धर्म का सार
हाथ में तलवार है
द्वेष की भरमार है
सुर्ख़ है सारी धरा
लाशों का अम्बार है
ज़ुल्म है अौर जब्र है
साया है न अब्र है
जो भी है कमज़ोर बस
उस पे अत्याचार है
धर्म का न मर्म अब
ख़ून है बस गर्म अब
ज़िन्दा हैं सब नफरतें
मर गया बस प्यार है
सच के पीछे झूठ है
धर्म की ये लूट है
सुबह को जो है गुरु
रात को वो यार है
अौर कितने दिन की है
ग़फलतों की नींद ये
ख़ूने नाहक़ ज़ुल्म है
धर्म का ये सार है
अकमल
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