’ملاپ‘‘ ، ’’پرتاپ‘‘، ’’انقلاب‘‘ اور ’’پیام‘‘، دہلی سے ’’ریاست‘‘، ’’الجمعیۃ‘‘ اردو کے وہ اخبارات ہیں جو تحریکاتِ آزادی کے بارے میں خبریں، پیغامات، تقاریر اور منصوبوں کو پھیلاکر نیز سلگتے عصری مسائل پر اداریے لکھ کر بیرونی حکمرانوں کا ناطقہ تنگ کرنے میں کامیاب ہوئے۔ سابق ریاستِ بھوپال سے ’’صداقت‘‘، ’’صبح وطن‘‘ ، ’’آواز‘‘ اور ’’رہبروطن‘‘ کا جنگ آزادی میں نمایاںحصّہ رہا، مذکورہ اخبارات کے مدیروں نے ہر طرح کی قربانیاں پیش کیں۔ لیکن بھوپال کی اردو صحافت کو بغاوت کا پہلا سبق ’’صداقت‘‘ کے ایڈیٹر مرزا عبدالکریم اُوجؔ نے پڑھایا، جس کی پاداش میں انہیں ریاست بھوپال سے بے دخل ہونا پڑا۔ وہ ۱۸۸۷ء میں بھوپال سے اپنا گھربار چھوڑکر ہوشنگ آباد چلے گئے اور وہاں سے ’’موجِ نربدا‘‘ کے نام سے ہفت روزہ جاری کیا، جو جدوجہد آزادی کا زبردست علمبردار اور انقلابی اخبار تھا۔
اردو زبان ، ادب اور صحافت کا خمیر سیاسی شعور، سماجی انصاف اور مذہبی رواداری سے اُٹھا ہے، اِسی لیے اردو کے صحافیوں، ادیبوں اور شاعروں نے اپنی تخلیقات کے ذریعہ سماج میں وقوع پذیر حادثات و واقعات کو جہاں بیان کیا، وہیں جابر طاقتوں کے خلاف پوری شدت سے آواز بلند کی اور عوام الناس کے دل ودماغ میں وطن سے محبت کے اُس تصور کو گہرا کیا جو مدہم پڑگیا تھا، میر تقی میرؔ، ذوقؔ، غالبؔ، واجد علی شاہ اخترؔ، ظہیرؔ دہلوی نیز بہادرشاہ ظفرؔ سبھی نے اپنے عہد کی بربادی اور انگریزوں کی غلامی پر نوحہ خوانی کی تو حالیؔ، چکبستؔ، اقبالؔ اور جوشؔ نے اپنی نظموں سے، مومنؔ نے اپنی مثنوی سے، داغؔ، سالکؔ، مجروحؔ نے اپنے مرثیوں سے ہندوستانی عوام کو آزادی کی برکات اور غلامی کی لعنتوں سے اس فنکاری کے ساتھ آگاہ کیا کہ اُن کے اشعار اپنے عہد کی دھڑکن بن گئے، اردو شعراء نے ہندو اور مسلمانوں کو قریب لانے اور اُن میں اتحادِ عمل پیدا کرنے کے لیے ایک دوسرے کی برگزیدہ ہستیوں پر نظمیں لکھیں جو کافی مقبول ہوئیں اور اخبارات کی زینت بنیں۔
منیرؔ شکوہ آبادی اردو کے پہلے شاعر تھے جن کو قید کرکے انڈومان بھیجا گیا، غالبؔ کے شاگرد میکشؔ کو قیدوبند کی آزمائش سے گزرنا پڑا، امام بخش صہبائی کو توپ سے اُڑایا گیا، اِسی طرح اُن علماء کرام کو اور مجاہدینِ جنگِ آزادی کو جن کا اوڑھنا بچھونا اردو اور اُس کی صحافت تھی، جلاوطنی اور دیگر صعوبتوں سے دوچار ہونا پڑا، مولانا محمودالحسن، مولانا عبیداللہ سندھی، مولانا برکت اللہ بھوپالی، لالہ ہردیال، لالہ لاجپت رائے تو چند نام ہیں، ایسے سیکڑوں بلکہ ہزاروں محبانِ وطن اور اردوداں حضرات نے قربانیاں پیش کرکے تحریکِ آزادی کو اپنے خون و پسینہ کا نذرانہ پیش کیا، اُس زمانے میں اردو کے خلاف نہ تو کوئی تعصب تھا، نہ امتیازی سلوک کی شکایت تھی بلکہ اردو ہی ملک کی وہ مؤثر زبان تھی جو لوگوں تک اپنا نقطۂ نظر پہنچانے کا ایک اہم وسیلہ بن گئی، علمائے دیوبند جن کا اثر ورسوخ ہر مذہب اور فرقہ پر یکساں تھا، اُن کی تقاریر سننے اور خیالات جاننے کے لئے سبھی مذاہب اور مسلکوں کے لوگ بے چین رہا کرتے تھے، مولانا ابوالکلام آزادؔ، مولانا حسین احمد مدنی، عطاء اللہ شاہ بخاری، مولا حبیب الرحمن اس میدان کے شہ سواروں میں شامل تھے۔ ۲۰ویں صدی کے آغاز سے ۱۹۴۷ء تک تین ہزار سے زیادہ اردو کے اخبارات ورسائل شائع ہوئے، اُن میں ۹۰ فیصد اخبارات یعنی ۲ ہزار ۷۵۰ اخبارات نے آزادی کی لڑائی میں مختلف طریقوں سے حصّہ لیا اور قربانیاں پیش کیں، اُس دور کے سیاسی قائدوں میں آپ کو دو خصوصیتیں ملیں گی اوّل صحافی ہونا، دوم وکالت کرنا، مہاتما گاندھی، مولانا آزادؔ، حکیم اجمل خاں، آصف علی، محمد علی جوہرؔ، حسرتؔ موہانی، بال گنگا دھرتلک ، لالہ لاجپت رائے سبھی صحافی تھے۔
اُس زمانے میں جنگ آزادی پر جو فلمیں بنائی گئیں، ناول ، گیت اور نغمے لکھے گئے وہ سب اردو میں تھے، اردو کے ادیب، صحافی اور شعراء کی اِس اجتماعی کوشش کا اثر یہ ہوا کہ انقلاب زندہ باد اور انگریز حکومت مردہ باد کے نعروں سے ملک کے درودیوار گونجنے لگے، ۱۸۸۵ء میں انڈین نیشنل کانگریس نے آزادی کے لیے جدوجہد کے اپنے جس سفر کا آغاز کیا اور جس کے اسٹیج سے قومی رہنما الفاظ وجذبات کے دریا بہاتے رہے، وہاں بھی اردو زبان کا استعمال ہوتا تھا، مہاتماگاندھی نے اردو زبان کی اہمیت کا احساس کرکے اِس زبان کو خود سیکھا، کانگریس کے صفِ اوّل کے قائدوں میں موتی لال نہرو یا سروجنی نائیڈو اور دادا بھائی نوروجی ہوں یا بال گنگا دھرتلک، لالہ لاجپت رائے ، جواہرلال نہرو ہوں یا ڈاکٹر راجیندر پرساد، گووندولبھ پنت ہوں یا لال بہادر شاستری، ماسٹر تارا سنگھ ہوں یا پرتاپ سنگھ کیروں، جے پرکاش نرائن ہوں یا رام منوہر لوہیا سب اردو جانتے ہی نہ تھے اپنی تنظیم کی بہبود کے کام اور عوامی رابطہ کی مہم میں اردو زبان اور اُس کی صحافت کا استعمال کرتے رہے۔ مہاتما گاندھی نے تو اردو زبان کی اہمیت کا اندازہ لگاکر اپنے اخبار ’’ہری جن‘‘ کواردو میں بھی نکالا، اِسی طرح ’’ملاپ‘‘، ’’پرتاپ‘‘، ’’تیج‘‘ اور دیگر متعدد ہندو صحافیوں کے اخبارات نے تحریکِ آزادی میں برطانوی سامراج کے خلاف اہم رول ادا کیا۔ صحیح بات یہ ہے کہ انگریز حکمراں اگر کسی سے خوف زدہ تھے تو وہ اردو اخبارات اور اُن کے صحافی تھے۔ اِسی لئے اردو کے اخبارات وصحافیوں پر ظلم وستم کے پہاڑ توڑے گئے، اُنہیں قیدوبند کا شکار بنایا گیا، اُن سے ضمانتیں طلب کی گئیں۔ اِس کے باوجود اخبارات کے مالکوں اور صحافیوں نے بیرونی حکمرانوں کا سینہ سپر ہوکر مقابلہ کیا اور تحریکِ آزادی کے ہراول دستہ کا کردار نبھایا، لیکن افسوس کہ آزادی کے بعد آزادی کی تحریک میں اردو صحافت کے اِس کردار کا کھلے دل سے اعتراف نہیں ہوا، اردو جیسی عوامی اور مقبول زبان کی شاعری ہوکہ نثر، فکشن ہوکہ صحافت سب نے حصولِ آزادی کا ایک جمہوری تصور پیش کیا اور عوام میں آزادی کی خاطر جان پر کھیل جانے کا جذبہ اُبھارا، اِس کو بھی فراموش کردیا گیا ہے۔
(یو این این)

शनिवार, 19 मार्च 2016

ILZAAM



ILZAAM
रामू काका गांव के सब से बुज़ुर्ग और पढे लिखे आदमी थे । दो बार पंच, तीन बार सरपंच और एक बार प्रधान रह चुके थे । रामू काका ने अपने सफ़र की शुरुआत तो सरकारी अध्यापक के रूप में की थी क्योंकि अध्यापन से उन्हें प्यार था मगर न जाने क्यों दो साल की सेवा के बाद अचानक उन्होंने त्यागपत्र दे दिया । काका के इस फ़ैसले से सभी चकित थे और घरवाले आगबगूला, मगर काका तो काका ठहरे अपने फ़ैसले पर रहे अडिंग । मगर काका ने  अपने पसंदीदा काम को अलविदा क्यों कह दिया ये प्रश्न आज तक अनुत्तरित ही रहा ।
                शाम की सुहानी ठंडी बयार चल रही थी और उसमें हुक्के के तम्बाकू की महक बसी हुई थी, रामू काका के हुक्के की तम्बाकू की सौन्धी सौन्धी महक, रामू काका घर के बाहर पलंग पर पालथी मार कर बैठे हैं एक हाथ मैं हुक्के की नली पकडे और दूसरे हाथ से पलंग की पट्टी पकडे हुए । हमेशा की तरह काका के सामने गांव के बुज़ुर्गों और नौजवानों की एक टोली बैठी थी जो शाम के समय गपशप और गांव की खैर खबर के साथ साथ अपनी थकन उतारने के लिये इस चौपाल पर इकट्ठे होते हैं । वक्त गुज़ारी के लिये इस तरह की महफ़िलें गांवों की ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा हैं यहां के लोग डेली सोप नही देखते बल्कि वास्तविक ज़िन्दगी के अफ़साने और घटनायें यहां “डिस्कस” करते हैं, खबरों के लिये यहां ख़बर बेचने वाले सैकडों ख़बरिया चैनलों की खूबसूरत और मेक अप से सजी धजी न्यूज़ पढती कन्याओं और “लाईव” बहस के तमाशों की कोई जगह नहीं है बल्कि चौपाल पर ही ये सारे काम निपटा दिये जाते हैं, चौपाल पर ही सब से वास्तविक “ओपीनियन पोल” पेश किये जाते हैं और यहीं बहुत सी समस्याओं को चर्चा करके शांतिपूर्वक तरीके से हल भी कर लिया जाता है । सभी लोग बातचीत में मगन थे कि तभी रामू काका ने अपने हुक्के की नली से एक नौजवान की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा –
-          अरे दीना तेरा लड़का दिन भर मारा मारा फ़िरता है छ: बरस का हो गया है उसे स्कूल में काहे नहीं बिठाता ?
दीना हाथ जोड कर बोला -  काका स्कुलां में आजकल फ़ीस घणी ज्यादा लागे, नै म्हारा अबार दिणमाण भी थोडा खराब चाल रिया है ----अबै इत्ता सब पीसा कठै सूं लावूं ?
रामू काका  -  अरै गैला, सरकारी स्कूल रे मांये भेजन री बात कैवूं हूं । प्राइवेट अपां रै बस री बात कौनी पण सरकारी में तो भर्ती करा सके है उठै फ़ीस भी कौनी लागे ने किताबां भी मुफ़त में दैवे है ।
दीना  -  पण काका फ़ारम का पीसा लेवेगा वा माड़साब ?
भीड़ में से ऐक नौजवान राजू दीना को समझाते हुए बोला -  अरे दीना काका वठै जावो तो सरी उठै हैंग फ़िरी है कोई पया कोनी लागे ।
दीना -  ठीक है काका काले ही जावूंला ।
फ़िर कुछ सोचकर बोला -  मगर काका म्हारे छोरे रा जनम रा तो कागद की हैई कोनी । ने म्हने तो उण री जनम री तारीख़ भी याद कोनी नै…इससे पहले कि दीना अपना सवाल पूरा करता रामू काका किसी अन्तर्यामी बाबा की तरह बीच में ही बोल पडे…
-          अरे दीना तू केवल अपने छोरे ने लै ने स्कूल जा बाकी जनम-वनम की तारीख़ स्कूल का मास्टर साब हैंग “सेट” कर देवेला ।
दीना ने स्वीकृति में सिर हिलाया, जैसे उसने सब समझ लिया हो और फ़ैसला कर लिया हो । मगर फ़िर उसकी खोपडी में एक सवाल कौन्धा और वो सिर खुजाता हुआ बोल पडा-
पण काका मेरा छोरा बहुत बदमाश है स्कूल में मन ना लगा तो भाग छूटेगा ।
राजेश मूछड़ बोला – अरे दीना एक बार तेरे छोरे को नाम स्कूल में लिखीज गयो समझ अबे तूं फ़िरी । अब तेरे छोरे की तुझ से ज्यादा फ़िकर वो मास्टर ने करनी पड़ेला ।
पण मूछ्ड़ सा,  छोरो स्कूल कूद गयो तो मास्टर तो उनो नाम काट देवेला ? दीना ने एक और सवाल दाग़ दिया ।
अबकी बार रामू काका उलझते हुए बोले – अरे दीना, मास्टर की क्या शामत आई है जो तेरे छोरे को नाम काट दे ? सरकार उसकी नाक काट देगी ।
मूछ्ड़ ने बात को स्पष्ट करते हुये कहा –
-          दीना काका,  वा की नौकरी ही आईज है । तेरा छोरा स्कूल नी जावेला तो मास्टर उने खुद पकड़ ने लेन जावेला  । एक बार नाम स्कूल में लिखीज गयो अबे मास्टर साब रा चाचा भी उनो नाम नी काट सके । नाम काटे तो जवाब देते नीं बणे । इण वास्ते तू तो बेफ़िकर स्कूल जा ने नाम लिखा अबे खुद रौ दिमाग़ मत लगा ।
 भीड़ के आखिरी छोर पे बैठा एक मनचला लड़का चिल्लाया –
-          काका स्कूल में खाणो भी खिलावै है माड़साब ।
मूछड़ सा फ़िर बोले – काका स्कूल में खाणो तो बणे है पण कदैइ कदैइ तो टाबरां री तबियत धापे उनु पैली ही खाणो खुट जावै । म्हनै लागे स्कूल रो मुंशी की गपागप करै है ? की तो ईलम करै है ?
काका ने हुक्के का एक लम्बा कश लिया मानो एक लम्बी आह भर रहे हों – गुड़ गुड़ – गुड़ गुड़  और फ़िर धीरे से धुआं छोड़ते हुए और अपनी मूछों को अंगूठे और उंगली से अपने ऊपरी होंन्ठों से हटाते हुये धीरे से मुस्कुराये और बोले ……
-          राजेश, स्कूल में मुन्शी कद होया ? गेला । स्कूल रौ मुंशी तो मास्टर ही है । गेहूं, चावल रौ स्टाक, सब्ज़ी और मसालों की खरीद, पकाने का हिसाब किताब, बैंक खाता और बही सब मास्टर ही करै है ।
“ जणै स्कूल में जिका माड़साब है वै मास्टर है के मुंशी है ? “ गोलू ने अचानक सवाल दाग़ा ।
अरे भाई मास्टर तो मास्टर ही रैवेला । खाने पीने का इन्तेजाम करने और पैसों का हिसाब किताब रखने से मुंशी थोड़े ही बन जायेगा । और फिर स्कूल में भोजन का इन्तेज़ाम भी तो वो ही करता है तो क्या उसे हलवाई भी कहने लगें ? और सुबह विधालय खोलते ही साफ़ सफ़ाई भी करता है तो क्या इससे वो चपरासी हो गया ? टांके के पानी और विधालय के शौचालयों की साफ़ सफ़ाई कराने का भार भी उसी पर है तो क्या उसे हरिजन कहें ?
काका का जवाब सुनकर सब गोलू की तरफ़ देखने लगे मानों आखों ही आखों में कह रहे हों “ कैसा बेवकूफ़ लड़का है ? “
रामू काका ने एक बार फ़िर हुक्का गुड़गुड़ाया फ़िर बोले –
-          और अब तो सुना है सरकार ने मास्टर को एक और नई ज़िम्मेदारी दी है कि वो सुबह के समय गांव की पगड्ण्डी से  सुबह सुबह जंगल और खेतों में शौच जाने वाले लोगों पर नज़र भी रखेगा ताकि गांव के लोगों को शर्मिन्दा करके उन्हें घर में शौचालय बनाने के लिये प्रेरित कर सके ।
-          जैसे ही रामू काका ने अपना आखरी जुमला पूरा किया मजमे में बैठै बहुत सारे लोगों के मुंह खुले रह गये । कुछ की हंसी निकल पड़ी ।
-           छोटू  की आंखो के आगे तो तुरंत अपने मास्टर साहब की फ़िल्म चलने लगी । सुबह का समय है, ठ्न्डी ठ्न्डी हवा चल रही है और मास्टर साहब पगडंडी पर खड़े हुये हैं । उनकी काली काली मोटी मोटी आंखे, हाथ में लौटा लिये हुये शौच करने जाते हुये, गांव के हर बच्चे, पुरुष और महिलाओं को चश्में से घूर घूर कर देख रहीं हैं, उन्हें शर्मिन्दा कर रहीं हैं …… मास्टर साब सब को शर्मिन्दा कर रहे हैं । वाह ये भी क्या नौकरी है । शर्मिन्दा करने की । उस ने मन ही मन मास्टर बनने की ठान ली थी । और फ़िर पता नहीं क्या क्या सोचकर वो मुस्कुराने लगा और फ़िर धीरे धीरे उसकी मुस्कुराह्ट हंसी में बदलने लगी ।
 मगर तभी रामू काका की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया । काका श्यामू से पूछ रहे थे –
अरे श्यामू तेरे लड़के की तबीयत अब कैसी है ? डाक्टर ने क्या बताया ? उसकी हड्डियां  क्यों दर्द करतीं हैं ?
काका ने सवालों के ढेर लगा दिये थे । श्यामा बोला –
-          काका कल उसे  अस्पताल दिखाया था । डाक्ट्र साब कह रहे थे कैल्सियम की कमी से ये सब चक्क्र है । लड़की को भी दिखाया था वो भी कमज़ोर है उसे आयरन की गोलियां दी हैं । काका डाक्ट्र कह रहा था कि बच्चे कौन से स्कूल जाते हैं ? मैं ने कहा अपने गांव के सरकारी स्कूल जाते हैं तो कहने लगा सब मास्ट्र साब की ही गलती है अगर वो सही समय पर तेरे बच्चों को आयरन कैल्सियम की खुराक दे देता तो तुझे अस्पताल न आना पड़ता । उसकी शिकायत सरपंच से ज़रूर करना । मगर काका दवा देने का काम तो डाक्टर का है । इस में बापड़े वा मास्टर का क्या दोष ? मैं भला उसकी शिकायत क्यूं करुं ?
श्यामा की बात सुनकर सभी को हैरत भी हुई और डाक्टर पर गुस्सा भी आया मगर सब काका के उत्तर की प्रतीक्षा में चुप थे ।
काका बोले – श्यामा सरकारी स्कूल में पढ्ने वाले सभी बच्चों के स्वास्थय की जांच और उस का रिकार्ड रखने का काम भी सरकारी स्कूल के मास्टर साहब को करना पड़ता है । सभी बच्चों की लम्बाई, वज़न, पोषण कुपोषण की स्थिति का रजिस्टर बनाना पड़ता है इसके अलावा साल में निर्धारित अवधि में, समय समय पर टिट्नेस का टीका लगवाना, विटामिन ए की खुराक, आयरन कैल्शियम और पेट के कीड़े मारने की दवा देने का काम भी मास्टर साब ही करते है ?
श्यामा सर खुजाता हुआ बोला ……
-          काका सरकारी स्कूल में नहीं सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र में कहिये । काका लगता है आप पर भी अब उमर का असर होने लगा है ?
काका अपनी ऐनक ठीक करते हुये बोले ।
-          अरे श्यामा मैं तो साठे में भी पाठा हूं मगर तेरे मगज में ही भूसा भरा है । तेरा इसमें कोई कसूर भी नहीं तेरे बाप ने तुझे स्कूल भेजा होता बचपन में तो ऐसी बातें न करता ।
मगर हकीकत तो यह थी कि ये संशय सिर्फ़ श्यामा का ही नहीं था बल्कि हुजूम में बैठे तकरीबन हर उस छोटे बड़े का था जो विधालय कभी नहीं गया था ।
काका ने फ़िर कहा –
-          ये सभी दवाईयां स्कूल में ही दी जाती हैं और मास्टर साब ही ये दवाईयां देते हैं ।
सभी लोग हैरत से काका की तरफ़ देख रहे थे मानो कह रहे हों काका तुम सचमुच में सठिया गये हो , मान लो इस बात को ।
तभी भीड़ में से एक आवाज न जाने कहां से आई ……
-          अरे काका दवाई देने वाला डाक्टर स्कूल में नहीं होता वो तो अस्पताल में होता है । स्कूल में मास्टर होता है…………मास्टर
काका ने अपनी ऐनक से झांक कर मजमें में चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाईं । मगर सवाल करने वाला नज़र नहीं आया तो उन्होंने अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया……
-          अरे लाला तू कभी स्कूल नहीं गया तभी तो ऐसी बात करता है । अरे स्कूल में दवाई देने का काम अपणा मास्टर साब ही करे है ।
  तभी कालूराम चिल्ला कर बोला ……
-          अरे भाईलोगां काका ठीक फ़रमावे है मास्टर ही डाक्टर है । याद करो साल में किती बार अपाणे घरां आया करै, पल्स पोलियो रो डिब्बो खांधे माथे टांगियोड़ो नै ऐक हाथ मांय पोलियो री दवा ने दूजे हाथ मांये जाडो पैन लियोड़ो । ऐक हाथ सूं दवा पावे ने दूजे हाथ सूं टाबर रै हाथ री आंगली माथे निसान दिरावै । अरे जूं वोट देवा पछे अपाणा हाथां री उंगली माथे लागिया करै है निसान, सेम टू सेम ।
हां हां ठीक कैवे कालु म्हारै घरै भी आया, म्हारै भी आया………
अब लोगों को यकीन हो गया मास्टर डाक्टर रौ काम भी करै है । मगर अभी लोगो की चर्चा थमती कि भीड़ में से एक बूढ़ा आदमी धीरे धीरे बोला ……
-          काका मास्टर तो अबार कुछ दिन पैली भी म्हारै घरै आयो थो । हाथ में वा वोटां री लिस्ट लैयोड़ी ही नै पुछ्तौ हो, बा सा हाल गाड़ी चाल री है ? थौरै घरै किनो नांव तो इन लिस्ट में नीं छूट्योड़ो है ? घर मे कोई नुवी बींदणी तो कोनी लाया ? कोई चालयो तो कोनी आपाणे अठै ? म्हारै तो की समझ कोनी पड़यौ मैं उने कै दियो भाया म्हारो छोरो अबार घरे कोनी साम रै आई जदै आपरै कनै मेल देवूं आप उनै पूछ लीजो जो भी पूछ्णो है ।
बासा वा वोटां की लिस्ट ही । वोटां की लिस्ट में लोगां का नाम जोड़न नो और काट्न नो काम अपारां माट साब ही करिया करे है ।
मगर बूढा फ़िर बोल पड़ा…
-          पण अबार दो महीने पैली फ़ैर माट साब घरै आया था । हाथ मांयै घणो मोटो कागद लियोड़ो हो । पण उण टैम तो की दूजी बातां ही पूछ्ता, उण टैम पूछ्ता घर कच्चो है कि पक्को है ? कित्ता टाबर है ? कित्ती बींदणियां हैं, घर में फ़्रीज है काईं, टीवी रेडियो है काईं ? मोटर साइकल है काईं  ? अबे म्हारै घर री थने कांई पंचायती ? म्है कदैई मास्टर रै घरै जावां कि थारै घरै कांई हो रियो है ? म्हनै तो कदैई कदैई लागै ओ मास्टर कोई खुफ़िया एजेंसी रो आदमी है ? ओ मास्टर कोनी कोई सी0आई0डी रो आदमी लागै म्हनै ।
एक और बूढे व्यक्ति ने समर्थन करते हुये कहा ……
-          हां काका एक बार मैं स्कूल गयो तो माड़ साब अपां रै गांव री हैंग ढाणियों रौ नजरी नक्शा बणावता……मैं खुद री आखियां सूं देखियो काका ।
अब तो सभी लोगों की फ़ुसफ़ुसाहट शुरु हो गयी ।
-          ऐक बात तो है माड़ साब कदैई भी अपाणै घरै आ जावे । कदैई किणी बहाने सूं कदैई किणी बहाने सूं ।
-          कदैई म्हाणै बेटी बेटियों रा नाम पूछे नै कदैई बींदणियों रो ?
-          कदैई पूछै घर में कुण जनमियो ?
-          कदैई पूछे कुण मरियो ?
-          कदैई घर रै मांई 6 साल री ऊमर रा टाबर रो पूछे नै कदैई घर रै सामान रो पुछै ?
-           कदैई पोलियो री दवा पावे नै कदैई कीड़ा री दवा देवे ?
-          अरे अबार छ: महीने पैली भी तो गांव में घूमता थैलो लियोड़ो । घर पुछ्ता किने घरै कित्ता जिनावर पालियोड़ा है ?
-          अबे थने जिनावर सूं कांई मतबल ? थारौ काम तौ स्कूल में टाबरां नै शिक्षा देवन रौ है ?
-          वाईज तो कोनी करै है ?
-          पण औ मास्टर ए दूजा दूजा काम कांई करै है ? साल भर अटी उटी रौवतौ फ़िरै है  चुपचाप स्कूल में बैठने पढ़ावै क्यूं नी ?
-          म्हनै तो पाकिस्तान रौ खुफ़िया एजेंट लागै है ?
-          पण अपाणी सरकार नै मास्टर री हरकतां रौ पतो कोनी लागे काईं ? इनै रोकै कूं नीं ।
पलंग पर बैठे रामू काका चुपचाप सारी वार्ता सुनकर और अपने गांव के लोगो के भोलपन पर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे ।
जैसे ही ग्रामीणो की चर्चा कुछ कम हुई सब ने काका की और प्रश्नवाचक निगाहों से देखा । मानो कह रहे हों काका अब एक आप ही हो जो इन शंकाओ का समाधान कर सकते हो ? काका भी आंखो ही आंखों में उन के इस भाव को मानो समझ गये थे । काका नेअपने ठ्ण्डे होते हुक्के का ऐक लम्बा सा कश खींचा और कहने लगे …
-          अरे मेरे भोले जीवों । सरकार को सब पता है मास्टर दिन भर क्या करता है और क्या नहीं । अरे ये सारे काम मास्टर से सरकार ही तो करवाती है ? पल्स पोलियो अभियान, मतदाता सूची का कार्य, लोकसभा चुनाव, विधान सभा चुनाव, पंच सरपंच चुनाव, मतगणना, जनगणना, पशुगणना वगैरह वगैरह्……मास्टर स्कूल में मास्टर भी है हैडमास्टर भी, मुन्शी भी है कुक भी, डाक्टर भी है गणक भी, नोडल अधिकारी और बूथ लेवल अधिकारी भी है और चपरासी भी, नजरी नक्शे बनाने वाला इन्जीनियर भी है और शौचालय बनवाने वाला ठेकेदार भी, इन्सानों को गिनने वाला जनगणक भी और पशुओं को गिनने वाला पशुगणक भी ।
मगर काका, नानू ने काका की बात बीच में काट्ते हुये कहा…।
-          मास्टर सारे काम करे अच्छी बात मगर अपना काम तो ढंग से नी करे ? उसमें उसकी मास्टर गिरी क्यूं खतम हो जावे ? म्हारो सोहन चौथी में आईग्यो पण हाल किताब पढनी नी आवे । टीचर सब काम करै अच्छी बात पण टीचर टीचराई कद करै ? कीकर करै ? ओ भी तो बतावो ?
काका ने हुक्के का लम्बा और आखरी कश लिया और पलंग से उठ खड़े हुये …………बिना कुछ बोले ।
शायद सभा का समय समाप्त हो गया था ………
शायद इस प्रश्न का उत्तर देना नहीं चाहते थे…………
शायद इस प्रश्न का उत्तर नहीं था उनके पास्…………
शायद कई पुरानी बात याद आ गई थी और ………… शायद,………शायद

شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...