बुधवार, 2 जून 2021

परिवर्तन

 

 

परिवर्तन

एक ज़माना था जब टीवी पर एकता कपूर के सोप ऑपेराज़ की धूम हुआ करती थी हिन्दुस्तान की लडकियां और औरतें इन सीरियल्स के किरदारों के साथ हंसती थीं और रोती थीं मुझे आज भी याद है जब एक सीरियल में मिस्टर बजाज नाम का किरदार जब मर जाता है तो मेरे मोहल्ले की तमाम गलियाँ सूनी हो गईं थीं ऐसा लगता था कि मोहल्ले के किसी बहुत ही रसूखदार आदमी की मौत हो गई हो ।

मुझे नहीं पता लोगों को इन सीरियल्स में क्या मज़ा आता था । मुझे तो ये सारे सीरियल्स वाहियात लगते थे क्योंकि ये सब अतार्किकता और अतिरेक से लबरेज़ थे । आपको भी शायद याद होगा शूम.......शूम........शूम........... और जू..............जू,,,,,,,,,,,,,,, करके एक ही सीन में, एक ही डायलाग पर कैमरे की रेंज में खड़े सारे पात्रों के चहरे और उनके अजीब अजीब से हाव भाव बार बार दिखाए जाते थे । यक़ीनन ये सब ओपेरा को लंबा खींचने के लिए किया जाता था । यहाँ तक तो पचाया जा सकता था मगर एक क़दम आगे बढ़ कर बल्कि मैं तो कहूँगा कई क़दम आगे बढ़ कर, ये सीरियल्स ऎसी ऎसी घटनाएँ दिखाया करते थे कि कभी कभी ज्ञान विज्ञान और अपने सामान्य ज्ञान पर भी शक होने लगता था । मिसाल के तौर पर सीरियल का कोई भी पात्र अचानक मर जाता था लेकिन कुछ समय बाद वो कुछ स्पष्टीकरण या किसी दलील के साथ ज़िंदा हो जाया करता था दलील भी ऎसी कि जिसको सुनकर हँसी निकल जाए, कभी भी किसी पात्र की शक्ल प्लास्टिक सर्जरी से एक झटके में ऎसी बदल दी जाती थी कि कल तक जो व्यक्ति आमिर खान जैसी शक्ल वाला नज़र आता था वो आज अचानक शाहरुख खान जैसा नज़र आने लगता था । मुझे लगता है अगर किसी यूरोपियन मुल्क के किसी डाक्टर या प्लास्टिक सर्जन ने इनमें से कोई सीरियल देखा होगा तो ज़रूर भारत के इन प्लास्टिक सर्जनों से  मिलने और इनसे ट्रेनिंग लेने की सोची होगी इसी तरह इन सीरियल्स के सारे पुरुष पात्र दब्बू, डरपोक और औरतों के हाथों की कठपुतली हुआ करते थे, उनमें ना तो रत्ती भर अक्ल थी ना समझ । और महिला पात्रों की बात तो क्या करें उनके सामने तो दाउद इब्राहीम और छोटा राजन भी पानी भरते थे ।

बहरहाल मैं आपको बता रहा था कि उन दिनों जब मैं अपनी श्रीमती जी से थोड़ी देर ख़बरें देखने की रिक्वेस्ट करते हुए रिमोट मांग लेता था तो ग़ज़ब ही हो जाता था मेरी जीवन संगिनी अपनी लाल लाल अंगारा आँखों के साथ मेरी ओर ऐसे देखा करती थीं मानो अभी मुझे जलाकर भस्म ही कर डालेंगी । लेकिन फिर भी वो मुझसे बहुत प्रेम करती थीं इसलिए ये कहते हुए कि “पता नहीं क्या हर वक़्त ख़बरें, समाचार, खबरें, समाचार करते रहते हैं लो पकड़ो देखो समाचार ! तुम्हारी कोई ख़बर नहीं आने वाली समाचार में................... सुबह पढ़ तो लेते हो अख़बार................ और क्यामालूम करना चाहते हो तुम दुनिया के बारे में ? क्या मालूम कैसे झेलते हो तुम ? बोर नहीं होते तुम समाचार देखकर ? ..................” सिर्फ़ ये ही नहीं इसी तरह की बहुत सी सलावातें सुनाने के बाद गुस्से दमकते हुए चेहरे और दहकती हुई आँखों से मुझे घूरते हुए रिमोट को मेरी ओर उछाल देती थीं । मैं इस मामले में थोड़ा प्रेक्टिकल हूँ । दिमाग़ में कोई गलत फहमी नहीं रखता इसलिए श्रीमती जी से बहस करने के बजाय ख़ामोशी के साथ रिमोट कैच करके समाचार देखना शुरू कर देता था । और वैसे भी उन दिनों मात्र 1 घंटे के ही समाचार आते थे और इतने समय में देश और पूरी दुनिया का सारा हाल दिखा जाया करते थे । आजकल की तरह 24 घंटे की चिल्ल पौ उस दौर में नहीं थी । खैर श्रीमती जी रिमोट उछालकर फुंफकारती हुई कमरे से निकला जाया करती थीं और हम शान्ति से समाचारों की दुनिया में लीन हो जाया करते थे ।

            अब मैं आपको फ्लैश बैक से वापिस वर्त्तमान में लाता हूँ । आज स्थिति उल्टी हो गई है अब श्रीमती जी जब फुरसत मिले तब समाचार चैनल लगाकर टीवी के सामने बैठी रहतीं हैं । अब उन्हें एकता कपूर के डेली सोप वाला आनंद इन समाचार चैनलों पर आने लगा है । ब्रेकिंग न्यूज़, हम तो पूछेंगे, इनसे पूछेंगे, उनसे पूछेंगे, हिन्दुस्तान पूछता है, जवाब देना होगा, उनकी अदालत, सच क्या है, पोल खोल दूँगा, जिहादी कौन, राष्ट्रवादी कौन, गरमा गरम बहस, आग लगा देंगे, बर्फ जमा देंगे, कान फाड़ देंगे, होश उड़ा देंगे, अक्ल ठिकाने लगा देंगे ......वगैरह वगैरह । ये सब प्रोग्राम एकता कपूर के डेली सोप का एक्सटेंडेड वर्शन बन गए हैं जो दर्शकों का भरपूर मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि अपने खुफिया एजेंडे की परवरिश भी कर रहे होते हैं । खैर हमारी स्थिति अब भी वही है, मैं अब भी रिमोट मांगता हूँ  मगर परिवर्तन इतना हुआ है कि अब श्रीमती जी को ख़बरों के चैनल देखने का शौक हो चला है (जिनमें ख़बरें कहीं नहीं होंती लेकिन सीरियल्स वाला मसाला और रोमांच भरपूर होता है) और मैं थोड़ी देर के लिए कोई हल्का फुल्का सीरियल या कॉमेडी शो देखने के लिए रिमोट मांगता हूँ । श्रीमती जी का वही रिएक्शन अब भी आता है और मैं अब भी प्रतिकार नहीं करता । वो अब भी रिमोट मेरी गोद में फैंक दिया करती हैं लेकिन ये कहते हुये “पता नहीं आजकल क्या टीवी सीरियल का नशा चढ़ गया है ? पहले समाचार समाचार करते थे अब ना खुद देखते हैं ना मुझे देखने देते हैं .................... अब क्यूँ नहीं देखते समाचार ......... अब टीवी सीरियल क्यूँ अच्छे लगने लगे हैं ? पहले तो दुनिया भर की चिढ़ थी सीरियल्स से........... ? अब क्या हुआ........ ?” मगर मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मैं इस मामले में थोड़ा प्रेक्टिकल हूँ । दिमाग़ मैं अब भी कोई ग़लतफहमी नहीं रखता हूँ इसलिए चुप रहता हूँ । अब मैं श्रीमती जी से क्या कहूँ कि समाचार अब सीरियल की तरह हो गए हैं इसलिए मैं इन्हें देखकर क्या करूं ? इनमें खबरें कहाँ हैं ? इनमे नफ़रत है, लड़ाई है, साजिशें हैं, झूठ है ......... और ये सीरियल्स की तरह अतार्किकता, अवैज्ञानिकता और जिहालत से भरे हुए हैं । बहस के नाम पर टीवी एंकर मुर्गा लड़ाने वालों की तरह तथाकथित नेताओं, धर्म के ठेकेदारों और राष्ट्रवादियों को लड़ाता रहता है और जनता आनंदित होती रहती है । झूठे वीडियो क्लिप्स दिखाए जाते हैं, झूठी मनगढ़ंत बातें दिखाई जाती हैं जिन सबका एक ही उद्देश्य है सनसनी पैदा करना । जी हाँ ! सनसनी ! क्या हुआ कुछ याद आ गया क्या ? नहीं ! चलो खैर ! मैं कहा रहा था कि इन न्यूज़ चैनल्स यानि मीडिया हाउसेज़ का एक ही मूल मन्त्र है सनसनी पैदा करना । सनसनी टीआरपी लाती है और यही टीआरपी धन बरसाती है । और असल देशभक्ति, असल राष्ट्रवाद इसी धन में छिपा है ।            

غزل

 بدنام مجھ کو کرنے دشمن یہ سب وطن کے   

کچھ لوگ تیرتے ہیں گنگا میں لاش بن کے

سازش میں تھے جو شامل اور تھے خزاں کے حامی

اب منتظم ہوئے.ہیں وہ ہی میرے چمن کے

تم نے ہوا کی شہہ پر سب راکھ میں ملایا

تم سب چراغ تو تھے میری ہی انجمن کے

تشہیر کر رہے ہیں نفرت کی وہ جمن میں

کہتے تھے خود کو حامی اور داعی جو امن کے

پیار اور الفتوں کے گاتے تھے جو ترانے

جانے کہاں گئے وہ پنچھی میرے صحن کے

تو بھیج دے خدایا ابر بہار اب تو

گزریں گے دن یہ کیسے مولا بھری گھٹن کے

چارہ گروں سے کہہ دو آ جائیں اب خدارا

زخموں سے چور اکمل اعضاء ہیں سب بدن کے


मंगलवार, 11 मई 2021

कोरोना नहीं डर है असल दुश्मन

 कोरोना नहीं डर है असल दुश्मन

आज पूरे देश में एक ही शब्द रात और दिन सुनाई पड़ता है ....कोरोना ....कोरोना....और  कोरोना । ये अब तक लाखों लोगों की जान ले चुका है । मानव सभ्यता के लिए बड़ा विनाशकारी साबित हुआ है ये कोरोना । लेकिन मौत के इस सन्नाटे के बीच, कोरोना की भयावहता के बीच, एक महत्वपूर्ण तथ्य है जिस पर गौर किया जाना ज़रूरी है और वो ये है कि इस में कोई शक नहीं कि कोरोना एक खतरनाक बीमारी है लेकिन कोरोना के साथ जब दहशत शामिल हो जाती है तो ये ज़्यादा जानलेवा हो जाता है । ये एक LETHAL COMBINATION बन जाता है ।

            आज मुल्क में लोग कोरोना की बजाय इसकी दहशत से ज़्यादा दम तोड़ रहे हैं । आप अगर आंकड़ों को बगौर देखेंगे तो पायेंगे जहां रोजाना लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं वहीं लाखों लोग स्वस्थ भी हो रहे हैं । मरने वालों का आंकड़ा अगर देखें तो वो स्वस्थ होने वाले व्यक्तियों की तुलना में बहुत कम है । इसलिए मैं कह रहा हूँ कि दरअसल कोरोना इतना घातक नहीं है जितना कोरोना और दहशत का सम्मिश्रण ।

            आपने ऎसी कई घटनाएँ पढी होंगीं जिनमें कई व्यक्तियों ने संक्रमित पाये जाने पर और कई लोगों ने तो संक्रमित ना होने की स्थिति में भी दहशत और डर की वजह से आत्महत्या कर ली । अब आप सोचिये हमारे देश में दहशत का क्या आलम है । ये दहशत ही है जो आज ऐसे ऐसे मंज़र दिखा रही है कि जिसकी कल्पना भी हमने पहले कभी नहीं की थी । आज परिवार के ही लोग अपने ही परिवार के किसी सदस्य की कोरोना से मौत हो जाने पर उसका अंतिम संस्कार तक करने से कतरा रहे हैं । क्या हमने इसकी कभी कल्पना की थी ? इससे ज़्यादा डर और दहशत का आलम क्या हो सकता है कि आप अपने प्रिय को अपने ही खून को यूं नज़र अंदाज़ कर दें और इतना नज़र अंदाज़ कर दें कि उसके अंतिम संस्कार से ही कन्नी काटने लगें  ?

            अब यहाँ सवाल ये उठता है कि आख़िर इस डर और दहशत का ज़िम्मेदार कौन है ? इसके सबसे बड़े ज़िम्मेदार हैं हमारे न्यूज़ चैनल्स ! जी हाँ ! आप कभी भी, कोई भी न्यूज़ चैनल खोल लीजिये, आपको हर न्यूज़ एंकर स्क्रीन पर चीख चीख कर कोरोना की भयावहता की क्रूर से क्रूरतम ख़बर पढ़ते हुए और विचलित कर देने वाली तस्वीरें दिखाते हुए ही नज़र आयेगा । हर एंकर सुबह शाम, रात दिन कोरोना से संक्रमित होने वाले लोगों के आंकड़ों और मरने वालों की तादाद के साथ आपको डराने के लिए तैयार रहता है । हर न्यूज़ चैनल पर आपको लाशों से भरे कब्रिस्तान, जलती बुझती चिताएं, चीखते चिल्लाते मरीज़, चरमराती अस्पताल की व्यवस्थायें और आक्सीजन की कमी से दम तोड़ते लोग बस यही सब कुछ दिखाया जाता है तो ऐसे में आप भला डरेंगें नहीं तो क्या करेंगे ? यही भयावह दृश्य 24 घंटे दिखाए जाते हैं । हर दिन न्यूज़ एंकर नए संक्रमित होने वाले लाखों लोगों के आंकड़े बताता है और चीख चीख कर मरने वाले लोगों की तादाद का ऐलान करता है । जब 24 घंटे, बार बार आप सिर्फ़ बिलखते, सिसकते लोगों की तस्वीरें और धधकते हुए शमशान देखेंगे तो क्या आपके अंतर्मन में डर और दहशत गहरी पैठ नहीं जमा लेंगें ।

            आप टीवी को बेशक बंद करके इस समस्या से निजात पा सकते हैं मगर मोबाइल का क्या करेंगे । हर 10 सैकेंड के बाद अपने मोबाइल का स्टेटस चैक करने वाले हम लोग मोबाइल से कैसे बचेंगे ? फेसबुक, व्हाट्स एप, ट्विटर कुछ भी खोलिए आपको यहाँ भी कोरोना कोरोना मिलेगा । यहाँ भी यही ट्रेंड कर रहा है । हालांकि यहाँ कुछ पॉजिटिव चीजें भी हैं लेकिन उनकी तादाद कम है । आप इसे भी बंद कर दीजिये अखबार उठा लीजिये । हर अखबार के पहले पेज पर बड़े बड़े अक्षरों में कोरोना के संक्रमितों की तादाद और मरने वालों के आंकड़े ही लिखे मिलेंगे । आगे बढ़ेंगे तो शोक सन्देश से भरा पेज मिलेगा जो दुनिया से रुखसत हो चुके लोगों की तस्वीरों और शोक संदेशों से भरा मिलेगा । अब आप खुद सोचिये ऐसे में ना चाहते हुए भी क्या आपके दिल में एक डर, खौफ़ और दहशत की लहर नहीं उठेगी ?

            क्या आपको अब भी नहीं लगता कि ये टीवी, मोबाइल और अखबार के ज़रिये आपको और हमें लगातार डराया नहीं जा रहा है ? महज़ टीआरपी की खातिर । महज़ इसलिए कि सनसनी टीआरपी लाती है ...............

और टीआरपी पैसा ..................

क्या आप भूल गए अब तक चलने वाली हिन्दू मुस्लिम बहसें ! इन मीडिया हाउसेज़ को ना देश की एकता और अखण्डता की चिंता है और ना आपकी और मेरी जान की । इनका एक ही लक्ष्य है सनसनी पैदा करके पैसा कमाना । खैर छोड़िये इस बात को इसमें नया कुछ नहीं है । असल बात ये है कि अब हमें क्या करना है ? हालांकि करना तो इन लोगों को भी चाहिए था । इन्हें चाहिये था कि रोजाना संक्रमण से मुक्त होने वाले लाखों लोगों के आंकड़ों को प्रमुखता से दिखाते, कोरोना से मरने वालों के आंकड़े चीख चीख कर बताने की बजाय कोरोना से जंग जीतने वाले लोगों को टीवी पर लाते, उनका इंटरव्यू करते, लोगों को दिखाते और बताते कि देखिये कोरोना से जीता जा सकता है । डरिये नहीं, दहशत मत खाइए ... बेशक एहतियात कीजिए । मगर अफ़सोस ऐसा है नहीं ....... तो अब आपको क्या करना चाहिए ...............क्यूंकि अब यही एक रास्ता है कि आप कुछ करें ताकि आप और आपका परिवार सुरक्षित रह सके । हम कुछ काम कर सकते हैं जैसे –

·                  सबसे पहले तो ये डराने और दहशत पैदा करने वाले न्यूज़ चैनल देखना बिलकुल बंद कर दें । ये संक्रमितों और मरने वालों के आंकड़े आपको और हमें कुछ फ़ायदा देने वाले नहीं हैं ।

·                  अखबार और सोशल मीडिया से भी एक हद तक या तो दूरी बना लीजिये या फिर संभल कर इनका इस्तेमाल कीजिए।

·                  अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिताइए बिलकुल वैसे ही जैसे टीवी और मोबाइल के आने से पहले गुज़ारा करते थे ।

·                  अच्छी किताबें पढ़िए ।

·                  एहतियात ज़रूर कीजिए । बेवजह और बार बार घर से बाहर ना जाइए ।

·                  यदि घर का कोई सदस्य संक्रमित हो जाए तो उसे आइसोलेट किया जाना ज़रूरी है लेकिन इस प्रक्रिया में ये ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि ये आइसोलेशन महज़ शारीरिक दूरी मात्र के रूप में होना चाहिए भावनात्मक रूप से ऐसे समय में आपको मरीज़ के ज्यादा करीब हो जाना चाहिए ताकि उस बीमार व्यक्ति का मनोबल उंचा बना रहे । याद रखें ज़रा सी भी निगेटिविटी मरीज़ के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकती है ।

·                  आप खुद संक्रमित हो जाएँ तो घबराएं नहीं हौसला रखें । शुरुआती स्टेज में ही अगर आप इलाज शुरू कर देंगे और एहतियात रखेंगे तो शुरुआती पांच दिन यानि पहली स्टेज में ही आप कोरोना से छुटकारा हासिल कर लेंगे । लाखों लोग इसी स्टेज में रोजाना ठीक हो रहे हैं । अगर ऐसा ना भी हो और आपका संक्रमण किसी कारणवश बढ़ जाए तो भी घबराएं नहीं । काबिल डॉक्टर से संपर्क में रहें । झोलाछाप डॉक्टर और व्हाटसएप यूनिवर्सिटी से दूर रहें ।

·                  मैं आपको बता दूँ रोजाना लाखों संक्रमित लोग घर पर ही ठीक हो रहे हैं । लेकिन अगर आपने लापरवाही की या आप घबरा गए, दहशत में आ गए और आपने अपना आत्मविश्वास ज़रा भी कम किया तो याद रखें इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं । इस बीमारी को दूसरी बीमारीयों की तरह ही लीजिये । याद रखिये डर और दहशत ही लोगों की जान ले रहे हैं ।

·                  बहुत से लोग फेंफडों के संक्रमण से नहीं मर रहे हैं बल्कि दहशत में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे है । हालांकि ये भी सच है कि नए कोरोना के वैरिएंट के साथ ये नया बदलाव आया है कि संक्रमित व्यक्ति का खून गाढा होने लगता है जिससे रक्त वाहिनियों में रक्त का थक्का जमने का खतरा बना रहता है जो हार्ट अटैक की वजह बन सकता है लेकिन याद रखें आपके डॉक्टर समझदार हैं और अपडेट भी इसीलिए वो आपके उपचार के दौरान इस समस्या को भी दृष्टिगत रखते हैं । मेरे साथ भी ऐसा ही है । मुझे भी खून का थक्का बन्ने से रोकने वाली दवा एहतियात के तौर पर दी गई है । मैं भी हाल ही मैं ख़ुदा के फ़ज़ल से कोरोना से जंग जीता हूँ । मैं ने डॉक्टर को दिखाने में देर की लिहाजा तीसरी स्टेज में दाखिल हुआ, मेरा आक्सीजन सैचुरेशन कम हो चुका था, मैं बोल भी नहीं सकता था, सांस लेने में दिक्क़त शुरू हो गई थी लेकिन मैं ख़ुदा का शुक्रगुज़ार हूँ कि उसने मेरे दिल मैं कभी डर और दहशत या किसी नेगेटिविटी को आने ही नहीं दिया एक पल के लिए भी नहीं । मुझे उसकी ज़ात पर पूरा भरोसा था। मेरा सीटी स्कोर हाई था लेकिन मुझे यक़ीन था कि मैं वापसी करूंगा क्यूंकि मुझे अभी बहुत से काम करने हैं । और मेरा ये यक़ीन सच साबित हुआ । मैं लौट आया । (यहाँ मैं उन सभी लोगों का शुक्रिया अदा करना नहीं भूलूंगा जिन्होंने मेरे लिए रात दिन दुआएं कीं साथ ही मेरे डॉक्टर और मेरे दो पड़ौसी नौजवान सरफ़राज़ और नौशाद जिन्होंने घर पर ही मेरा ट्रीटमेंट शुरू किया और मेरे भाई के दोस्त गय्यूर जो दिन भर की मशक्क़त के बाद मेरे लिए आख़िर आक्सीजन सिलेंडर लाने में कामयाब हुए)

·                  मैं पिछले एक डेढ़ साल से टीवी की ये सनसनीखेज़ न्यूज़ नहीं देखता हूँ, अखबार भी रेगुलर नहीं पढ़ रहा हूँ क्योंकि मैं पिछले वर्ष इसके दुष्परिणामों से रूबरू हो चुका हूँ इसलिए अब सचेत हूँ । यक़ीन करें ये नेगेटिव ख़बरें हमें अन्दर से बहुत कमज़ोर और खोखला कर रही हैं खुदारा वक़्त रहते इनसे किनारा कीजिए ।

बहरहाल सारांश ये है कि हमें घबराना नहीं है बल्कि हालात का डटकर मुकाबला करना है पूरी ताक़त और पोज़िटिविटी के साथ । हम ज़रूर कामयाब होंगे लेकिन शर्त वही है डर और दहशत को करीब भी नहीं आने देना है क्योंकि डर और दहशत इंसान को कमज़ोर और बुजदिल बनाते हैं । डर सिर्फ़ मौत लाता है और कुछ नहीं आपको गब्बर का वो डायलाग तो याद ही होगा .....................जो डर गया समझो मर गया ................................

यानि आप समझ गए होंगे कि .......................... डर के आगे जीत है ...........................

 

                                                                                                                                                                                                                                                                                                अकमल नईम सिद्दीक़ी 

सोमवार, 10 मई 2021

मुक्ति

 

मुक्ति

 

मैं शहर के एक निजी अस्पताल में बेड पर पड़ा हुआ था  । मेरी नाक पर आक्सीजन मास्क लगा हुआ था । बेड की बग़ल में रखा हुआ टी वी नुमा मानीटर जो कुछ देर पहले अपनी चिरपरिचित गति के साथ टू टू की आवाज़ कर रहा था अचानक बेक़ाबू सा होने लगा। ऐसा लगता था कि उसकी सामान्य चलने वाली धड़कन अचानक बहुत बढ़ सी गई थी । टू टू टू टू ......... 

नर्स और डाक्टर भागते  हुए मेरे बेड के पास आ चुके थे। डाक्टर ने अचानक ज़ोर ज़ोर से मेरे सीने को दबाना शुरू कर दिया था मगर मानीटर से आने वाली आव़ाज की गति कम होने के बजाय बढ़ती जा रही थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे मेरी धड़कनें कम होती जा रही थीं मशीन की धड़कने बढ़ती जा रही थीं। फिर अचानक मॉनिटर पर ऊपर नीचे नाचने वाली लाइनों का ग्राफ शांत हो कर एक लाइन में तब्दील हो गया । मशीन की धड़कन भी शांत होकर एक समवेत बीप की आवाज़ में बदल गई थी।

            डॉक्टर ने निराशा से भरी आवाज़ में नर्स की तरफ़ देखते हुए कहा ................ “ओह नो  ! ही इज़ नो मोर”

फिर अचानक नर्स से मुख़ातिब हुआ और कहने लगा “एक काम करो ये आक्सीजन फ़ौरन बेड नम्बर 4 पर पहुँचाओ ........ उसको आक्सीजन की ज़रूरत पड़ेगी .............क्विक.......जल्दी “

“ओ के सर !” कहते हुए नर्स तेज़ी से आगे बढ़ी और उसने मेरी नाक से ऑक्सीजन मास्क उतार लिया । फिर उसने वार्ड बॉय को आवाज़ लगाईं “विकास ....विकास ....इधर आओ जल्दी ये ऑक्सीजन सिलेंडर 4 नंबर बेड पर शिफ्ट करो जल्दी”

वार्ड बॉय ने सिलेंडर सम्भाला और डॉक्टर के बताये बेड पर ले जाने लगा ।

मैं ज़ोर से चिल्लाया “अरे  ! तुम लोग ये क्या कर रहे हो ?  अभी मुझे इसकी ज़रूरत है  ! “

मगर न नर्स को कुछ फ़र्क पड़ा न वार्ड बॉय विकास को ।

“में अभी मरा नहीं हूँ ! “ मैं फिर चिल्लाया । मगर मेरे चीखने का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था ......................

ये क्या हो रहा है ? ........................ अब मेरा सर घूमने लगा था ।

“सुनो ! ...........” नर्स ने वार्ड बॉय को आवाज़ देते हुए कहा “ ये बेड नंबर 2 के मरीज़ की डेथ हो गई है तुरंत इनके साथ वालों को ख़बर करो .......................... बेड ख़ाली करना पडेगा ।“

बेड नंबर 2 पर तो मैं हूँ !................. अरे तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है क्या ? अरे सिस्टर इधर सुनो मैं मरा नहीं हूँ !   सिस्टर ................... सिस्टर .................. “ मैं चिल्लाया । मगर सब बेकार । कोई मेरी आवाज़ नहीं सुन रहा था ।

इतने में मैं ने, बदहवासी के आलम में आई सी यू में अपनी पत्नी, लक्ष्मी, को प्रवेश करते हुए देखा । उसके चहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थीं । वो दौड़ती हुई मेरे बेड के करीब आई ........................ उसने मेरी तरफ़ देखा ....................  उसकी आँखों में बरबस ही आंसुओं का सैलाब उतर आया था ................उसकी हिचकियाँ बंध गईं थीं ............................ गर्म लावे की तरह दहकते हुए आंसू उसके गालों से लुढ़क कर मेरे गालों पर गिर रहे थे......................................

            रोई तो वो चार दिन पहले भी थी लेकिन इस तरह खामोश नहीं थी जिस तरह आज है । उस दिन मेरी हालत बिगड़ते ही वो मुझे एक टैक्सी में लेकर राजकीय चिकित्सालय ले गई थी लेकिन चपरासी ने गेट से ही मना कर दिया था कि यहाँ कोई बेड ख़ाली नहीं है किसी और अस्पताल चले जाओ ................... वो उस दिन अस्पताल के गेट के बाहर खड़ी रो रही थी ज़ारो क़तार ................ प्लीज़ डॉक्टर को तो बुला दो ...... एक बार देख तो ले .प्लीज़ .......”उसने चपरासी के सामने मिन्नत की .................. मगर सब बेसूद ............... किसी का दिल नहीं पसीजा...........मिन्नते काम न आई................ आंसू प्रभावित  नहीं  कर पाए.................. हर बार एक ही जवाब मिला बेड नहीं है .............

तभी उसे अस्पताल का कम्पाउण्डर आता नज़र आया । वो तेज़ी से उसकी तरफ़ भागी और उसके सामने खडी हो गई “ भय्या प्लीज़ मेरे पति को एक बार देख लो प्लीज़ .................... उसने अपने दोनों हाथों को उसके सामने जोड़ लिया ................. भय्या प्लीज़ इनकी हालत बहुत नाज़ुक है प्लीज़ .......................... ।“

मुझे याद है शादी की पहली सालगिरह पर मैं ने सालगिरह भूलने का नाटक किया था । रात को उसने जब मुझे इसका उलाहना दिया तो मैं ने कहा था ........”अच्छा तो मैडम को शादी की सालगिरह का तोहफ़ा चाहिए ! ठीक है , चलो लेकिन पहले अपने पति के सामने अपने हाथों को जोड़ो और कहो ! प्रिय पतिदेव मैं आपकी अर्धांगिनी आपसे शादी की सालगिरह का तोहफ़ा चाहती हूँ । तब मिलेगा “

“नहीं चाहिए तोहफ़ा ! “ लक्ष्मी ने तुनक कर जवाब दिया था ।

“और हाँ ये हाथ हैं न सिर्फ़ श्री राम जी के आगे जुड़ते हैं और किसी के आगे कभी नहीं जुड़ते, तुम्हारे आगे भी नहीं, और तुमसे कुछ लेना होगा ना तो तुम्हारा कान पकड़ कर ले लूंगी समझे !  छीन कर ले लूंगी .................. इतना अधिकार है मेरा तुम पर ।“ उसने अपनी बात मुकम्मल की ।

मैं निरुत्तर था । मैं ने आगे बढ़ कर उसे सीने से लगा लिया था ।

मगर आज वही हाथ एक मामूली से चपरासी और कम्पाउण्डर  के आगे जुड़े हुए थे ...............................

कम्पाउण्डर ने बहुत विनम्रता से लक्ष्मी से कहा “देखिये भाभीजी ! सच यही है कि यहाँ बेड ख़ाली नहीं हैं और यहाँ आपके पति का इलाज नहीं हो पायेगा आप तुरंत इन्हें सिटी अस्पताल ले जाएँ । वहां डॉक्टर भी हैं और बेड भी । आप वहां जाकर काउंटर पर संपर्क करना । काउंटर पर राजेश मिलेगा उसे कहना हमें सुरेन्द शर्मा ने भेजा है । वो समझ जाएगा और आपका काम हो जायेगा । मैं भी अभी फोन कर देता हूँ आप जल्दी कीजिए । आप अपना नाम बताइये । लक्ष्मी ने बड़ी कृतज्ञता से सुरेन्द्र शर्मा की तरफ़ देखा और अपना नाम बताया ।.........”लक्ष्मी”

मुझे सुरेन्द्र किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लगा ।

नाम बता कर वो तेज़ी से टैक्सी की तरफ़ पलटी और टैक्सी वाले को सिटी अस्पताल चलने को कहा ।

“सिटी अस्पताल” ...................... “ये लक्ष्मी पागल हो गई है क्या ?.............. वो तो प्राइवेट अस्पताल है ............ सब लूट लेगा लक्ष्मी .................... मैं लक्ष्मी को रोकना चाहता था ............... लेकिन अलफ़ाज़ ज़बान के अन्दर जैसे क़ैद हो गए थे ...........”

जब साँसें उखड़ रही हों, दिमाग़ ऑक्सीजन की कमी से सुन्न हो रहा हो और कमजोरी से आँखे खुल ना पा रहीं हों तो ज़बान का क्या कसूर .................... उसके पास बोलने की ताक़त कहाँ से आयेगी .................ऐसे वक़्त में आप सिर्फ़ सोच ही सकते हो कुछ कर नहीं सकते ..............कुछ कह नहीं सकते ............. मेरा भी यही हाल था । मैं चाहता था लक्ष्मी को रोक लूँ .............ज़ोर से चिल्ला कर कहूँ ये क्या कर रही हो ...............कहाँ ले जा रही हो तुम्हें पता भी है .................. मगर सब बेसूद.......बेकार .......................

            और आज इसी सिटी अस्पताल के बेड पर मैं पड़ा हूँ ...................निर्जीव ........................ मगर मैं मरा नहीं हूँ !

तभी नर्स ने लक्ष्मी के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़ी आत्मीयता से उसे दिलासा दिया । इस वक़्त वो नर्स भी मुझे फ़रिश्ता सी लगा रही थी बिलकुल उस कम्पाउण्डर की तरह जिसके कहने पर लक्ष्मी मुझे यहाँ लाई थी ।

नर्स ने एक बार और लक्ष्मी को दिलासा दिया और उसे अपने साथ बाहर आने का इशारा किया । वो उसे काउंटर पर लेकर आ गई । काउंटर पर बैठे व्यक्ति को संबोधित करते हुए उसने कहा “बेड नंबर 2 के मरीज़ की डेथ हो गई है बेड क्लियर करना है जल्दी मैडम का बिल निकाल दो और पेपर फर्मिलिटीज़ पूरी करवा लो ताकि बॉडी मैडम को दी जा सके ।“

काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने सहमति में सर हिला दिया । नर्स वहां से चली गई ।

लक्ष्मी गुमसुम उदास काउंटर के पास खड़ी थी । थोड़ी देर में उस व्यक्ति ने एक लंबा सा बिल निकाला और लक्ष्मी की तरफ़ बढ़ाते हुए बोला ......................... “ये लीजिये मैडम !”

लक्ष्मी सबसे बेख़बर गुमसुम सी खड़ी थी ।

“मैडम   !“ काउंटर वाले व्यक्ति ने ज़ोर से कहा ....................”आपका बिल !”

लक्ष्मी एकदम घबरा गई । उसकी आँखों से अब भी आंसू बह रहे थे । उसने काउंटर वाले की तरफ़ देखा जिसके हाथ में एक लंबा सा बिल था जो उसने लक्ष्मी की तरफ़ बढ़ा रखा था । लक्ष्मी ने वो बिल व्यक्ति के हाथों से ले लिया और सूनी नज़रों से बिल को देखने लगी । काउंटर वाले व्यक्ति ने कहा “ एक लाख दस हज़ार रुपये का बिल है मैडम इसे क्लियर कर दें तो मैं डिस्चार्ज के कागजात बना दूँगा “

काउंटर वाले व्यक्ति को बिल की बहुत फ़िक्र थी । और होनी भी चाहिए यही तो उसका कर्तव्य था । इसी बात की तो उसको पगार मिलती थी ।

“एक लाख दस हज़ार” .................... लक्ष्मी के कानों में जैसे किसी ने जोरदार धमाका कर दिया था ।

“एक लाख दस हज़ार.................. भय्या ये किसका बिल दे रहे हो ? जरा ध्यान से चेक करो ?” लक्ष्मी ने बिल लौटाते हुए कहा ।

“बेड नम्बर 2 का बिल है मैडम  .................... श्री सूरज प्रकाश का.................. माफ़ कीजिए स्वर्गीय सूरज प्रकाश जी का” काउंटर वाले व्यक्ति ने बिल लौटाते हुए कहा ।

“लेकिन एक लाख दस हजार का बिल कैसे हो गया ?” अल्फाज़ लक्ष्मी के गले में अटक रहे थे ।

“वो आप डिटेल बिल में देख लीजिये मैडम................ आप जल्दी से पेमेंट कर दें ताकि मैं आपकी फर्मिलिटीज़ कम्प्लीट कर सकूँ । “ काउंटर वाले व्यक्ति ने उचटते से लहजे में जवाब दिया ।

तभी लक्ष्मी को कुछ याद आया उसने काउंटर वाले व्यक्ति से मुख़ातिब होते हुए कहा “भय्या ...भय्या ...सुनो ...जब में ने इन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया था सत्तर हज़ार रुपये तो उसी दिन जमा करवाए थे एडवांस................. ज़रा चेक करो “

“जी मैडम ...मुझे मालूम है ........ वो अमाउंट कम करके ही ये बिल बनाया है । आप एक बार पूरा बिल देख लें इत्मीनान से वहां बैठ कर “ काउंटर वाले ने सामने पड़ी हुई कुर्सियों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा ।

“यानि एक लाख दस हज़ार जमा करने होंगें ?” लक्ष्मी ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा ।

“जी मैडम “ .....................

अचानक लक्ष्मी का सर बहुत तेज़ चकराया । एक पल के लिए वो लड़खड़ा गई मगर पास ही खड़ी एक महिला ने उसे गिरने से बचा लिया और सहारा देते हुए काउंटर के आगे पड़ी कुर्सियों में से एक कुर्सी पर बिठा दिया । महिला ने अपने पर्स से पानी की बोतल निकाली और लक्ष्मी की तरफ़ बढ़ाई । लक्ष्मी ने बमुश्किल एक घूँट पानी पीया । महिला ने लक्ष्मी के कंधे पर हाथ रखा और कहने लगी “क्या हुआ बहन ?” फिर लक्ष्मी के हाथ में अस्पताल का बिल देखकर समझ गई और कहने लगी “बहन यहाँ से रहम की कोई उम्मीद माता करना । तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था तुम्हें सरकारी अस्पताल जाना चाहिए था ।“

लक्ष्मी ने उस महिला की तरफ़ देखते हुए कहा “पहले वहीं गए थे मगर वहां बेड ख़ाली नहीं था ।“

“सब झूठ बोलते हैं बहन तुम जानती नहीं ये सब इन प्राइवेट अस्पतालों की सैटिंग है । इन्होंने वहां भी अपने कमीशन एजेंट बिठा रखे हैं । ये एजेंट बेवकूफ बनाते हैं, झूठ बोलतेहैं और मरीजों को इन अस्पतालों में भेजते हैं ।“

“तो क्या सुरेन्द्र शर्मा .... एजेंट था ?” लक्ष्मी की आँखों के सामने सुरेन्द्र का चेहरा घूम गया ।

“अच्छा बहन मैं चलती हूँ तुम अपना ध्यान रखना “ ये कहती हुई महिला वार्ड की तरफ़ बढ़ गई ।

लक्ष्मी सूनी निगाहों से उसे जाते हुए देखती रही ।

लक्ष्मी...........  लक्ष्मी, मैने तुम्हें मना किया था लक्ष्मी .............. ये प्राइवेट अस्पताल है.......... यहाँ इंसान की जान की कोई क़ीमत नहीं है............... यहां से आदमी जिन्दा बच भी जाये तो नंगा होकर निकलता और मर जाये तो ये उसके घर वालों को नंगा कर देते हैं.................... यहां रहम नहीं है सिर्फ पैसा है ..पैसा..... ये लोग तो लाशों की भी सौदेबाज़ी करते हैं लक्ष्मी.............. सुनो तुम यहां से चली जाओ ................... क्या करोगी इस मृत देह का................ ये अब तुम्हारे किस काम की ............... सिर्फ इसे अपने हाथों से जलाने के लिये एक लाख रुपये बर्बाद मत करो ....................

ल्क्ष्मी घर जाओ अब ये जिस्म किसी काम का नहीं है ...................... सुनो लक्ष्मी ................... तुम सुन रही हो ना ....................... देखो लक्ष्मी मै ज़िन्दा हूं....................... मै अभी मरा नहीं हूं ............................... मै तुम्हे देख सकता हूं ........... मै तुम्हे देख रहा हूं ........................... मेरी बात सुनो लक्ष्मी ..................

म्गर सब बेसूद...................

ल्क्ष्मी ने ठंडी सांस ली और अपनी चैक बुक निकाली ....................... उसमें अमाउंट भरा........... और काउंटर पर बैठे व्यक्ति की तरफ चैक बढ़ा दिया ।

काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने चैक लिया । चैक को देखा फिर लौटाते हुये कहने लगा “मैडम एक लाख दस हज़ार रुपये भरने थे और आपने इसमें एक लाख ही लिखे हैं ।“

“भय्या ! मेरे खाते में सिर्फ एक लाख ही बचे हैं प्लीज़ एडजस्ट कीजिये” लक्ष्मी ने रिक्वैस्ट करते हुये कहा ।

“देखिये मैडम.................. ये सब मेरे हाथ में नहीं है आप प्लीज़ पूरा अमाउंट जमा करवायें”  काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया ।

ल्क्ष्मी ने अपनी भीगी पलकों को ज़ोर से दबाया आंखों का सारा पानी निकल कर गालों पर बहने लगा । उसने फिर हिम्मत इकठठी की और दोनो हाथ जोड़कर काउंटर वाले से विनती करते हुये कहने लगी .........

“भय्या मेरे अकाउंट में इतने ही पैसे हैं ................ ये भी पूरे पांच साल की बचत थी............ जो मैने अपने हसबैंड के लिये की थी................ मै उन्हे गिफ्ट में एक मोटरसाईकिल देना चाहती थी । प्लीज़........... कुछ तो करो प्लीज ............... मै तुम्हारे आगे हाथ जोडती हूं........... प्लीज”

मै अवाक था !

लक्ष्मी.................. आह ! आह लक्ष्मी ! तुम मुझे कितना प्यार करती हो लक्ष्मी ........................ हां मै चाहता था कि मेरे पास भी एक मोटरसाईकिल हो जिसपर बैठाकर मै तुम्हें पूरा शहर घुमाऊं........... तुम्हें वीकैण्ड पर रैस्टोरेंट में खाना खिलाऊँ । औरों की तरह तुम भी बाईक पर जब मेरे पीछे बैठो तो अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रखो । उस नर्म ओ नाजुक हाथ की नर्मी और गरमी को मै महसूस करूं.................... लक्ष्मी................. लक्ष्मी .................. ।

लक्ष्मी के जुडे हुये हाथ ना सरकारी अस्पताल में काम आये ना प्राईवेट अस्पताल मे।

काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने बड़ी बेरूखी से लक्ष्मी से कहा “मैडम एक लाख का चैक आपने दे दिया है अब आप एक काम करें खाते को छोडें मुझे आप दस हजार रुपये कैश दे दें ।“

लक्ष्मी ने अपना पर्स खोला, पूरा का पूरा खंगाला,  दस,बीस, पचास, सौ, पांच सौ के जितने नोट और सिक्के मिले सब इकटठे किये .................. मगर फिर भी रक़म 9975 रुपये ही निकली । लक्ष्मी ने सारे नोट और सिक्के काउंटर वाले व्यक्ति की तरफ मुटठी में भरकर बढ़ा दिये ।

काउंटर वाले व्यक्ति ने थोड़ी हैरत और थोड़ी हिक़ारत भरी नज़रों से लक्ष्मी की तरफ देखा और फिर नोट और सिक्के लेकर गिनने लगा ।  रक़म गिनने के बाद उसने ज़ोर के कहा “9975 रुपये, पच्चीस रुपये कम हैं ? चलिए कोई बात नहीं....................उसने  लक्ष्मी की तरफ देखते हुये कहा और बिल की कॉपी अहसान भारी नज़रों के साथ लक्ष्मी की तरफ सरका दी । फिर डिस्चार्ज के पेपर नीचे की दराज से निकाले जो (पहले से ही तैयार थे) और उनपर लक्ष्मी के साईन लिये और एक पेपर उसकी तरफ बढ़ाते हुये कहा “आप अब बॉडी ले जा सकती हैं।“

लक्ष्मी तेज़ी से आईसीयू की जानिब बढ़ी लेकिन तब तक बॉडी को पैक कर के मोर्चेरी के पास गैलेरी में रख दिया गया था । एक नर्स उसे लेकर मोर्चेरी वाली गैलेरी में पहुंची और एक बॉडी की तरफ इशारा करते हुये कहा “आप इसे ले जा सकती हैं ।“ 

“मगर मैं कैसे ले जाउंगी ? ....................

कोई एम्बुलेंस ?.............. कोई गाड़ी ?..........................” लक्ष्मी ने ताज्जुब से नर्स से पूछा ।

“वो तो आपको बुलानी पडेगी” नर्स ने उचटता हुआ सा जवाब दिया ।

म्गर मै कहां से बुलाउंगी ? ............. क्या अस्पताल में एंबुलैंस नहीं है ?” लक्ष्मी ने घबराकर फिर सवाल किया ।

“है । मगर वो सिर्फ मरीज़ों को लाने के लिये हैं, लाशों को ले जाने के लिये नहीं हैं” नर्स ने कहा ।

फिर अचानक दया दिखाते दुये उसने कहा .......................... “अगर आप कहो तो मैं आपके लिये गाड़ी का इंतज़ाम कर सकती हूं ..................”

लक्ष्मी कृतज्ञता भरी दृष्टि से नर्स को देखा और कहा “हाँ ....... हाँ ........बहन  प्लीज़ ............”

नर्स ने अपना मोबाईल निकाला और फोन लगाया “हाँ, राजेश........... कहां हो .............. अच्छा ............ सुनो............ जल्दी अस्पताल आ जाओ............. एक बॉडी ले जानी है.................. ठीक है........... ठीक है.....................”

आ रही है गाड़ी........... नर्स ने फोन रखते हुये कहा............... फिर वो तेज़ी से अस्पताल में कहीं ओझल हो गयी ।

मुझे ये नर्स किसी फरिश्ते से कम नहीं लगी ।

थोड़ी देर में मोर्चरी में गाड़ी वाला आ गया और उसने बॉडी को गाड़ी मे रखा । लक्ष्मी भी गाड़ी में ही बैठ गयी ।

“और कोई भी है बहन जी ?” गाड़ी वाले ने लक्ष्मी से पूछा ।

लक्ष्मी ने इन्कार में गर्दन हिला दी ।

गाडी शमशान के रास्ते चल पड़ी।

 

शमशान में भी वही हाहाकार था जो अस्पताल में था ।

चारों तरफ़ लोगों की  भीड़ भाड़, भागम भाग, आपा धापी, धूल, धुआं, आग

गाड़ी शमशान में दाखिल हो गई .........ड्राईवर ने बॉडी को उतारकर नीचे रख दिया ।

“सात हज़ार रूपये मैडम !” ड्राईवर ने अपने गमछे से अपना पसीना पोंछते हुए कहा ।

“सात हज़ार रूपये ............किस बात के .................” लक्ष्मी ने आश्चर्य और दुःख के मिश्रित भाव से ड्राईवर की तरफ़ देख कर पूछा ।

“किस बात के  ?.....अरे मैडम ! देखिये अभी वक़्त नहीं है हमारे पास फिजूल की बातों का .........देखिये पैसे दीजिये जल्दी” ड्राईवर के लहजे में तल्खी उभर आई थी ।

लक्ष्मी अभी तक अवाक खडी थी ।

ड्राईवर ने लक्ष्मी को देखा फिर झल्लाकर बोला “मैडम जल्दी कीजिए । आपको बताया नहीं था क्या राधा ने सात हज़ार लेंगें ?”

“कौन राधा  ? “ लक्ष्मी ने आश्चर्य से पूछा ।

“अरे बाबा वही नर्स जिसने मुझे फोन करके बुलाया था अस्पताल में  “ ड्राईवर ने बड़े उलझते हुए लहजे में स्पष्ट किया ।

“उसने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था” राधा ने रुआंसा होते हुए कहा ।

“और शमशान से अस्पताल है ही कितनी दूर भय्या ? सात हज़ार तो किसी भी तरह नहीं होते ।“ राधा की आँखें फिर बरबस भर आईं थीं । उसका लहजा फिर नर्म हो गया था ।

“देखो मैडम .................... इसमें से दो हज़ार रुपये तो राधा का कमीशन है क्योंकि उसे अस्पताल में भी सेटिंग करनी पड़ती है और फिर दो पैसा कमाने के मौक़े बार बार तो नहीं आते । मेरा भी परिवार है बच्चे हैं ।....................... सब देखना पड़ता है मैडम .............................लाइए जल्दी कीजिए “ ड्राईवर ने अपनी बात मुकम्मल करते हुए अपना सीधा हाथ पैसे माँगने की मुद्रा में लक्ष्मी के आगे कर दिया था ।

लक्ष्मी ने एक बार फिर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे । ड्राईवर के सामने ।

“भय्या ! रहम करो......मेरे पास तो जो पैसे थे सब अस्पताल में खर्च हो गए अब मेरे पास एक रुपया भी नहीं है ..................तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं ? कहाँ से दूँ तुम्हें सात हज़ार रुपये” लक्ष्मी गिड़गिड़ा रही थी ।

“अरे यार ! क्या मगज़मारी है ? कहाँ फंस गया मैं ?............देखो मैडम टाइम खराब ना करो यार ....................मुझे मेरे पैसे चाहिए बस । मैं पैसे लिए बगैर नहीं जाउंगा । मुझे कुछ नहीं मालूम ..............” ड्राईवर बड़बड़ाने लगा उसका स्वर तेज़ होने लगा था ।

एक बार फिर लक्ष्मी के जुड़े हुए हाथ किसी काम नहीं आये ।

अचानक लक्ष्मी ने अपनी उंगली में पहनी हुई सोने की अंगूठी निकाली और ड्राईवर की तरफ़ बढाते हुए बोली “भय्या ! एक काम करो ....... ये रख लो ये सोने की है । “

“अरे यार ! ये क्या मज़ाक़ है “ ड्राईवर ने ये कहते हुए सोने की वो अंगूठी एक झटके से लक्ष्मी के हाथ से ले ली और उसको उलट पलट कर देखते हुए लक्ष्मी से पूछा “असली तो है ना ?“

“ऐसे समय पर कौन धोखा करेगा भय्या ?” लक्ष्मी ने सिसकते हुए जवाब दिया ।

“ठीक है ठीक है तुम कहती हो तो मान लेता” कहते हुए ड्राईवर मुड़ा और गाड़ी स्टार्ट करके नज़रों से ओझल हो गया ।

मैं अब भी मरा नहीं था .................सब देख रहा था ।

ये वही अंगूठी थी जो मैं ने लक्ष्मी को शादी की रात तोहफे में दी थी । पूरे चार साल थोड़े थोड़े पैसे बचाकर मैं ने ये अंगूठी बनवाई थी ।

मगर चार साल की जमा पूंजी मेरी इस मृत देह की बलि चढ़ गई ।

मैं अब भी ज़िंदा था मगर खामोश था । क्या कहता ? किस्से कहता ? जब कोई मुझे सुनता ही नही ! मेरी अपनी लक्ष्मी भी नहीं !

लक्ष्मी बॉडी के पास ही ज़मीन पर निढाल हो कर बैठ गई । सामने से तीन चार नौजवान आये । उनहोंने निढाल लक्ष्मी को देखा तो रुक गए । उनमें से एक बोला “ बहन जी चिता तैयार करनी है क्या ?”

लक्ष्मी ने अपनी सफ़ेद पड़ चुकी पथराई आँखों से उसकी तरफ़ देखा और स्वीकृति में अपना सर हिला दिया ।

“आइये आप हमारे साथ आइये “ एक लडके ने लक्ष्मी को सहारा देकर खड़ा किया और फिर अपने साथ एक तरफ़ को ले गया । सामने टेबल कुर्सी लगाए एक व्यक्ति बैठा था । उसके पास पहुँच कर लड़के ने लक्ष्मी से कहा “मैडम आप अन्तिम संस्कार का सामान लाई हैं ?”

लक्ष्मी ने इन्कार में सर को हिला दिया ।

“कोई बात नहीं ...................कोई बात नहीं” लडके ने दिलासा देते हुए बड़ी नरमी से कहा “आप फ़िक्र ना करें हम अभी सब इंतज़ाम कर देते हैं ।“ फिर उसने टेबल पर बैठे शख्स को कुछ इशारा किया और वहां से चला गया ।

मुझे वो लड़का किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लगा ।

उस लड़के ने जाने से पहले लक्ष्मी को इशारा किया कि टेबल लगाए शख्स के पास जाए और अपनी डिटेल वहां लिखवा दे । ये कहकर वो लड़का वहां से चला गया ।

लक्ष्मी टेबल वाले शख्स के पास पहुंची और अपना नाम, पति का नाम, पता और मोबाइल नंबर लिखवाया । इसके बाद टेबल वाले आदमी ने लक्ष्मी से कहा “मैडम फ़िक्र मत कीजिए दस हज़ार रुपये जमा करवा दीजिये हम अभी सब तैयार करवा देते हैं ।“

लक्ष्मी ने टेबल पर बैठे व्यक्ति के चहरे पर नजर डाली, बड़ा ही सख्त चेहरा था उस व्यक्ति का । इस बार लक्ष्मी को कोई हैरत नहीं हुई ना ही उसकी आँख से कोई आंसुओं टपका । लक्ष्मी ने अपने दोनों हाथों को उठाया मगर जोड़ने के लिए नहीं बल्कि अपने दोनों कानों में पहनी हुई छोटी छोटी बालियों को उतारने के लिए । ये बालियाँ उसकी मां की आख़िरी निशानी थीं । उसने दोनों बालियों को उतारा और ख़ामोशी से टेबल पर रख दिया । उस व्यक्ति ने एक बार लक्ष्मी के चहरे की तरफ़ देखा फिर उन बालियों को उठाकर उनके वज़न का अंदाजा करने लगा । संतुष्ट होने के बाद उसने उन बालियों को टेबल की दराज़ में रखा और एक रसीद बनाकर लक्ष्मी की तरफ़ बढ़ा दी ।

मैं अब मर जाना चाहता था .........लेकिन मैं अब भी ज़िंदा था ।

इस बार लक्ष्मी ने आँखें तर नहीं कीं .....................वो गिड़गिडाई नहीं ................... उसने हाथ भी नहीं जोड़े । शायद वो समझ गई थी कि ज़माने की रीत क्या है !

चिता तैयार हो गई .............मेरा शरीर धू धू करके जल रहा था । लक्ष्मी वहीं मौजूद थी ............................खामोश जैसे काली अंधेरी रात में ...................तूफ़ान से पहले समुन्दर खामोश होता है ......................... सुनसान, भयानक, डरावना, खौफनाक ............... मगर एकदम शांत खामोश !

मैं अब भी ज़िंदा था ...................मरा नहीं था मैं ।

पूरे चार पांच घंटे चिता जलती रही ..................... और लक्ष्मी भी ।

रात का अन्धेरा छाने लगा था । लक्ष्मी अब भी वहीं बैठी थी चिता के पास सुध बुध खोई..................

सब कुछ जलकर राख हो चुका था ।

अचानक वहां एक पंडित जी पधारे । उनहोंने लक्ष्मी को देखा । पंडित जी लक्ष्मी के करीब आये और बड़े प्रेम से उसके कंधे पर हाथ रखकर सहानुभूति के साथ बोले .................”क्या हुआ बेटा ? “”कौन था ये व्यक्ति ?”

“मेरे पति” लक्ष्मी ने पंडित जी की तरफ़ देखे बगैर कहा ।

“ओह ! अफ़सोस बेटा अफ़सोस, लेकिन ये तो विधि का विधान है बेटा । जो आया है उसे जाना है । ख़ाली हाथ एकदम ख़ाली हाथ “ पंडित जी की आवाज़ में बहुत दर्द था ।

मुझे इस समय ये पंडित जी किसी फ़रिश्ते सेकम नज़र नहीं आये ।

पंडित जी वहीं बैठ गए लक्ष्मी के पास और बड़े प्यार से कहने लगे “देखो बेटा ! जो होना था वो तो हो गया लेकिन अब तुम अपना फ़र्ज़ अदा करो । “

लक्ष्मी चौंक उठी और कहने लगी “कौन सा फ़र्ज़ पंडित जी ?”

“देखो बेटा अब तुम्हारा फ़र्ज़ है कि तुम अपने पति का तर्पण करो ताकि तुम्हारे पति की आत्मा को शान्ति मिले बेटा “ पंडित जी ने शंका का समाधान किया ।

लक्ष्मी ने पंडित जी की तरफ़ अजीब सी नज़रों से देखा .....................

“हाँ बेटा ! मैं सही कह रहा हूँ “ पंडित जी ने लक्ष्मी के सर पर मुहब्बत से हाथ रखते हुए बहुत नरम लहजे में कहा ।

लक्ष्मी ने अपने दाहिने हाथ को आगे बढाया और अपनी नाक में पहनी हुई लौंग को उतारा । उसने लौंग को एक पल के लिए देखा । उसे अच्छी तरह याद था कि जब उसने बहुत जिद की थी तब पिता जी सुनार से ये लौंग लाये थे किस्तों में । पूरे एक साल तक किस्तें चुकाई थीं उन्होंने इसकी । अब उसके पास जिस्म पर पहने हुए कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा था ।

उसने लौंग पंडित जी की तरफ़ बढ़ा दी .....................

            पंडित जी ने किसी ज्ञानी की तरह एक पल में सारा माजरा समझ लिया .....................फिर श्रध्दापूर्वक अपनी दोनों हथेलियों को लक्ष्मी के आगे कर दिया ।

लक्ष्मी ने वो लौंग पंडित जी की फैली हुई हथेलियों के सुपुर्द की और एक तरफ़ लुढ़क गई ............................

मेरी आँखों के आगे अचानक सब काला काला हो गया ....................... मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था । मुझे लगा रहा था जैसे मैं किसी बहुत तेज़ रफ़्तार लिफ्ट में ऊपर की तरफ़ जा रहा हूँ ।

मैं अब मर गया था ...........................

मैं अब ज़िंदा नहीं था .........................       

और रहना भी नहीं चाहता था ...................................

شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...