रविवार, 22 अप्रैल 2018

संवादहीनता


संवादहीनता (21/04/18)
जितेन्द्र और राधा की ये अरेंन्जड मेरिज थी । शादी से पहले वो न एक दूसरे को जानते थे और न ही कभी मिले थे । जितेन्द्र की बस एक यही ख्वाहिश थी कि उसकी होने वाली पत्नी पढ़ी लिखी और कामकाजी महिला हो और उसकी माता ने उसकी पसंद के मुताबिक ही राधा को उसका जीवन साथी बनाया था । शादी को एक वर्ष ही हुआ था कि उसकी माता का देहान्त हो गया । अब घर में बस दो ही सदस्य थे एक राधा दूसरा जितेन्द्र । शादी के एक साल बाद भी दोनों एक दूसरे को न समझ पाये थे । समझ पाना तो दूर अभी एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे, न एक दूसरे की पसंद नापसंद, न एक दूसरे की आदतें । वजह ? वजह साफ़ थी दोनों ही नौकरी पेशा थे । जितेंन्द्र जो सुबह 9 बजे दफ़्तर के लिये निकलता तो रात को 9 बजे तक ही लौट पाता था वहीं राधा भी 10 बजे निकल कर 6 बजे तक लौटती थी और फिर दिनभर की थकन के साथ अगले दिन की फ़िक्र ने उन्हें कभी मौका ही नहीं दिया, फ़ुर्सत के उस वक्त का जिसे अक्सर लोग अग्रेज़ी में अक्सर “क्वालिटी टाईम” कहते हैं । यही वजह है कि वो पति पत्नी का रिश्ता निभा रहे थे लेकिन उनमें इस रिश्ते की वो गर्माहट नहीं थी जो होनी चाहिये थी ।
      माता के देहान्त के बाद हालात बिगड़ने लगे क्योंकि माताजी घर पर रहतीं थी तो राधा के घर के कामों में सहयोग करतीं थीं परन्तु अब घर के सारे कामों का बोझ भी राधा के कंधों पर ही था । धीरे धीरे उसने जितेन्द्र से कहना शुरु किया कि जितेन्द्र आप भी घर के कामों में थोड़ा हाथ बटाया कीजिये मुझसे अकेले सारे काम नहीं हो सकते । जितेन्द्र की भी राधा से बहुत सी अपेक्षायें थीं मगर वो अपने मुंह से कुछ नहीं कहता था । ये पुरुषों का स्वभाव होता है कि वो अपनी ख्वाहिशों का इज़हार शब्दों से नहीं करना चाहते वो चाहते हैं कि उनका जीवन साथी उनके मन की बात को इशारों में समझे । मगर इसके लिये एक दूसरे की परस्पर समझ और समय भी तो दरकार है जो दोनों के पास था ही नहीं । इन बातों को लेकर दोनों में हल्की नोक झोंक होने लगी और जो थोड़ा बहुत सामान्य रिश्ता था वो भी बिगड़ने लगा । कहते हैं बातचीत करने से बड़ी से बड़ी समस्या भी हल हो जाती है मगर इन दोनों के केस में संवादहीनता ने कोढ़ में खाज का काम किया । दोनों एक दूसरे के साथ रहते तो थे मगर अजनबियों की तरह ।
        बहरहाल दिल को बहलाने के लिये जितेंन्द्र ने फ़ेसबुक का सहारा लिया । उसने अपने निकनेम “जाय” के नाम से फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल बनाई और आफ़िस में मिलने वाले खाली समय में फ़ेसबुक से दिल बहलाने लगा । उसने अपनी प्रोफ़ाईल पिक्चर में अपने पसंदीदा एक्टर जितेन्द्र की तस्वीर लगा रखी थी । फ़ेसबुक पर उसकी दोस्ती उसके ही शहर दिल्ली की रहने वाली “निम्मी” से हो गई । निम्मी और जितेन्द्र की दोस्ती बढ़ने लगी । वक्त मिलते ही आफ़िस में बैठकर दोनो चैट किया करते थे ।
निम्मी – जाय, तुम्हें कौन सा रग पसंद है  ?
जाय - मुझे तो हल्का ब्लू कलर और वो भी ब्लू कलर का कुर्ता पाजामा बहुत पसंद है । बेहतरीन रंग और कंफ़र्टेबल ड्रेस । क्या कहती हो ।
निम्मी – क्या बात है यार ! मुझे भी ब्लू कलर पसंद है । और मर्दों पर कुर्ता पाजामा एकदम राजसी लगता है ।
जाय ने पूछा – अच्छा बताओ तुम्हें परफ़्यूम कौन सा पसंद है ? लड़कों वाले या लड़कियों वाले ? अरे ! मज़ाक कर रहा था ।
निम्मी – मुझे परफ़्यूम की जगह गुलाब का इत्र पसंद है ।
जाय ने आश्चर्य से पूछा – क्या सचमुच ! मुझे भी यही पसंद है । गुलाब की भीनी भीनी खुश्बु वाला इत्र ।
बस कब वक्त इन्हीं बातों में गुज़र जाता पता ही नहीं चलता । आफ़िस का लंच खत्म तो चैटिंग खत्म । फिर अगले दिन ही बात हो पाती थी और अगर आफ़िस में काम ज्यादा होता था तो दो तीन दिन चैट नहीं हो पाती थी ।
इस अरसे मैं उन्होंने जाना कि दोनों की आदतें, हाबीज़, मिज़ाज और पसंद –नापसंद में बहुत समानता थी ।
दोनो को ऐसा लगने लगता था कि जैसे वो दोनों एक दूसरे के लिये ही बने हों ।
निम्मी इस बात से अन्जान थी कि जितेन्द्र शादीशुदा है । इस बात की चर्चा भी कभी दोनों के बीच हुई नहीं थी । दिन गुज़रते गये दोनों की दोस्ती प्रगाढ़ होती गई । जितेंन्द्र को लगने लगा शायद उसने शादी करने में जल्दबाज़ी कर दी या फ़िर उसे सिर्फ़ मां के भरोसे पर शादी नहीं करनी चाहिये थी हालांकि वो जानता था कि दुनिया में अगर कोई उसे सबसे अच्छी तरह से समझता है तो वो केवल मां ही है और उसका चुनाव कभी ग़लत हो नहीं सकता । मगर अब क्या किया जा सकता था ।
निम्मी को ब्लैक काफ़ी बहुत पसंद थी और जितेन्द्र को भी । एक दिन निम्मी ने जितेन्द्र को कनाट प्लेस के काफ़ी हाउस में मिलने की रिक्वेस्ट भेजी । निम्मी ने लिखा “कल सण्डे है क्यों न हम दोनो अपनी पसंदीदा काफ़ी का एक साथ लुत्फ़ उठाने के लिये काफ़ी हाउस में मिलें”
जितेन्द्र ने पूछा – किस वक्त  ?
निम्मी ने जवाब दिया – कल 11 बजे  ?
जितेन्द्र ने लिखा – लेकिन अचानक ये प्रोग्राम क्यों ?
निम्मी ने जवाब दिया – अरे भाई 6 महीने से जिस अन्जान शख्स से दिन भर बातें करती रहती हूं जिसकी सारी आदतें और हाबीज़ मेरी जैसी हैं उससे मिलना और उसकी सूरत देखना तो बनता है न ? है कि न ?
जितेन्द्र कुछ पल के लिये कुछ जवाब न दे पाया ।
निम्मी ने वापिस लिखा – क्या बात जाय साहब ?  कोई प्राब्लम है ?
जितेन्द्र एक सभ्य, ईमानदार और समझदार लड़का था और वो नहीं चाहता था कि निम्मी किसी ग़लत फ़हमी का शिकार हो कर उससे कुछ ऐसी उम्मीदें बांध ले जिसकी वजह से उनकी दोस्ती में दरार आये या निम्मी के दिल को ठेस पहुंचे इसलिये उसने मुलाकात से पहले उसे सच बताने का फ़ैसला किया । अपने शादीशुदा होने का सच । एकबारगी तो उसे लगा कि कहीं ये सच जानकर निम्मी उससे नाराज़ न हो जाये लेकिन फिर उसने हिम्मत करके जवाब लिखा – निम्मी क्या तुम ये जानती हो मैं एक शादीशुदा लड़का हूं  ?
निम्मी ने बड़े ताज्जुब और जोश के साथ जवाब लिखा – अरे वाह  ! तो जनाब इंगेज्ड हैं ! बड़ी खुशकिस्मत लड़की होगी जो आपकी जीवनसंगिनी होगी ।
कुछ देर दोनो ओर शांति रही । फिर निम्मी का मैसेज आया – तो फिर कल का क्या प्लान है ? आ रहे हो 11 बजे ।
जितेन्द्र की कुछ समझ नहीं आ रहा था । निम्मी का रिऐक्शन उसे हैरान कर रहा था ।
निम्मी का फिर मैसेज आया – ओ माई डियर फ़्रैंड ! अगर मैडम का डर सता रहा है तो उन्हें भी साथ लेकर आना । हम भी तो देखें हमारे बेस्ट फ़्रेंड की ज़िन्दगी में कौन है ?
जितेन्द्र समझ चुका था कि निम्मी को ग़लत फ़हमी नहीं है, न ही उसके दिल में कोई दूसरा ख्याल है वो उसे एक अच्छा दोस्त मानती है बस । जितेन्द्र ने लिखा – ओके माई डियर फ़्रेंड कल आता हूं 11 बजे ।
कुछ देर बाद निम्मी का मैसेज फिर आया – टेबल नम्बर 21

अगले दिन सण्डे था और सण्डे को जितेन्द्र देर से ही उठता था । खिड़की से आती तेज़ धूप ने जैसे ही उसके गालों को झुलसाया उसकी आंख खुल गई । उसकी नज़र जैसे ही दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ़ पड़ी वो घबरा कर खड़ा हो गया और उसके मुंह से बेसाख़्ता निकला – ओ माई गाड ! साढ़े दस बज गये ! वो तेज़ी से कमरे से बाहर निकला और बाथरूम में घुस गया । बाथरूम से निकलते ही उसने बाई को आवाज़ लगाई । मोहिनी बाई ज़रा एक कप चाय तो पिला दो । मोहिनी उसे बाथरूम में जाते देख ही चाय तैयार कर चुकी इसलिये आवाज़ लगाते ही चाय के कप के साथ हाज़िर थी ।
राधा कहां है ? जितेन्द्र ने पुछा ।
वो किसी काम से बाहर गईं हैं । कहां गईं है मुझे नहीं पता लेकिन आप रात देर से आये थे और थके हुये थे इसलिये आपको उठाया नहीं था और मुझसे भी मना किया था कि साहब को न उठाना और कमरे की सफ़ाई तभी करना जब साहब उठ जायें ।
“अच्छा ठीक है ।” जितेन्द्र ने जवाब दिया और घर से कैफ़े के लिये निकल पड़ा ।
आज ड्राईव करते हुये उसे बड़ा अजीब सा आनन्द आ रहा था । आज वो हमेशा की तरह सुस्त, उखड़ा हुआ, परेशान और काम के बोझ का मारा हुआ नहीं था बल्कि अलमस्त, जोशीला और खुद को बहुत हल्का फ़ुल्का महसूस कर रहा था । आज उसे ये रास्ता बड़ा लम्बा महसूस हो रहा था । उसे फ़िक्र थी कि अगर वो वक्त पर न पहुंचा तो निम्मी क्या सोचेगी । उसका दिल अनजाने ख्यालात और जज्बात से लबरेज़, सीने में बिल्लियों की तरह अछल रहा था । खैर काफ़ी हाउस की पार्किंग में कार पार्क करके वो कैफ़े में दाखिल हुआ । चारों ओर नज़र दौड़ाई तो उसे टेबल नम्बर 21 नज़र आ गई । वो टेबल के करीब पहुंचा तो देखा टेबल पर किसी का हैंण्ड बैग रखा था लेकिन कुर्सी पर कोई नहीं था । उसने दूसरी कुर्सी सरकाई और बड़ी शालीनता से बैठ गया और इन्तेज़ार करने लगा ।
एक ऐसे दोस्त को देखने और उससे मिलने की जिज्ञासा अब चरम पर थी जो बिल्कुल उसके जैसी थी, जो उसी की तरह सोचती थी, उसी की तरह बिहेव करती थी जिसकी आदतें, जिसकी रूचियां, जिसके सपने, जिसकी ख्वाहिशें सभी कुछ उसके जैसी ही थीं । कभी कभी चैटिंग के दौरान उसे लगता था कि जैसे निम्मी और वो एक दूजे के लिये बने हैं । मगर ये सच नहीं था । और वो दिल ही दिल में सोचता था काश ये सच होता !
वो अपने ख्यालों में गुम था कि सामने की कुर्सी पर कोई आकर रुका और उसने अपने पर्स को उठाया और कुर्सी पर बैठने लगा । दोनों की नज़रें मिलीं और हैरत से खुली रह गईं । दोनों के मुंह से एक साथ निकला – तुम यहां ?
जितेन्द्र ने देखा वो राधा थी और राधा ने देखा वो जितेंन्द्र था ।
तुम यहां कैसे जितेन्द्र ?  राधा ने पूछा । जवाब सुनने से पहले ही उसने सवालों की बौछार कर दी थी -
और वो भी काफ़ी हाउस में ?
तुम्हें भी काफ़ी पसंद है  ?
तुमने कभी बताया ही नहीं ?
और तुम ब्लू कुर्ते पाजामे में ?
और तुमने गुलाब का इत्र लगाया है ? वन आफ़ माई फ़ेवरेट फ़्रेगरेंस ! वाव
राधा के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं था ।
राजेश ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसने भी राधा की जानिब आश्चर्य से देखते हुये पूछा –
मगर तुम यहां कैसे ?
और फ़िर बिना रुके कई सवालात एक साथ कर डाले –
ब्लू साड़ी में ? तुम वाकई गार्जियस लग रही हो !
तुम्हारा इत्र भी तो गुलाब ही है ? हैं न ?
और अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो तुम भी इस टेबल नम्बर 21 पर काफ़ी का आनन्द लेने आई हो ।
दोनों बहुत खुश थे क्योंकि घरेलू संवादहीनता ने जिस “मेड आफ़ ईच अदर कपल” के बीच गहरी दीवार खड़ी कर रखी थी उसे सोशल मीडिया ने ध्वस्त कर दिया था ।
जितेन्द्र की आंखे नम हो गईं और दोनो हाथ बरबस अपनी मां की दुआ के लिये उठ गये । उसे आज अपनी मां की याद बहुत सता रही थी ।
अकमल नईम अकमल

“ध्यान रखना”


“ध्यान रखना”
बोर्ड परीक्षा का आज तीसरा दिन ही था । आज दसवीं कक्षा का गणित का पर्चा था । मुझे परीक्षा कक्ष में प्रश्न पत्र वितरित किये हुये दस मिनट ही हुये थे । विद्यालय का चपरासी मोहन परीक्षा कक्ष में बहुत विनम्रता और मोहक मुस्कान के साथ दाख़िल हुआ (मालूम रहे कि ऐसी विनम्रता चपरासियों की जमात में आम दिनों में आप को कभी देखने को नहीं मिलेगी और चेहरे पर मुस्कान की तो बात तो सोचकर ही चेहरे पर मुस्कान आ जायेगी ) और मुझसे पूछा – सब ठीक है सर ।
मैं ने कहा – हां सब ठीक है ।
फिर वो कक्ष में घूमता हुआ एक लड़की के पास पहुंचा और उस से खुसर फुसर करने लगा । मैं ने उसकी ओर मुखातिब हो कर तेज़ आवाज़ में कहा मोहन…………… नहीं………………
उसने कहा हां सर ………और उस लड्की के कंधे पर हाथ रख कर बोला – फ़िक्र मत कर सर बहुत अच्छे हैं । 
और फिर मेरे करीब आकर कहने लगा - सर ये मेरी भतीजी है मन्जु, ज़रा ध्यान रखना सर ।
मैं ने कुछ सवालिया और कुछ नाराज़गी भरी नज़रों से उसकी जानिब देखा और ख़ामोश रहा ।
मगर उसने शायद मेरी नाराज़गी को भांपा नहीं या फ़िर नज़रअंदाज़ करते हुये कहा – ठीक है सर । और फिर हाथ उठा कर मेरी तरफ़ करते हुये कक्ष से बाहर की तरफ़ चल दिया ।
अभी मोहन को गये दो मिनट ही हुये होंगे कि परीक्षा प्रभारी प्रहलाद सिंह जी कमरे में दाख़िल हुये । जैसा उनका नाम था, भारी भरकम, वैसी ही उनकी शख़्सियत भी थी । लम्बा तड़ंगा जिस्म, बड़ा सा गोल काला चेहरा, उस पर चेचक के दाग़ मानो चांद की धरती का ब्लैक एण्ड व्हाईट फोटो । इस पर बड़ी बड़ी काली मूंछे जिन्होंने होंठों के एरिये से निकल कर गालों के भी अच्छे ख़ासे एरिये पर अपना कब्ज़ा ऐसे ही जमा रखा था जैसे किसी चौपाटी पर गोल गप्पे, पाव भाजी और डोसा बेचने वाले जमा लेते हैं । आंख़ें एकदम लाल मानो कोयले की स्याह खान में दहकते हुये दो अंगारे । और काले तन पर सफ़ेद सूट । मगर जूते काले । अब जब हम उनकी जानिब देखते हैं तो ………ऊपर से काला चेहरा और नीचे से काले जूते मगर बीच से सारा सफ़ेद नज़र आते हैं । परीक्षा कक्ष में पहले से ही सन्नाटा था क्योंकि एक तो गणित का पेपर ऊपर से मेरी ड्युटी फिर जैसे ही प्रहलाद सिंह जी कमरे में दाख़िल हुये तो सन्नाटा और गहरा गया । सभी परीक्षार्थियों ने अपनी आंखे अपने पेपर और कापी में धंसा दीं । प्रहलाद सिंह ने आते ही कमरे का एक चक्कर लगाया जैसे जेलर जेल मैं लगाया करता है और बड़ी रौबीली आवाज़ में बोले – “आप सब ध्यान से सुन लें, मेरे रहते यहां इस सेन्टर पर किसी तरह की कोई नकल नहीं हो सकती इस लिये किसीके दिमाग़ में कोई ग़लत फ़हमी हो तो निकाल देना ।“
और फिर मुझ से मुख़ातिब होते हुये ज़ोर से बोले – “सर, अगर कोई गर्दन भी हिलाये तो आप उसका हाथ पकड कर क्लास से बाहर निकाल देना, बस ।“ फिर उन्होंने कई लडकों की तलाशी ली और जिस रौब और दबदबे के साथ कमरे में दाख़िल हुये थे उसी शान से बाहर `निकल गये । मैं भी रस्मी तौर पर कक्षा के दरवाज़े तक उन्हें छोड़ने आया । वो अभी कुछ दूर ही गये थे कि मेरी तरफ़ वापस पलटे और मेरा हाथ पकड़ कर, मुझे परीक्षा कक्ष से बाहर लाये और फिर कहने लगे मास्टर साहब , क्या रोल नम्बर 203256 इसी कमरे में है ?
मैं ने कहा - जी जनाब इसी कमरे में तीसरी लाईन में दूसरे नम्बर पर है ।
कहने लगे – मेरे टैक्सी ड्राईवर का लड़का है । इसका बाप बहुत ग़रीब है । पास हो जायेगा तो ठीक है । “थोड़ा ध्यान रखना” सर । ये कहा और बग़ैर मेरे उत्तर का इंतज़ार किये धड़धड़ाते हुये आगे निकल गये । जैसे जनशताब्दी ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकती है, एक मिनट के लिये, और ये जाने बग़ैर की सारे यात्री उतर गये हैं या नहीं, धड़धड़ाते हुये बेपरवही से आगे निकल जाती है । 
मैं कमरे में लौट आया । पड़ौस के कमरे से उनकी बुलंद आवाज़ आ रही थी “आप सब ध्यान से सुन लें, मेरे रहते यहां इस सेन्टर पर किसी तरह की कोई नकल नहीं हो सकती इस लिये किसी के दिमाग़ में कोई ग़लत फ़हमी हो तो निकाल देना ।“
मैं समझ नहीं पा रहा था कि “ध्यान रखना” का क्या मतलब है । पहले मोहन ने कहा और अब यही बात प्रहलाद सिंह कह कर गये कि मेरे परिचित का ध्यान रखना । मैं तो पूरी कक्षा का ध्यान रख रहा हूं कि कोई भी नकल ना करने पाये, और यही तो मेरी ड्यूटी है । अब मैं ने इन दोनो पर विशेष नज़र रखनी शुरू कर दी कि ये कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं कर रहे हैं ।
सेंटर बड़ा सेंसेटिव था इसलिये परीक्षा की वीडियोग्राफ़ी करवाने का भी आदेश था यही वजह थी कि वीडियोग़्राफ़र पूरे केंपस में घूम घूम कर परीक्षाकक्षों की वीडियोग्राफ़ी कर रहा था । वीडियोग्राफ़र 25-26 साल का एक नौजवान लड़का था । अभी पेपर शुरू हुये एक घण्टा हुआ था कि वीडियो ग्राफ़र मेरे कक्ष में आया और वीडियोग्राफ़ी करने लगा । उसने बारी बारी से चारों लाईनों की वीडियो बनाई फिर कैमरा बंद किया और मेरे पास आकर खड़ा हो गया । थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद मुझसे कहने लगा – सर आप कौन सा सब्जेक्ट पढाते है ?
मैं ने कहा – गणित और अंग्रेज़ी।
उसकी आंख़ों में चमक सी आ गई । फिर वो कुछ कह्ते कहते रुक गया । उसकी नज़रें पूरी क्लास में घूम रहीं थीं । फिर वो चहल कदमी करते हुये क्लास के आख़री छोर तक चला गया, उसकी चाल बता रही थी कि वो इस वक्त खुद को किसी उड़नदस्ते के अधिकारी से कम नहीं समझ रहा था । फिर वो अंतिम पंक्ति में बैठी एक लड़की की कापी में झांकने लगा । लड़की ने हल्के से तबस्सुम और जिज्ञासु नज़रों से उसकी तरफ़ देखा लड़के ने भी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराहट से दिया और लौटकर मेरे पास खड़ा हो गया । कुछ खामोशी के बाद फिर हिम्मत करके कहने लगा – आज का पेपर तो बहुत टफ़ आया है सर ।
मैं ने लापरवाही से कहा - अच्छा ।
कहने लगा – हां पर …… फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद मेरी ओर मुख़ातिब होकर कहने लगा –
सर वो लास्ट लाईन में जो लड़की बैठी है मेरी फ़ियांसी है । मैं ने बड़ी मुश्किल से जुगाड़ बिठा कर यहां की विडियोग्राफ़ी का कान्ट्रेक्ट लिया है ताकि इसकी कुछ मदद हो सके । आप सर्………………”थोड़ा ध्यान रखना” ………।
और फिर उत्तर की प्रतीक्षा किये बग़ैर , बड़े अदब से नमस्कार करके रवाना हो गया ।
बच्चों की छठी हिस बड़ी तेज़ होती है, वो समझ रहे थे कि रोज़ की तरह आज भी थोड़ी देर बाद ही वो खेल शुरु हो जायेगा जो रोज़ हुआ करता था मगर इन को पता नहीं था मैं किसी दूसरे खेत की मूली हूं । जैसे ही उन्होंने गर्दनें हिलाना और आंखें नचाना शुरु किया मैं ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया । कक्षा में जो थोड़ी बहुत हलचल शुरु हुई थी और जो एक उम्मीद की किरण चमकी थी वो मांद पड़ गई, एक बार फिर मायूसी भरी ख़ामोशी ओढ़ कर सारे परीक्षार्थी अपनी अपनी कापियों में खो गये ।
डेढ घन्टा गुज़र चुका था । क्लास में पूरी तरह सन्नाटा था । सामने से एक और चपरासी कमला बाई मुस्कुराती हुई मेरे कमरे की तरफ़ आ रही थी, कमरे के दरवाज़े पर आकर उसने गरमा गरम चाय का कप मेरे हाथ में थमाया और बिना भूमिका बांधे बोली ……………………”माड़ साब………“कुछ अंदर झांकते हुये और एक लड़के की तरह हाथ से इशारा करते हुये…………………………”वो चश्मे वाला लड़का मेरा पोता है………”
माड़ साब थोड़ा “ध्यान रखना” । 
और जैसे मुस्कुराती हुई आई थी वैसे ही मुस्कुराते हुये पलटी और आगे बढ़ गई। मैं समझा नहीं ये मुस्कुराहट रिश्वत में दी जा रही थी या गर्म चाय के बदले पोते का “ध्यान रखने” की मांग की जा रही थी । उधर दादी को देखते ही पोते की आंखों में भी वैसी ही चमक आ गई थी जैसी मोहन और परीक्षा प्रभारी को देखकर उन के परिचितों में इस से पहले आ चुकी थी । इन दोनों परिचितों ने कनखियों से दादी के पोते को देखा और फिर मेरा जायज़ा लिया कि देखते हैं अब क्या स्थिति बनती है ? 
पोते ने बड़े आत्मविश्वास और मुस्कुराहट के साथ एक नज़र मुझ पर डाली और फिर हिम्मत करके अपनी लम्बी सी गर्दन निकाल कर पड़ौसी की कापी में झांकने लगा । मगर मुझे कहां बर्दाश्त थी ग़ुस्से के मारे मेरी एक बार फिर चीख़ निकल पड़ी । 
अरे ओ मिस्टर …… दिमाग़ में ख़राबी है क्या ? ……परीक्षा हाल है कोई पब्लिक पार्क नहीं है । सीधे बैठो। 
पोते ने एक हिकारत भरी नज़र मुझ पर डाली और फिर अपनी झेंप मिटाने के लिये या फिर अपनी मायूसी कम करने के लिये अपना पैन मुंह में लेकर बड़ी अट्पटी नज़रों से छत की तरफ़ घूरने लगा । शायद ये इस बात का संकेत था कि हे परम पिता परमात्मा अब तेरा ही आसरा है । अब तो कोई करिश्मा दिखा ।
या शायद छ्त से घिस कर अपनी द्र्ष्टि को ऐसे ही पैना कर रहा था जैसे कसाई पत्थर से घिस कर अपनी छुरी तेज़ करता है, कुछ देर एकट्क छत पर “साधना” करने के बाद उसने अचानक अपनी गर्दन नीचे की और प्रश्न पत्र के पन्ने पलट्ने लगा मानो अभी अभी किसी प्रश्न के सम्बन्ध में कोई देव वाणी उस पर उतरी हो । बहुत देर पन्ने पलट्ने के बाद भी उसे वो प्रश्न नहीं मिला जिसका उत्तर उसे देव वाणी ने सुझाया था । शायद किसी एसे प्रश्न का उत्तर उसे प्रदान किया गया था जिसका प्रश्न ही इस प्रश्न पत्र में नहीं था । वाह री नियति ……!
कक्षा मे अधिकतर परीक्षार्थियों की स्थिति ऐसी ही थी मानो किसी अंग्रेज़ के सामने फ़ारसी का कोई निहायत अहम ख़त रखा हो और वो उसका मज़मून जानना चाहता तो हो मगर समझ नहीं पा रहा हो ।
चाय खत्म हुई थी कि रिलीवर महोदय, जो इसी स्कूल के टीचर थे आये और कहने लगे “ सर जाईये आप फ़्रेश हो आईये, मैं देखता हूं ।“
मैं ने कहा – नहीं, थैंक्स्……मैं परीक्षा कक्ष छोड़कर नहीं जाता हूं । जब तक परीक्षा समाप्त न हो जाये ।
कहने लगे - अरे सर , इतनी टेंशन क्यों लेते हो ? 
मैं ने कहा – टेंशन ? इसमें टेंशन की क्या बात ? ये तो ज़िम्मेदारी की बात है । 
उसने मेरे उत्तर पर ध्यान नहीं दिया,उसे लगा कि या तो मैं ये बात रस्मी तौर पर कह रहा हूं या फिर ये बात कोई बकवास थी । या फिर शायद मैं कोई झूठी बात कह रहा था।
फिर वो कक्षा में दाख़िल हुआ और फिर एक लड़के की टेबल के पास जाकर उसकी कापी में झांकने लगा …फिर उस से बोला – “क्या बात है ? कितने प्रश्न कर लिये ? कोई प्राब्लम हो तो सर से पूछ लेना, बड़े अच्छे सर हैं, ठीक है ।“ लड़के ने रिलीवर की तरफ़ ऐसी निगाहों से देखा मानो गाली देकर कह रहा हो ”अबे……… क्या पूछ लें और ये ……………… क्या बतायेगा लीचड़ ।“
रिलीवर साहब बड़े अदब से मेरे पास आये और बड़े अपनेपन से अपना हाथ मेरे कन्धे पर रख कर बोले – “सर भतीजा है ज़रा ध्यान रखना” और कमरे से निकल गये ।
क्लास के लड़के लड़कियों ने एक सेकेण्ड के लिये एक दूसरे की नज़रों में देखा और फिर नज़रें झुका लीं, मानो कह रहें हों “ध्यान रखना”, “ध्यान रखना” ध्यान ही तो रख रहा है, #$%&* गर्दन भी हिलाने नहीं दे रहा है । इससे ज्यादा और क्या ध्यान रखा जायेगा । 
क्लास में पिन ड्राप साइलेंस था । 
परीक्षार्थियों के चेहरों पर मायूसी थी और जब वो मेरी तरफ़ देखते थे तो उनकी आंखों में एक इल्तजा, एक गुज़ारिश साफ़ दिखाई पड़ती थी । उनके चेहरे की मायूसी और उनकी आंखों की खामोश इल्तिजा ने एक पल को मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि “राजेन्द्र सिंह तुम जो कर रहे हो वो ठीक नहीं । ये इन्सानियत तो नहीं है । इनकी मदद कर दोगे तो क्या बिगड़ जायेगा । थोड़ी ढील देने से अगर ये पास हो सकते हैं तो तुम्हारा क्या हर्ज है ?”
मगर मेरा फ़र्ज़ ? हमारी ड्यूटी ही क्लास में इस उद्देश्य से लगाई जाती है कि किसी तरह की नकल न हो । और फिर जिन बच्चों ने पूरे साल मेहनत की उनके साथ भी तो ये नाइंसाफ़ी होगी । और ढील देने से या नकल करा देने से इन बच्चों का भी तो नुकसान ही है ,जो बिना पढ़े आज पास हो जायेगा वो आगे भी इसी व्यवस्था की उम्मीद और इंतेज़ाम का प्रयास करेगा क्योंकि साल भर पढ़ाई की अपेक्षा ये आसान रास्ता है । फिर ऐसे डिग्रीधारी अयोग्य युवा क्या ख़ुद का और क्या देश का भला कर पायेंगे । 
मगर ये लटके हुये उदास चेहरे ? वो चेहरे जो पेपर शुरु होते ही तुम्हारी तरफ़ एक उम्मीद के साथ देख रहे हैं और पेपर खत्म होने तक देखते रहेंगे । और अगर तुमने मदद न की तो क्लास से बाहर निकलते ही तुम्हें किन किन सम्बोधनों से नवाज़ेंगे । जैसा हर साल तुम्हें नवाजा जाता है । उसका क्या ?
मगर फिर वो सारी व्यवस्था भी तो एक मेरी वजह से धराशाई हो जायेगी जिस के लिये विभाग ने इतनी कवायद और इतना धन खर्च किया । परीक्षा की तैयारियों से लेकर पेपर की सुरक्षा व्यवस्था तक की सारी व्यवस्थाएं, उनका क्या फ़ायदा ? क्या मैं उन सभी की धज्जियां उड़ा दूं ।
देखो दूसरे अध्यापकों को, बच्चे उन की कितनी तारीफ़ करते हैं, उन के क्लास में घुसते ही खुशी से उछल पड़ते है । और एक तुम हो । जिस क्लास में जाते हो सब के मुंह लटक जाते है । कनखियों से सब बातें करते हैं और कहते हैं आज तो गये, खड़ूस की ड्यूटी है । कोई तुम्हें थानेदार और लड़कियां तो तुम्हें यमराज ही कहती हैं । क्या है यह सब ? छोड़ क्यूं नहीं देते इसको ? क्यूं ज़माने में बदनाम बने फिरते हो ?
क्या मैं वाकई लीचड़ और खड़ूस हूं ? क्या मैं पत्थर दिल हूं ? मगर मैं तो हमेशा से, पूरे साल विधालय में, पूरी निष्ठा लगन और ईमानदारी से पढाता हूं । विषयवस्तु को समझाने और आसान बनाने के लिये हमेशा प्रयास करता हूं । फिर मेरे विधार्थी तो मेरा बहुत सम्मान करते हैं । 
तभी मेरी सोच का सिलसिला अचानक टूट गया क्योंकि परीक्षा केन्द्र के प्रिन्सिपल साहब निरीक्षण करते हुये मेरी कक्षा में दाख़िल हुये थे । वे छोटे कद के , दुबले पतले, खामोश तबियत मगर बड़े अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे । वो अपने अनुशासन और सख्त मिज़ाज के लिये कुख्यात थे । उन्होंने परीक्षा पूर्व मीटिंग में ही कह दिया था कि “मैं किसी प्रकार की भी अनुशासनहीनता और नकल को बर्दाश्त नहीं करूंगा । कोई भी परीक्षार्थी नकल की कोशिश करे तो आप मुझे बुलायें मैं तुरन्त उसके खिलाफ़ केस बनाउंगा इस में कोई रियायत नहीं होनी चाहिये ।“
प्रिन्सिपल साहब क्लास के बीचों बीच खड़े हो गये और अपनी पैनी नजर से सबका जायज़ा लेने लगे । फिर बुलंद आवाज़ में कहने लगे – “ चुपचाप अपना अपना काम कीजिये …… कोई इधर उधर भी नहीं देखेगा……… “
फिर मेरी तरफ़ मुखातिब होकर बोले – “सर , अच्छी तरह नज़र रखना कोई तांका झांकी भी करे तो कापी छीन लेना उसकी “
मैं ने स्वीकारोक्ति में गर्दन हिला दी । 
क्लास में सन्नाटा और गहरा गया ।
फ़िर वो उसी कड़क चाल के साथ पलटे जिस कड़क आवाज़ के साथ अभी बोल रहे थे और मेरे करीब आकर मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दरवाज़े के करीब लाकर बड़ी नरम आवाज़ में धीरे से कहने लगे – “तीसरी पक्ति में जो परीक्षार्थी बैठे हैं वो मेरे छोटे भाई की स्कूल के हैं, फिर समझाते हुये बोले अब सरकारी नौकरियां तो हैं नहीं इस लिये उसको प्राईवेट स्कूल खुलवा रखी है स्कूल का रिज़ल्ट अच्छा होगा तभी तो बच्चे एड्मिशन लेंगे न् । खैर आप थोड़ा “ध्यान रखना” ।“ और ये कह कर तेज़ी से अगले कक्ष में घुस गये और उन की वही रौबीली आवाज़ फ़िर से गूंजने लगी …………………
कोई नकल नहीं करेगा…………………
कापी छीन ली जायेगी…………………………

شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...