शुक्रवार, 24 जून 2016

उर्दू है जिसका नाम

उर्दू है जिसका नाम
पूरे मुल्क के साथ साथ राजस्थान के राजकीय विधालयों में प्रारम्भिक स्तर पर उर्दू भाषा का शिक्षण आज़ादी के बाद से ही किया जाता रहा है । मिडिल, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर भी छात्र छात्रायें वर्षों से इसका एच्छिक विषय के रूप में अध्ययन करते  रहे  हैं । पिछले दो वर्षों में, जब से राज्य में बीजेपी की सरकार आई है, न जाने क्यों उर्दू ज़बान उन की नज़र में खटकने लगी है बल्कि बात यही तक सीमित होती तो भी इतनी तकलीफ़ न होती अब तो राज्य के शिक्षामन्त्री जी उर्दू ज़बान को जड़मूल से उखाड़ फ़ेंकने को प्रतिबद्व प्रतीत होने लगे हैं और मुख्यमन्त्री महोदया जो समय समय पर उर्दू अशआर पढ़ने के लिये प्रसिद्व हैं , उनकी मौन सहमति इसमें स्पष्ट दिखाई दे रही है ।
          इस बात के स्पष्ट प्रमाण सर्वप्रथम उस समय देखने को मिले जब स्कूल शिक्षा की नवीन पाठयपुस्तकें छप कर आईं । इन पुस्तकों से तमाम मुस्लिम लेखकों के पाठ और कविताओं आदि का विलोपन ही नहीं किया गया बल्कि ऐसे हिन्दु विद्वानों की पाठय सामग्री पर भी वज्रपात किया गया जिन्होने अपनी कविताओं, कहानियों या आलेखों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किया था । इसके बाद आरपीएससी परीक्षा पास कर, चयनित उर्दू शिक्षको की पोस्टिंग जानबूझ कर रोकने की कोशिश की गई, सेकेण्ड ग्रेड भर्ती में उर्दू के पद 300 से घटाकर 29 कर दिये गये, उर्दू डीपीसी में चयनित अध्यापको को दूरस्थ स्थानो पर लगाया गया यहां तक कि शहर में पद रिक्त होते हुये भी महिला अभ्यार्थियों को 200 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षैत्रों में पदस्थापित किया गया और उनकी परिवेदना तक नही ली गई जिसकी वजह से उन्हे पदौन्नत्ति परित्याग करना पड़ा । जोधपुर ज़िले के लगभग समस्त पदौन्नत उर्दू शिक्षको को पदौन्नति का परित्याग करना पड़ा । और अब हद तो तब हो गई जब शिक्षामन्त्री ने प्राथमिक स्तर पर उर्दू को पूरी तरह से बन्द करने की घोषणा कर दी है तथा उर्दू के स्वीकत पदों को समाप्त कर दिया है साथ ही उर्दू अध्यापको का जबरन नियमविरुद्व विषय परिवर्तन कर उन्हे दूसरे विषयों का अध्यापन कराने के लिये बाध्य किया जा रहे है । ऐसा ही मामला इससे पूर्व प्रकाश में आया था जब कोटा बूंदी के उर्दू अध्यापाको के स्थानान्तरण, सस्कत के पदों पर कर दिये गये थे । ये समस्त तथ्य इस बात कि और इगिंत कर रहे हैं कि शिक्षामत्री और राज्य की सरकार लोक कल्याणकारी न होकर अल्पसंख्यक विरोधी सरकार की भांति कार्य कर रही है जो कि न सिर्फ़ इस देश के सविधान की आत्मा के विरुद्व है बल्कि अलौकतांत्रिक है ।    
शिक्षामंत्री जी को शायद ग़लतफ़हमी हो गई है कि उर्दू मुसलमानो की भाषा है या मुसलमान इसे कहीं विदेश से हिन्दुस्तान में लेकर आये हैं । उन्हें शायद याद नहीं रहा कि ये इसी देश की बेटी है और इसी देश का गौरव भी । वो शायद ये भूल गये है कि इस देश की आज़ादी में जिस भाषा का और में कहूंगा सिर्फ़ और सिर्फ़ जिस भाषा का योगदान है वो उर्दू ही है । जन्गे आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के विरोध का तमामतर दारोमदार इसी ज़बान पर था सारे अख़बार, पम्फ़लेट, ख़तो-किताबत और इन्कलाब ज़िन्दाबाद जैसे नारे इसी जबान में थे । वीर क्रान्तिकारी चाहे शहीदे आज़म भगत सिंह हों या शहीद बिस्मिल इसी ज़बान में अपना संदेश देते हुये इस दुनिया से रुख्सत हुये ।
          सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
          देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
ये उर्दू ही है जनाब, और हमारी राज्य की मुखिया जो “ हौसलों की उड़ान” भरती हैं वो भी उर्दू ही है जनाब ।
          आप शायद ये भी भूल रहे है कि उर्दू वाले जिन्हे अपना पहला अफ़साना निगार मानते हैं वो मुसलमान नही हैं जी उनका नाम है मुंशी प्रेमचंद । और किरशन चन्द्र का भी तो आपने नाम सुना होगा । और राजस्थान के शीन काफ़ निज़ाम से भी तो आप वाकिफ़ होगें जिन्हे सारी इज्जत और शोहरत उर्दू और उर्दू वालों से ही मिली । सम्पूर्ण सिंह कालरा, शायद ही कोई इन्हे इस नाम से जानता होगा । जी हां में बात कर रहा हूं गुलज़ार साहब की । गुलज़ार, कौन नहीं जानता ये नाम । और फ़िल्म इण्डस्ट्री की सारी तथाकथित हिन्दी फ़िल्में जिनमे सारे डायलाग और सारे गाने उर्दू में ही होते हैं । जनाब कहां कहां से मिटाओगे इस देश की बेटी को ?  अगर उर्दू को मिटाना ही आपका उद्देशय है तो फ़िर आप याद रखें आप के इन इकदामात से उर्दू मिटेगी तो नहीं बल्कि उसमें एक नई ज़िन्दगी, नई रूह ज़रूर पैदा हो जायेगी और इसकी शुरुआत हो भी चुकी है जो पूरे राजस्थान में देखी जा सकती है । इस लिहाज़ से उर्दू वाले आप के हमेशा मशकूर रहेंगे कि आप के इन इकदामात की बदौलत उर्दू वाले न सिर्फ़ मुत्तहिद होने लगे हैं बल्कि इस ज़बान की शौहरत में और इज़ाफ़ा हो रहा है । रही बात इसे मिटाने की तो जो ज़बान लोगों के दिलों में बसती है उसे मिटाना तो दूर उसका बाल भी बांका करना किसी के बस में नहीं । 
         
                    उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़
                   सारे जहां में  धूम  हमारी ज़बा की  है
          यहां कुछ तथ्यात्मक बिन्दुओं की ओर भी नज़र डालनी ज़रुरी है जो इस राज्य की शिक्षण व्यवस्था के सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
गुजराल कमेटी की रिपोर्ट और शिक्षाविदों की राय स्पष्ट रूप से कहती है कि बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा उनकी मादरी ज़बान में ही दी जानी चाहिये, साथ ही संविधान के विभिन्न अनुच्छेद विशेष रूप से अनुच्छेद 350 ए में भी इसकी स्पष्ट विवेचना की गई है यही वजह है कि देश भर के अलपसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों के राजकीय विधालयों में प्राथमिक स्तर पर उर्दू भाषा के माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था की गई है । राजस्थान में भी उर्दू माध्यम के रूप में और उर्दू तीसरी भाषा के रूप में दशकों से पढ़ाई जाती रही है । यही वजह है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में जो कि शिक्षा की ऐतबार से अत्यंत पिछड़ा है शिक्षा के प्रति जागरुकता आई है । उर्दू शिक्षण के कारण  –
1-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान राजकीय विधालयों की प्रति बढ़ा है ।
2-     विधालय से वंचित बालक बालिकाओं (जिनमे सर्वाधिक प्रतिशत अलपसंख्यक और एससी, एसटी ब्च्चों का है) में अल्पसंख्यक समुदाय के बालक बालिका का प्रवेश दर में इज़ाफ़ा हुआ है।
3-       अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे जो कि सर्वाधिक संख्या में ड्रापआउट होते थे और शिक्षाविभाग की सबसे बड़ी समस्या थे, इसमें कमी आई है ।
4-     अल्पसंख्यक समुदाय का रुझान सदैव मदरसा शिक्षा की ओर रहा है जिसकी मुख्य वजह मदरसों में उर्दू माध्यम से शिक्षण की व्यवस्था है परन्तु राजकीय विधालयों में उर्दू खुलने से उनका रुझान इन विधालयों की तरफ़ बढ़ा है कयोकि मदरसे की अपेक्षा बच्चा यहां दूसरे विषयों का अध्ययन भी कर पाता है ।
5-     वर्तमान में राजकीय विधालयों में अध्ययनरत बच्चों में अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं का प्रतिशत अधिक है इसका मुख्य कारण विधालय में उर्दू अध्यापक का नियुक्त होना है । अपने समुदाय या अपनी मातभाषा का अध्यापक नियुक्त होने से अभिभावकों और छात्राओं को एक प्रकार का मानसिक सम्बल प्राप्त होता है और वो विधालय के महौल के साथ तारतम्य आसानी से बिठा पाते हैं साथ ही उन्हें भरोसा रहता  है । जिस कारण वो बच्चियों को विधालय भेजने का साहस कर पाते हैं । 
                    यदि प्राथमिक विधालयो से उर्दू समाप्त की जाती है तो ये कदम न केवल असंवैधानिक होगा जिसको कोर्ट में चेलेन्ज किया जा सकता है बल्कि अलौकतांत्रिक और राज्य सरकार के लिये अलौकप्रिय भी साबित होगा । परन्तु इसका सब से बड़ा दुष्प्रभाव राज्य की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ेगा । इस कदम से न केवल बड़ी संख्या में बालक बालिकाओं का ड्राप आउट होगा बल्कि जदीद तालीम छोड़कर बच्चे पुन: मदरसों का रुख कर लेंगे । बालिका शिक्षा के लिये तो ये कदम बड़ा घातक सिद्व होने वाला है । इसके अतिरिक्त अल्पसख्यक और पिछ्ड़े समुदाय के लिये ये रोज़गार का एक बड़ा ज़रिया साबित हुआ था जिसके कारण इन तबकों में शिक्षा की अलख जगी थी उस पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे । सार ये है कि ये फ़ैसला किसी भी प्रकार से समुदाय, राज्य या पार्टी के हित में नहीं है । इससे केवल अहित होगा । सब का अहित । अत: इस सम्बन्ध में सभी पक्षों को पुन: गम्भीरता से विचार करना चाहिये ।
                                                                                                अकमल नईम
                                                                                      जी सैक्टर, प्रताप नगर, जोधपुर  
                                                                                      मो0     9413844624

      

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