शनिवार, 19 मार्च 2016

ILZAAM



ILZAAM
रामू काका गांव के सब से बुज़ुर्ग और पढे लिखे आदमी थे । दो बार पंच, तीन बार सरपंच और एक बार प्रधान रह चुके थे । रामू काका ने अपने सफ़र की शुरुआत तो सरकारी अध्यापक के रूप में की थी क्योंकि अध्यापन से उन्हें प्यार था मगर न जाने क्यों दो साल की सेवा के बाद अचानक उन्होंने त्यागपत्र दे दिया । काका के इस फ़ैसले से सभी चकित थे और घरवाले आगबगूला, मगर काका तो काका ठहरे अपने फ़ैसले पर रहे अडिंग । मगर काका ने  अपने पसंदीदा काम को अलविदा क्यों कह दिया ये प्रश्न आज तक अनुत्तरित ही रहा ।
                शाम की सुहानी ठंडी बयार चल रही थी और उसमें हुक्के के तम्बाकू की महक बसी हुई थी, रामू काका के हुक्के की तम्बाकू की सौन्धी सौन्धी महक, रामू काका घर के बाहर पलंग पर पालथी मार कर बैठे हैं एक हाथ मैं हुक्के की नली पकडे और दूसरे हाथ से पलंग की पट्टी पकडे हुए । हमेशा की तरह काका के सामने गांव के बुज़ुर्गों और नौजवानों की एक टोली बैठी थी जो शाम के समय गपशप और गांव की खैर खबर के साथ साथ अपनी थकन उतारने के लिये इस चौपाल पर इकट्ठे होते हैं । वक्त गुज़ारी के लिये इस तरह की महफ़िलें गांवों की ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा हैं यहां के लोग डेली सोप नही देखते बल्कि वास्तविक ज़िन्दगी के अफ़साने और घटनायें यहां “डिस्कस” करते हैं, खबरों के लिये यहां ख़बर बेचने वाले सैकडों ख़बरिया चैनलों की खूबसूरत और मेक अप से सजी धजी न्यूज़ पढती कन्याओं और “लाईव” बहस के तमाशों की कोई जगह नहीं है बल्कि चौपाल पर ही ये सारे काम निपटा दिये जाते हैं, चौपाल पर ही सब से वास्तविक “ओपीनियन पोल” पेश किये जाते हैं और यहीं बहुत सी समस्याओं को चर्चा करके शांतिपूर्वक तरीके से हल भी कर लिया जाता है । सभी लोग बातचीत में मगन थे कि तभी रामू काका ने अपने हुक्के की नली से एक नौजवान की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा –
-          अरे दीना तेरा लड़का दिन भर मारा मारा फ़िरता है छ: बरस का हो गया है उसे स्कूल में काहे नहीं बिठाता ?
दीना हाथ जोड कर बोला -  काका स्कुलां में आजकल फ़ीस घणी ज्यादा लागे, नै म्हारा अबार दिणमाण भी थोडा खराब चाल रिया है ----अबै इत्ता सब पीसा कठै सूं लावूं ?
रामू काका  -  अरै गैला, सरकारी स्कूल रे मांये भेजन री बात कैवूं हूं । प्राइवेट अपां रै बस री बात कौनी पण सरकारी में तो भर्ती करा सके है उठै फ़ीस भी कौनी लागे ने किताबां भी मुफ़त में दैवे है ।
दीना  -  पण काका फ़ारम का पीसा लेवेगा वा माड़साब ?
भीड़ में से ऐक नौजवान राजू दीना को समझाते हुए बोला -  अरे दीना काका वठै जावो तो सरी उठै हैंग फ़िरी है कोई पया कोनी लागे ।
दीना -  ठीक है काका काले ही जावूंला ।
फ़िर कुछ सोचकर बोला -  मगर काका म्हारे छोरे रा जनम रा तो कागद की हैई कोनी । ने म्हने तो उण री जनम री तारीख़ भी याद कोनी नै…इससे पहले कि दीना अपना सवाल पूरा करता रामू काका किसी अन्तर्यामी बाबा की तरह बीच में ही बोल पडे…
-          अरे दीना तू केवल अपने छोरे ने लै ने स्कूल जा बाकी जनम-वनम की तारीख़ स्कूल का मास्टर साब हैंग “सेट” कर देवेला ।
दीना ने स्वीकृति में सिर हिलाया, जैसे उसने सब समझ लिया हो और फ़ैसला कर लिया हो । मगर फ़िर उसकी खोपडी में एक सवाल कौन्धा और वो सिर खुजाता हुआ बोल पडा-
पण काका मेरा छोरा बहुत बदमाश है स्कूल में मन ना लगा तो भाग छूटेगा ।
राजेश मूछड़ बोला – अरे दीना एक बार तेरे छोरे को नाम स्कूल में लिखीज गयो समझ अबे तूं फ़िरी । अब तेरे छोरे की तुझ से ज्यादा फ़िकर वो मास्टर ने करनी पड़ेला ।
पण मूछ्ड़ सा,  छोरो स्कूल कूद गयो तो मास्टर तो उनो नाम काट देवेला ? दीना ने एक और सवाल दाग़ दिया ।
अबकी बार रामू काका उलझते हुए बोले – अरे दीना, मास्टर की क्या शामत आई है जो तेरे छोरे को नाम काट दे ? सरकार उसकी नाक काट देगी ।
मूछ्ड़ ने बात को स्पष्ट करते हुये कहा –
-          दीना काका,  वा की नौकरी ही आईज है । तेरा छोरा स्कूल नी जावेला तो मास्टर उने खुद पकड़ ने लेन जावेला  । एक बार नाम स्कूल में लिखीज गयो अबे मास्टर साब रा चाचा भी उनो नाम नी काट सके । नाम काटे तो जवाब देते नीं बणे । इण वास्ते तू तो बेफ़िकर स्कूल जा ने नाम लिखा अबे खुद रौ दिमाग़ मत लगा ।
 भीड़ के आखिरी छोर पे बैठा एक मनचला लड़का चिल्लाया –
-          काका स्कूल में खाणो भी खिलावै है माड़साब ।
मूछड़ सा फ़िर बोले – काका स्कूल में खाणो तो बणे है पण कदैइ कदैइ तो टाबरां री तबियत धापे उनु पैली ही खाणो खुट जावै । म्हनै लागे स्कूल रो मुंशी की गपागप करै है ? की तो ईलम करै है ?
काका ने हुक्के का एक लम्बा कश लिया मानो एक लम्बी आह भर रहे हों – गुड़ गुड़ – गुड़ गुड़  और फ़िर धीरे से धुआं छोड़ते हुए और अपनी मूछों को अंगूठे और उंगली से अपने ऊपरी होंन्ठों से हटाते हुये धीरे से मुस्कुराये और बोले ……
-          राजेश, स्कूल में मुन्शी कद होया ? गेला । स्कूल रौ मुंशी तो मास्टर ही है । गेहूं, चावल रौ स्टाक, सब्ज़ी और मसालों की खरीद, पकाने का हिसाब किताब, बैंक खाता और बही सब मास्टर ही करै है ।
“ जणै स्कूल में जिका माड़साब है वै मास्टर है के मुंशी है ? “ गोलू ने अचानक सवाल दाग़ा ।
अरे भाई मास्टर तो मास्टर ही रैवेला । खाने पीने का इन्तेजाम करने और पैसों का हिसाब किताब रखने से मुंशी थोड़े ही बन जायेगा । और फिर स्कूल में भोजन का इन्तेज़ाम भी तो वो ही करता है तो क्या उसे हलवाई भी कहने लगें ? और सुबह विधालय खोलते ही साफ़ सफ़ाई भी करता है तो क्या इससे वो चपरासी हो गया ? टांके के पानी और विधालय के शौचालयों की साफ़ सफ़ाई कराने का भार भी उसी पर है तो क्या उसे हरिजन कहें ?
काका का जवाब सुनकर सब गोलू की तरफ़ देखने लगे मानों आखों ही आखों में कह रहे हों “ कैसा बेवकूफ़ लड़का है ? “
रामू काका ने एक बार फ़िर हुक्का गुड़गुड़ाया फ़िर बोले –
-          और अब तो सुना है सरकार ने मास्टर को एक और नई ज़िम्मेदारी दी है कि वो सुबह के समय गांव की पगड्ण्डी से  सुबह सुबह जंगल और खेतों में शौच जाने वाले लोगों पर नज़र भी रखेगा ताकि गांव के लोगों को शर्मिन्दा करके उन्हें घर में शौचालय बनाने के लिये प्रेरित कर सके ।
-          जैसे ही रामू काका ने अपना आखरी जुमला पूरा किया मजमे में बैठै बहुत सारे लोगों के मुंह खुले रह गये । कुछ की हंसी निकल पड़ी ।
-           छोटू  की आंखो के आगे तो तुरंत अपने मास्टर साहब की फ़िल्म चलने लगी । सुबह का समय है, ठ्न्डी ठ्न्डी हवा चल रही है और मास्टर साहब पगडंडी पर खड़े हुये हैं । उनकी काली काली मोटी मोटी आंखे, हाथ में लौटा लिये हुये शौच करने जाते हुये, गांव के हर बच्चे, पुरुष और महिलाओं को चश्में से घूर घूर कर देख रहीं हैं, उन्हें शर्मिन्दा कर रहीं हैं …… मास्टर साब सब को शर्मिन्दा कर रहे हैं । वाह ये भी क्या नौकरी है । शर्मिन्दा करने की । उस ने मन ही मन मास्टर बनने की ठान ली थी । और फ़िर पता नहीं क्या क्या सोचकर वो मुस्कुराने लगा और फ़िर धीरे धीरे उसकी मुस्कुराह्ट हंसी में बदलने लगी ।
 मगर तभी रामू काका की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया । काका श्यामू से पूछ रहे थे –
अरे श्यामू तेरे लड़के की तबीयत अब कैसी है ? डाक्टर ने क्या बताया ? उसकी हड्डियां  क्यों दर्द करतीं हैं ?
काका ने सवालों के ढेर लगा दिये थे । श्यामा बोला –
-          काका कल उसे  अस्पताल दिखाया था । डाक्ट्र साब कह रहे थे कैल्सियम की कमी से ये सब चक्क्र है । लड़की को भी दिखाया था वो भी कमज़ोर है उसे आयरन की गोलियां दी हैं । काका डाक्ट्र कह रहा था कि बच्चे कौन से स्कूल जाते हैं ? मैं ने कहा अपने गांव के सरकारी स्कूल जाते हैं तो कहने लगा सब मास्ट्र साब की ही गलती है अगर वो सही समय पर तेरे बच्चों को आयरन कैल्सियम की खुराक दे देता तो तुझे अस्पताल न आना पड़ता । उसकी शिकायत सरपंच से ज़रूर करना । मगर काका दवा देने का काम तो डाक्टर का है । इस में बापड़े वा मास्टर का क्या दोष ? मैं भला उसकी शिकायत क्यूं करुं ?
श्यामा की बात सुनकर सभी को हैरत भी हुई और डाक्टर पर गुस्सा भी आया मगर सब काका के उत्तर की प्रतीक्षा में चुप थे ।
काका बोले – श्यामा सरकारी स्कूल में पढ्ने वाले सभी बच्चों के स्वास्थय की जांच और उस का रिकार्ड रखने का काम भी सरकारी स्कूल के मास्टर साहब को करना पड़ता है । सभी बच्चों की लम्बाई, वज़न, पोषण कुपोषण की स्थिति का रजिस्टर बनाना पड़ता है इसके अलावा साल में निर्धारित अवधि में, समय समय पर टिट्नेस का टीका लगवाना, विटामिन ए की खुराक, आयरन कैल्शियम और पेट के कीड़े मारने की दवा देने का काम भी मास्टर साब ही करते है ?
श्यामा सर खुजाता हुआ बोला ……
-          काका सरकारी स्कूल में नहीं सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र में कहिये । काका लगता है आप पर भी अब उमर का असर होने लगा है ?
काका अपनी ऐनक ठीक करते हुये बोले ।
-          अरे श्यामा मैं तो साठे में भी पाठा हूं मगर तेरे मगज में ही भूसा भरा है । तेरा इसमें कोई कसूर भी नहीं तेरे बाप ने तुझे स्कूल भेजा होता बचपन में तो ऐसी बातें न करता ।
मगर हकीकत तो यह थी कि ये संशय सिर्फ़ श्यामा का ही नहीं था बल्कि हुजूम में बैठे तकरीबन हर उस छोटे बड़े का था जो विधालय कभी नहीं गया था ।
काका ने फ़िर कहा –
-          ये सभी दवाईयां स्कूल में ही दी जाती हैं और मास्टर साब ही ये दवाईयां देते हैं ।
सभी लोग हैरत से काका की तरफ़ देख रहे थे मानो कह रहे हों काका तुम सचमुच में सठिया गये हो , मान लो इस बात को ।
तभी भीड़ में से एक आवाज न जाने कहां से आई ……
-          अरे काका दवाई देने वाला डाक्टर स्कूल में नहीं होता वो तो अस्पताल में होता है । स्कूल में मास्टर होता है…………मास्टर
काका ने अपनी ऐनक से झांक कर मजमें में चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाईं । मगर सवाल करने वाला नज़र नहीं आया तो उन्होंने अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया……
-          अरे लाला तू कभी स्कूल नहीं गया तभी तो ऐसी बात करता है । अरे स्कूल में दवाई देने का काम अपणा मास्टर साब ही करे है ।
  तभी कालूराम चिल्ला कर बोला ……
-          अरे भाईलोगां काका ठीक फ़रमावे है मास्टर ही डाक्टर है । याद करो साल में किती बार अपाणे घरां आया करै, पल्स पोलियो रो डिब्बो खांधे माथे टांगियोड़ो नै ऐक हाथ मांय पोलियो री दवा ने दूजे हाथ मांये जाडो पैन लियोड़ो । ऐक हाथ सूं दवा पावे ने दूजे हाथ सूं टाबर रै हाथ री आंगली माथे निसान दिरावै । अरे जूं वोट देवा पछे अपाणा हाथां री उंगली माथे लागिया करै है निसान, सेम टू सेम ।
हां हां ठीक कैवे कालु म्हारै घरै भी आया, म्हारै भी आया………
अब लोगों को यकीन हो गया मास्टर डाक्टर रौ काम भी करै है । मगर अभी लोगो की चर्चा थमती कि भीड़ में से एक बूढ़ा आदमी धीरे धीरे बोला ……
-          काका मास्टर तो अबार कुछ दिन पैली भी म्हारै घरै आयो थो । हाथ में वा वोटां री लिस्ट लैयोड़ी ही नै पुछ्तौ हो, बा सा हाल गाड़ी चाल री है ? थौरै घरै किनो नांव तो इन लिस्ट में नीं छूट्योड़ो है ? घर मे कोई नुवी बींदणी तो कोनी लाया ? कोई चालयो तो कोनी आपाणे अठै ? म्हारै तो की समझ कोनी पड़यौ मैं उने कै दियो भाया म्हारो छोरो अबार घरे कोनी साम रै आई जदै आपरै कनै मेल देवूं आप उनै पूछ लीजो जो भी पूछ्णो है ।
बासा वा वोटां की लिस्ट ही । वोटां की लिस्ट में लोगां का नाम जोड़न नो और काट्न नो काम अपारां माट साब ही करिया करे है ।
मगर बूढा फ़िर बोल पड़ा…
-          पण अबार दो महीने पैली फ़ैर माट साब घरै आया था । हाथ मांयै घणो मोटो कागद लियोड़ो हो । पण उण टैम तो की दूजी बातां ही पूछ्ता, उण टैम पूछ्ता घर कच्चो है कि पक्को है ? कित्ता टाबर है ? कित्ती बींदणियां हैं, घर में फ़्रीज है काईं, टीवी रेडियो है काईं ? मोटर साइकल है काईं  ? अबे म्हारै घर री थने कांई पंचायती ? म्है कदैई मास्टर रै घरै जावां कि थारै घरै कांई हो रियो है ? म्हनै तो कदैई कदैई लागै ओ मास्टर कोई खुफ़िया एजेंसी रो आदमी है ? ओ मास्टर कोनी कोई सी0आई0डी रो आदमी लागै म्हनै ।
एक और बूढे व्यक्ति ने समर्थन करते हुये कहा ……
-          हां काका एक बार मैं स्कूल गयो तो माड़ साब अपां रै गांव री हैंग ढाणियों रौ नजरी नक्शा बणावता……मैं खुद री आखियां सूं देखियो काका ।
अब तो सभी लोगों की फ़ुसफ़ुसाहट शुरु हो गयी ।
-          ऐक बात तो है माड़ साब कदैई भी अपाणै घरै आ जावे । कदैई किणी बहाने सूं कदैई किणी बहाने सूं ।
-          कदैई म्हाणै बेटी बेटियों रा नाम पूछे नै कदैई बींदणियों रो ?
-          कदैई पूछै घर में कुण जनमियो ?
-          कदैई पूछे कुण मरियो ?
-          कदैई घर रै मांई 6 साल री ऊमर रा टाबर रो पूछे नै कदैई घर रै सामान रो पुछै ?
-           कदैई पोलियो री दवा पावे नै कदैई कीड़ा री दवा देवे ?
-          अरे अबार छ: महीने पैली भी तो गांव में घूमता थैलो लियोड़ो । घर पुछ्ता किने घरै कित्ता जिनावर पालियोड़ा है ?
-          अबे थने जिनावर सूं कांई मतबल ? थारौ काम तौ स्कूल में टाबरां नै शिक्षा देवन रौ है ?
-          वाईज तो कोनी करै है ?
-          पण औ मास्टर ए दूजा दूजा काम कांई करै है ? साल भर अटी उटी रौवतौ फ़िरै है  चुपचाप स्कूल में बैठने पढ़ावै क्यूं नी ?
-          म्हनै तो पाकिस्तान रौ खुफ़िया एजेंट लागै है ?
-          पण अपाणी सरकार नै मास्टर री हरकतां रौ पतो कोनी लागे काईं ? इनै रोकै कूं नीं ।
पलंग पर बैठे रामू काका चुपचाप सारी वार्ता सुनकर और अपने गांव के लोगो के भोलपन पर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे ।
जैसे ही ग्रामीणो की चर्चा कुछ कम हुई सब ने काका की और प्रश्नवाचक निगाहों से देखा । मानो कह रहे हों काका अब एक आप ही हो जो इन शंकाओ का समाधान कर सकते हो ? काका भी आंखो ही आंखों में उन के इस भाव को मानो समझ गये थे । काका नेअपने ठ्ण्डे होते हुक्के का ऐक लम्बा सा कश खींचा और कहने लगे …
-          अरे मेरे भोले जीवों । सरकार को सब पता है मास्टर दिन भर क्या करता है और क्या नहीं । अरे ये सारे काम मास्टर से सरकार ही तो करवाती है ? पल्स पोलियो अभियान, मतदाता सूची का कार्य, लोकसभा चुनाव, विधान सभा चुनाव, पंच सरपंच चुनाव, मतगणना, जनगणना, पशुगणना वगैरह वगैरह्……मास्टर स्कूल में मास्टर भी है हैडमास्टर भी, मुन्शी भी है कुक भी, डाक्टर भी है गणक भी, नोडल अधिकारी और बूथ लेवल अधिकारी भी है और चपरासी भी, नजरी नक्शे बनाने वाला इन्जीनियर भी है और शौचालय बनवाने वाला ठेकेदार भी, इन्सानों को गिनने वाला जनगणक भी और पशुओं को गिनने वाला पशुगणक भी ।
मगर काका, नानू ने काका की बात बीच में काट्ते हुये कहा…।
-          मास्टर सारे काम करे अच्छी बात मगर अपना काम तो ढंग से नी करे ? उसमें उसकी मास्टर गिरी क्यूं खतम हो जावे ? म्हारो सोहन चौथी में आईग्यो पण हाल किताब पढनी नी आवे । टीचर सब काम करै अच्छी बात पण टीचर टीचराई कद करै ? कीकर करै ? ओ भी तो बतावो ?
काका ने हुक्के का लम्बा और आखरी कश लिया और पलंग से उठ खड़े हुये …………बिना कुछ बोले ।
शायद सभा का समय समाप्त हो गया था ………
शायद इस प्रश्न का उत्तर देना नहीं चाहते थे…………
शायद इस प्रश्न का उत्तर नहीं था उनके पास्…………
शायद कई पुरानी बात याद आ गई थी और ………… शायद,………शायद

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شاعر

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