शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

ग़ज़ल  
जो हो मुमकिन ज़माने में उसे इमकान कहते हैं
रहे ताउम्र ला-हासिल उसे अरमान कहते हैं
वतन को दिल में रखते हैं वतन को जान कहते हैं
मुहब्बत को वतन की हम सुनो ईमान कहते हैं
न हिन्दू को न मुस्लिम को न पंडित को न वाइज़ को
जो दिल में दर्द रखता है उसे इंसान कहते हैं
बड़ी मुश्किल जमाने को रविश उल्फ़त की लगती है
जो इसमें मुब्तला हैं वो उसे आसान कहते हैं
जो माल ओ ज़र ये छिन जाए, तो परवाह हम नहीं करते
किसी का टूट जाए दिल तो हम नुक्सान कहते हैं
बिला तफ़रीक ऐ मज़हब और मिल्लत लोग रहते हैं
उसी धरती को दुनिया में सब हिन्दुस्तान कहते हैं
फरिश्तों से वो बेहतर है कि जो इदराक रखता है  
मगर शैतां नहीं है जो, उसे इंसान कहते हैं
दिलों के रंग धोने का यही है कीमिया अकमल

जिसे फुर्क़ान कहते हैं, जिसे क़ुरआन कहते हैं  

شاعر

  شاعر بے چارہ حب جاہ کامارا ہوتا ہے۔واہ  !   واہ  !   کے کلمات اس کے لئے ویسے ہی کام کرتے ہیں جیسے وینٹی لیٹر پر پڑے مریض کے لئے آکسیجن ...